ShareChat
click to see wallet page
search
#❤️जीवन की सीख #🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏 प्रेरणादायक विचार #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #मेरे विचार
❤️जीवन की सीख - इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतना धृतिः एतत्क्षेत्रं सविकारमुदाहृतम् ٦٩٩٢٩ ٦ तथा इच्छा द्वेप, सुख, दुःख स्थूल देहका पिण्ड चेतना* और धृति२  इस प्रकार विकारों२ ಫ Tf೯7 ೫೯ ೩7 ಕೇ ೩೯ TT II ೯ /l अमानित्वमदप्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जंवम्। आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः ।l श्रेष्ठताके अभिमानका अभाव, दम्भाचरणका अभाव, किसी भी प्राणीको किसी प्रकार भौ न सताना, क्षमाभाव, मन-्वाणो आदिको सरलता , श्रद्धा - भक्तिसहित गुरु्को सेवा, बाहर- भीतरको शुद्धि४ अन्तःकरणको स्थिरता और मन - इन्द्रियौंसहित शरोरका निग्रह II७ Il १० शरौर और अन्तःकरणकी एक प्रकारको चेतन शक्ति। २. गोता अध्याय १८ श्लौक ३४ से ३५ तक देखना चाहिये। पौँचवें श्लोकमें कहा हुआ तो क्षेत्रका स्वरूप समझना चाहिये 3. और इस श्लोकमें कहे हुए इच्छादि क्षेत्रक विकार समझने चाहिये। ४. सत्यतापूर्वक शुद्ध व्यवहारसे द्रव्यको और ठसके अन्नसे यथायोग्य   बतांवसे आचरणोंको और आहारको  141 সল- मृत्तिकादिसे शरौरकोी शुद्धिको बाहरको शुद्धि कहते ऐ तथा  राग द्वेप और कपट आदि विकारोंका নাহা   ক্াক্কয अन्तःकरणकी स्वच्छ हो जाना भोतरको शूद्धि कहो जातो है। श्रीमद्भगवढ्गीता अध्याय १३ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतना धृतिः एतत्क्षेत्रं सविकारमुदाहृतम् ٦٩٩٢٩ ٦ तथा इच्छा द्वेप, सुख, दुःख स्थूल देहका पिण्ड चेतना* और धृति२  इस प्रकार विकारों२ ಫ Tf೯7 ೫೯ ೩7 ಕೇ ೩೯ TT II ೯ /l अमानित्वमदप्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जंवम्। आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः ।l श्रेष्ठताके अभिमानका अभाव, दम्भाचरणका अभाव, किसी भी प्राणीको किसी प्रकार भौ न सताना, क्षमाभाव, मन-्वाणो आदिको सरलता , श्रद्धा - भक्तिसहित गुरु्को सेवा, बाहर- भीतरको शुद्धि४ अन्तःकरणको स्थिरता और मन - इन्द्रियौंसहित शरोरका निग्रह II७ Il १० शरौर और अन्तःकरणकी एक प्रकारको चेतन शक्ति। २. गोता अध्याय १८ श्लौक ३४ से ३५ तक देखना चाहिये। पौँचवें श्लोकमें कहा हुआ तो क्षेत्रका स्वरूप समझना चाहिये 3. और इस श्लोकमें कहे हुए इच्छादि क्षेत्रक विकार समझने चाहिये। ४. सत्यतापूर्वक शुद्ध व्यवहारसे द्रव्यको और ठसके अन्नसे यथायोग्य   बतांवसे आचरणोंको और आहारको  141 সল- मृत्तिकादिसे शरौरकोी शुद्धिको बाहरको शुद्धि कहते ऐ तथा  राग द्वेप और कपट आदि विकारोंका নাহা   ক্াক্কয अन्तःकरणकी स्वच्छ हो जाना भोतरको शूद्धि कहो जातो है। श्रीमद्भगवढ्गीता अध्याय १३ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार - ShareChat