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*वे बिरवा चिन्हें जो कोय।*
*जरा मरण रहित तन होय।।*
*बिरवा एक सकल संसारा।*
*पेड़ एक फूटल तीनी डारा।।*
*मध्य की डारी चारी फल लागा।*
*शाखा पत्र गीने को वाका ।।*
*बेली एक त्रिभुवन लपटानी।*
*बांधे ते छूटे नही ज्ञानी।।*
*कहही कबीर हम जात पुकारा ।*
*पंडित होय सो लेय बिचारा।।*
*👉 सदगुरु कबीर साहेब कहते हैं कि यह संसार एक वृक्ष है और जो इस वृक्ष की वास्तविकता को पहचान लेता है वह वासना त्याग कर बुढ़ापा जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाता है।*
*👉 संसार रूपी इस वृक्ष में तीन शाखा है जिसे हम रजोगुण सतोगुण और तमो गुण के नाम से जानते है यह तीनों शाखाएं हैं और इनके मध्य की शाखा में सतोगुण में चार फल धर्म अर्थ काम और मोक्ष लगे हुए हैं और इस संसारिक वृक्ष की और भी अनेक उप शाखाएं एवं पत्तों को कौन गीन सकता है इस संसार रूपी वृक्ष की एक इच्छा रूपी लता (बेला, नार )है जो की ऊपर नीचे मध्य सभी लोको में या सबके मन में लिपटाई है।*
*👉इस इच्छा रूपी लता में बड़े-बड़े ऋषि मुनि ज्ञानी भी बंधे हुए हैं और छूट नहीं पा रहे हैं इसलिए सदगुरु कबीर साहेब पुकार कर कह रहे हैं की जो पंडित , ज्ञानी एवं विवेकी होगा वही इस वृक्ष का विचार कर जन्म मरण के चक्कर से छुट पाता है।*
*सतपुरुष वृक्ष भये ,निरन्जन वाकी डार।*
*ब्रह्मा विष्णु, शिव शाखा भये,पात रूप संसार।।*
*इस संसार रूपी वृक्ष के मूल बीज सत्य पुरूष हैं तथा निरन्जन रूपी तना निकला इस तना के तीन शाखायें हैं जो ब्रह्मा, विष्णु,शिव जी हैं ।और मध्य के शाखा विष्णु जी के पास चार फल धर्म अर्थ काम और मोक्ष हैं ।पत्र रूप में यह संसार के प्राणी हैं ।इस तरह इस पेड़ के डाल पत्ता सब पर इच्छा रूपी बेला लपटाए हुए हैं इससे कोई पण्डित ज्ञानी ही विचार कर इस बेला से छूट सकता हैं।*
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*मेरे साहेब जी सदगुरु दयाके सागर मेरे बन्दीछोर मेरे परमात्मा सदगुरु कबीरसाहेब जी, के कोमल पावन चरणों मे चरण बदंगी संत महात्मा गुरूजन, गुरू भाई बंश बयालिस के पावन चरणों मे सप्रेम साहेब बदंगी साहेब जी*
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