ShareChat
click to see wallet page
search
नवगुंजरा, जब अर्जुन को मिला श्रीकृष्ण का अद्भुत विश्वरूप : यह कथा तब की है जब पांडव वनवास में थे। अर्जुन मणिपुर की पहाड़ियों पर तपस्या कर रहे थे। एक दिन अचानक उनके सामने एक ऐसा जीव प्रकट हुआ जिसे देखकर वे चकित रह गए। उस जीव के नौ अंग अलग-अलग प्राणियों के थे यानी सिर मुर्गे का, गर्दन मोर की, पीठ कूबड़ वाले बैल की, कमर शेर की, पूँछ साँप की, पैर हाथी, बाघ और घोड़े के (तीन पैर), हाथ मनुष्य का (जिसमें उसने कमल का फूल पकड़ा था) अर्जुन पहले तो डरे, फिर उन्होंने अपना गांडीव धनुष उठा लिया। उन्हें लगा कि यह कोई मायावी राक्षस है। लेकिन जैसे ही उन्होंने ध्यान से देखा, उन्होंने महसूस किया कि इतनी विषमताओं के बाद भी उस जीव में एक दिव्य संतुलन और शांति थी। अर्जुन को समझ आया कि प्राकृतिक रूप से ऐसा जीव संभव नहीं है, यह अवश्य ही चराचर जगत के स्वामी की कोई लीला है। उन्होंने धनुष नीचे रखा और उस अद्भुत रूप के चरणों में झुक गए। तभी वह रूप विलीन हो गया और भगवान श्रीकृष्ण प्रकट हुए। नवगुंजरा केवल एक विचित्र जीव नहीं है बल्कि यह श्रीकृष्ण के विश्वरूप का एक संक्षिप्त और कलात्मक रूप है। यह रूप संदेश देता है कि ईश्वर केवल मनुष्यों में नहीं, बल्कि पशु-पक्षियों, रेंगने वाले जीवों और संपूर्ण प्रकृति में समाया है। ओडिशा की पट्टचित्र चित्रकला में नवगुंजरा एक प्रमुख विषय है। यहाँ तक कि पुरी के जगन्नाथ मंदिर की परंपराओं और गंजीफा (ताश के खेल) के कार्ड्स में भी नवगुंजरा का चित्रण मिलता है। यह कथा सिखाती है कि ज्ञान का अर्थ केवल वह नहीं जो हम जानते हैं, असली ज्ञान वह है जो हमें अनजान और विचित्र में भी दिव्यता देखने की दृष्टि दे। ओडिशा के कई मंदिरों की दीवारों पर आप आज भी नवगुंजरा की नक्काशी देख सकते हैं। इसे विश्वरूप का एक प्रतीकात्मक स्वरूप माना जाता है जो यह याद दिलाता है कि सृष्टि का हर कण, चाहे वह कितना भी भिन्न क्यों न दिखे, अंततः एक ही ऊर्जा से संचालित है। #❤️Love You ज़िंदगी ❤️
❤️Love You ज़िंदगी ❤️ - ShareChat