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#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-4️⃣2️⃣4️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (जतुगृहपर्व) चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः पाण्डवों के प्रति पुरवासियों का अनुराग देखकर दुर्योधन की चिन्ता...(दिन 424) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ तेषां दुर्योधनः श्रुत्वा तानि वाक्यानि जल्पताम् । युधिष्ठिरानुरक्तानां पर्यतप्यत दुर्मतिः ।। २९ ।। युधिष्ठिरमें अनुरक्त हो उपर्युक्त उद्‌गार प्रकट करनेवाले लोगोंकी बातें सुनकर खोटी बुद्धिवाला दुर्योधन भीतर-ही-भीतर जलने लगा ।। २९ ।। स तप्यमानो दुष्टात्मा तेषां वाचो न चक्षमे । ईर्ष्याया चापि संतप्तो धृतराष्ट्रमुपागमत् ।। ३० ।। इस प्रकार संतप्त हुआ वह दुष्टात्मा लोगोंकी बातोंको सहन न कर सका। वह ईर्ष्याकी आगसे जलता हुआ धृतराष्ट्रके पास आया ।। ३० ।। ततो विरहितं दृष्ट्वा पितरं प्रतिपूज्य सः । पौरानुरागसंतप्तः पश्चादिदमभाषत ।। ३१ ।। वहाँ अपने पिताको अकेला पाकर पुरवासियोंके युधिष्ठिरविषयक अनुरागसे दुःखी हुए दुर्योधनने पहले पिताके प्रति आदर प्रदर्शित किया। तत्पश्चात् इस प्रकार कहा ।। ३१ ।। दुर्योधन उवाच श्रुता मे जल्पतां तात पौराणामशिवा गिरः । त्वामनादृत्य भीष्मं च पतिमिच्छन्ति पाण्डवम् ।। ३२ ।। दुर्योधन बोला- 'पिताजी! मैंने परस्पर वार्तालाप करते हुए पुरवासियोंके मुखसे (बड़ी) अशुभ बातें सुनी हैं। वे आपका और भीष्मजीका अनादर करके पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर को राजा बनाना चाहते हैं ।। ३२ ।। मतमेतच्च भीष्मस्य न स राज्यं बुभुक्षति। अस्माकं तु परां पीडां चिकीर्षन्ति पुरे जनाः ।। ३३ ।। भीष्मजी तो इस बातको मान लेंगे; क्योंकि वे स्वयं राज्य भोगना नहीं चाहते। परंतु नगरके लोग हमारे लिये बहुत बड़े कष्टका आयोजन करना चाहते हैं ।। ३३ ।। पितृतः प्राप्तवान् राज्यं पाण्डुरात्मगुणैः पुरा । त्वमन्धगुणसंयोगात् प्राप्तं राज्यं न लब्धवान् ।। ३४ ।। पाण्डुने अपने सद्‌गुणोंके कारण पितासे राज्य प्राप्त कर लिया और आप अंधे होनेके कारण अधिकारप्राप्त राज्यको भी नहीं पा सके ।। ३४ ।। स एष पाण्डोर्दायाद्यं यदि प्राप्नोति पाण्डवः । तस्य पुत्रो ध्रुवं प्राप्तस्तस्य तस्यापि चापरः ।। ३५ ।। यदि ये पाण्डुकुमार युधिष्ठिर पाण्डुके राज्यको, जिसका उत्तराधिकारी पुत्र ही होता है, प्राप्त कर लेते हैं तो निश्चय ही उनके बाद उनका पुत्र ही इस राज्यका अधिकारी होगा और उसके बाद पुनः उसीकी पुत्रपरम्परामें दूसरे दूसरे लोग इसके अधिकारी होते जायेंगे ।। ३५ ।। ते वयं राजवंशेन हीनाः सह सुतैरपि । अवज्ञाता भविष्यामो लोकस्य जगतीपते ।। ३६ ।। महाराज! ऐसी दशामें हमलोग अपने पुत्रोंसहित राजपरम्परासे वंचित होनेके कारण सब लोगोंकी अव-हेलनाके पात्र बन जायेंगे ।। ३६ ।। सततं निरयं प्राप्ताः परपिण्डोपजीविनः । न भवेम यथा राजंस्तथा नीतिर्विधीयताम् ।। ३७ ।। राजन् ! आप कोई ऐसी नीति काममें लाइये, जिससे हमें दूसरोंके दिये हुए अन्नसे गुजारा करके सदा नरकतुल्य कष्ट न भोगना पड़े ।। ३७ ।। यदि त्वं हि पुरा राजन्निदं राज्यमवाप्तवान् । ध्रुवं प्राप्स्याम च वयं राज्यमप्यवशे जने ।। ३८ ।। राजन्! यदि पहले ही आपने यह राज्य पा लिया होता तो आज हम अवश्य ही इसे प्राप्त कर लेते; फिर तो लोगोंका कोई वश नहीं चलता ।। ३८ ।। इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि जतुगृहपर्वणि दुर्योधनेर्ष्यायां चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १४० ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
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