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## सुंदरकांड #जय सियाराम सुंदरकांड 🚩
यह सुंदर चौपाई गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस के सुंदरकांड से ली गई है। जब हनुमान जी लंका से लौटकर भगवान श्री राम को माता सीता का संदेश देते हैं, तब श्री राम भावुक होकर हनुमान जी से कहते हैं कि वे उनके इस उपकार के बदले कुछ नहीं दे पा रहे हैं और संकट की बात करते हैं। तब हनुमान जी यह बात कहते हैं।
📖🌸"कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई। जब तव सुमिरन भजन न होई॥"🌸📖
💡 विस्तृत भावार्थ 📜
✍️सच्ची विपत्ति की परिभाषा:
🌸हनुमान जी कहते हैं कि हे प्रभु! दुनिया जिसे धन की कमी, बीमारी या कष्ट मानती है, वह वास्तविक विपत्ति नहीं है, सच्ची विपत्ति केवल वही समय है, जब मनुष्य आपका स्मरण (याद) और भजन करना छोड़ देता है।
✍️परमात्मा से दूरी ही संकट है:
🌸जब तक इंसान भगवान के सुमिरन में लगा रहता है, तब तक वह हर परिस्थिति में सुरक्षित और शांत रहता है। जैसे ही मन भगवान को भूलकर संसार के सांसारिक मोह-माया में फंस जाता है, वहीं से दुखों और चिंताओं की शुरुआत होती है।
✍️भक्त का दृष्टिकोण:
🌸एक सच्चे भक्त के लिए भौतिक सुख-सुविधाओं का छिन जाना कोई दुख नहीं है। उसके लिए सबसे बड़ा दुख यह है कि वह एक पल के लिए भी अपने प्रभु को भूल जाए।
👉इस प्रसंग की मुख्य सीख (Moral)
🌸यह प्रसंग हमें सिखाता है कि एक सच्चे सेवक या भक्त में अहंकार का लेशमात्र भी नहीं होना चाहिए। हनुमान जी ने लंका में इतना बड़ा काम किया (सीता जी का पता लगाया, लंका जलाई, राक्षसों को मारा), लेकिन जब प्रभु राम ने उनकी तारीफ की, तो उन्होंने सारा श्रेय प्रभु की कृपा को दे दिया और खुद को सिर्फ एक निमित्त मात्र माना।
🌹जय श्रीराम🌹जय सीता राम🌹जय हनुमान।🌹
🌸श्रीरामचरितमानस🌸