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#राधे-राधे ' पनघट लीला ' °°°°°°°°°°°°°°° ब्रजभूमि में यमुना तट पर एक अद्भुत लीला प्रकट होती है। तीनों लोकों के स्वामी, सर्वव्यापक, अंतर्यामी श्याम— जब ब्रज की गोपियों का प्रेम देखते हैं, तो वे एक नई क्रीड़ा रचते हैं। पनघट पर आते ही वे छिपकर खड़े हो जाते— किसी की गगरी उलट देते, किसी की मटकी फोड़ देते, और किसी का चित्त अपनी चितवन से चुरा लेते। गोपियाँ जल लेने जातीं, पर लौटतीं तो अपने मन को वहीं छोड़ आतीं। एक दिन एक गोपी यमुना तट पर पहुँची— श्यामसुंदर को देखकर मोहित हो गई। केसर तिलक, वनमाला, पीताम्बर, और मुरली की मधुर तान— उसकी आँखें बस उन्हें ही निहारती रह गईं। वंशीवट के नीचे खड़े नटवर नागर— भौंहों की मटकन, कुंडलों की झंकार, वनमाला की सुगंध और मधुर मुस्कान— जिसे देख हर हृदय में प्रेम उमड़ पड़ता। कोई भी गोपी अब जल भर न पाती— क्योंकि श्याम पनघट रोक लेते। तब एक दिन वे छिप गए और प्रतीक्षा करने लगे— “देखें, कौन आती है?” एक चतुर गोपी आई— श्याम ने उसका जल गिरा दिया। पर इस बार गोपी ने श्याम को पकड़ लिया! उनकी स्वर्ण-लकुटिया अपने हाथ में ले ली और बोली— “पहले मेरी गगरी भरकर लाओ, तभी तुम्हारी लकुटिया मिलेगी!” श्याम भी मुस्कुराए— और अंततः स्वयं जल भरकर लाए। पर उस क्षण— गोपी का मन, चित्त, चेतना—सब कुछ हर लिया गया। वह लौट तो आई ब्रज में, पर जहाँ देखे—वहाँ श्याम ही श्याम। सखी ने पूछा— “क्या खो आई तू?” वह बोली— “कुछ खोया नहीं… सब कुछ पा लिया— पर अब मैं अपनी नहीं रही…” रस का सार :- यह लीला केवल नटखटपन नहीं, यह जीव और परमात्मा के प्रेम का प्रतीक है— जहाँ गगरी = अहंकार, जल = चित्त, और श्याम = वह प्रेम जो सब कुछ हर लेता है। .
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