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#satnam waheguru ji #satnam shri waheguru ji #Meetha Lage Tera bhana
satnam waheguru ji - करमी आवै कपडा नदरी मोखु दुआरु।। नानक एवै जाणीऐ सभु आपे सचिआरु। अर्थःपरमात्मा के विधान के अनुसार ' पिछले जन्मों के HoT हमारे | कर्मों के फलस्वरूप हमें यह मानव शरीर रूपी कपड़ा प्राप्त हुआ है। जैसे आत्मा पुराने वस्त्र त्याग कर नए वस्त्र धारण करती ললহী वैसे ही यह मनुष्य जन्म भी एक अवसर है जो हमें प्रभु की कृपा से मिला है। परंतु, गुरु साहिब स्पष्ट करते हैं कि केवल उत्तम कर्म कर लेना ही पर्याप्त नहीं है। मनुष्य अक्सर अपने अहंकार में यह मान बैठता है कि वह केवल अपने प्रयासों या कर्मों के बल पर परमात्मा को पा लेगा। हकीकत यह है कि मुक्ति भाणा का द्वार मोक्ष केवल उस अकाल पुरख की नदर यानी कृपा ्दृष्टि से ही खुलता है। श्री  गुरु नानक देव जी समझाते हैं किजब साधक का अहंकार मिट जाता है, तब उसे यह बोध होता है कि वह परमात्मा ही सर्वत्र व्याप्त है और वही एकमात्र सचिआरु सत्य स्वरूप है। मनुष्य को सदैव अपने आचरण और कर्मों को शुद्ध रखना चाहिए उसे अपने प्रयासों पर गर्व करने के बजाय विनम्रता अपनानी चाहिए। हमेशा उस परमात्मा की कृपा का पात्र बनने की प्रार्थना करनी चाहिए, क्योंकि उसकी दया के बिना दुविधा से मुक्ति और सत्य की पहचान संभव नहीं हैl करमी आवै कपडा नदरी मोखु दुआरु।। नानक एवै जाणीऐ सभु आपे सचिआरु। अर्थःपरमात्मा के विधान के अनुसार ' पिछले जन्मों के HoT हमारे | कर्मों के फलस्वरूप हमें यह मानव शरीर रूपी कपड़ा प्राप्त हुआ है। जैसे आत्मा पुराने वस्त्र त्याग कर नए वस्त्र धारण करती ললহী वैसे ही यह मनुष्य जन्म भी एक अवसर है जो हमें प्रभु की कृपा से मिला है। परंतु, गुरु साहिब स्पष्ट करते हैं कि केवल उत्तम कर्म कर लेना ही पर्याप्त नहीं है। मनुष्य अक्सर अपने अहंकार में यह मान बैठता है कि वह केवल अपने प्रयासों या कर्मों के बल पर परमात्मा को पा लेगा। हकीकत यह है कि मुक्ति भाणा का द्वार मोक्ष केवल उस अकाल पुरख की नदर यानी कृपा ्दृष्टि से ही खुलता है। श्री  गुरु नानक देव जी समझाते हैं किजब साधक का अहंकार मिट जाता है, तब उसे यह बोध होता है कि वह परमात्मा ही सर्वत्र व्याप्त है और वही एकमात्र सचिआरु सत्य स्वरूप है। मनुष्य को सदैव अपने आचरण और कर्मों को शुद्ध रखना चाहिए उसे अपने प्रयासों पर गर्व करने के बजाय विनम्रता अपनानी चाहिए। हमेशा उस परमात्मा की कृपा का पात्र बनने की प्रार्थना करनी चाहिए, क्योंकि उसकी दया के बिना दुविधा से मुक्ति और सत्य की पहचान संभव नहीं हैl - ShareChat