#महाभारत
#श्रीमहाभारतकथा-4️⃣2️⃣8️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(जतुगृहपर्व)
चतुश्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः
पाण्डवों की वारणावत-यात्रा तथा उनको विदुर का गुप्त-उपदेश...(दिन 428)
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वैशम्पायन उवाच
पाण्डवास्तु रथान् युक्तान् सदश्चैरनिलोपमैः ।
आरोहमाणा भीष्मस्य पादौ जगृहुरार्तवत् ।। १ ।।
राज्ञश्च धृतराष्ट्रस्य द्रोणस्य च महात्मनः ।
अन्येषां चैव वृद्धानां कृपस्य विदुरस्य च ।। २ ।।
एवं सर्वान् कुरून् वृद्धानभिवाद्य यतव्रताः । समालिङ्गय समानान् वै बालैश्चाप्यभिवादिताः ।। ३ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! वायुके समान वेगशाली उत्तम घोड़ोंसे जुते हुए रथोंपर चढ़नेके लिये उद्यत हो उत्तम व्रतको धारण करनेवाले पाण्डवोंने अत्यन्त दुःखी-से होकर पितामह भीष्मके दोनों चरणोंका स्पर्श किया। तत्पश्चात् राजा धृतराष्ट्र, महात्मा द्रोण, कृपाचार्य, विदुर तथा दूसरे बड़े-बूढ़ोंको प्रणाम किया। इस प्रकार क्रमशः सभी वृद्ध कौरवोंको प्रणाम करके समान अवस्थावाले लोगोंको हृदयसे लगाया। फिर बालकोंने आकर पाण्डवोंको प्रणाम किया ।। १-३ ।।
सर्वा मातृस्तथाऽऽपृच्छ्य कृत्वा चैव प्रदक्षिणम् ।
सर्वाः प्रकृतयश्चैव प्रययुर्वारणावतम् ।। ४ ।।
इसके बाद सब माताओंसे आज्ञा ले उनकी परिक्रमा करके तथा समस्त प्रजाओंसे भी विदा लेकर वे वारणावत नगरकी ओर प्रस्थित हुए ।। ४ ।।
विदुरश्च महाप्राज्ञस्तथान्ये कुरुपुङ्गवाः ।
पौराश्च पुरुषव्याघ्रानन्वीयुः शोककर्शिताः ।। ५ ।।
तत्र केचिद् ध्रुवन्ति स्म ब्राह्मणा निर्भयास्तदा ।
दीनान् दृष्ट्वा पाण्डुसुतानतीव भृशदुःखिताः ।। ६ ।।
उस समय महाज्ञानी विदुर तथा कुरुकुलके अन्य श्रेष्ठ पुरुष एवं पुरवासी मनुष्य शोकसे कातर हो नरश्रेष्ठ पाण्डवोंके पीछे-पीछे चलने लगे। तब कुछ निर्भय ब्राह्मण पाण्डवोंको अत्यन्त दीन-दशामें देखकर बहुत दुःखी हो इस प्रकार कहने लगे ।। ५-६ ।।
विषमं पश्यते राजा सर्वथा स सुमन्दधीः ।
कौरव्यो धृतराष्ट्रस्तु न च धर्म प्रपश्यति ।। ७ ।।
'अत्यन्त मन्दबुद्धि कुरुवंशी राजा धृतराष्ट्र पाण्डवोंको सर्वथा विषम दृष्टिसे देखते हैं। धर्मकी ओर उनकी दृष्टि नहीं है ।। ७ ।।
न हि पापमपापात्मा रोचयिष्यति पाण्डवः।
भीमो वा बलिनां श्रेष्ठः कौन्तेयो वा धनंजयः ।। ८ ।।
'निष्पाप अन्तःकरणवाले पाण्डुकुमार युधिष्ठिर, बलवानोंमें श्रेष्ठ भीमसेन अथवा कुन्तीनन्दन अर्जुन कभी पापसे प्रीति नहीं करेंगे ।। ८ ।।
कुत एव महात्मानौ माद्रीपुत्रौ करिष्यतः ।
तान् राज्यं पितृतः प्राप्तान् धृतराष्ट्रो न मृष्यते ।। ९ ।।
'फिर महात्मा दोनों माद्रीकुमार कैसे पाप कर सकेंगे। पाण्डवोंको अपने पितासे जो
राज्य प्राप्त हुआ था, धृतराष्ट्र उसे सहन नहीं कर रहे हैं ।। ९ ।।
अधर्म्यमिदमत्यन्तं कथं भीष्मोऽनुमन्यते।
विवास्यमानानस्थाने नगरे योऽभिमन्यते ।। १० ।।
'इस अत्यन्त अधर्मयुक्त कार्यके लिये भीष्मजी कैसे अनुमति दे रहे हैं? पाण्डवोंको अनुचितरूपसे यहाँसे निकालकर जो रहनेयोग्य स्थान नहीं, उस वारणावत नगरमें भेजा जा रहा है! फिर भी भीष्मजी चुपचाप क्यों इसे मान लेते हैं? ।। १० ।।
पितेव हि नृपोऽस्माकमभूच्छांतनवः पुरा।
विचित्रवीर्यो राजर्षिः पाण्डुश्च कुरुनन्दनः ।। ११ ।।
'पहले शंतनुकुमार राजर्षि विचित्रवीर्य तथा कुरुकुलको आनन्द देनेवाले महाराज पाण्डु हमारे राजा थे। केवल राजा ही नहीं, वे पिताके समान हमारा पालन-पोषण करते थे ।। ११ ।।
स तस्मिन् पुरुषव्याघ्र देवभावं गते सति ।
राजपुत्रानिमान् बालान् धृतराष्ट्रो न मृष्यते ।। १२ ।।
'नरश्रेष्ठ पाण्डु जब देवभाव (स्वर्ग) को प्राप्त हो गये हैं, तब उनके इन छोटे-छोटे राजकुमारोंका भार धृतराष्ट्र नहीं सहन कर पा रहे हैं ।। १२ ।।
वयमेतदनिच्छन्तः सर्व एव पुरोत्तमात् ।
गृहान् विहाय गच्छामो यत्र गन्ता युधिष्ठिरः ।। १३ ।।
'हमलोग यह नहीं चाहते, इसलिये हम सब घर-द्वार छोड़कर इस उत्तम नगरीसे वहीं चलेंगे, जहाँ युधिष्ठिर जा रहे हैं' ।। १३ ।।
तांस्तथावादिनः पौरान् दुःखितान् दुःखकर्शितः । उवाच मनसा ध्यात्वा धर्मराजो युधिष्ठिरः ।। १४ ।।
शोकसे दुर्बल धर्मराज युधिष्ठिर अपने लिये दुःखी उन पुरवासियोंको ऐसी बातें करते देख मन-ही-मन कुछ सोचकर उनसे बोले ।। १४ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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