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#भगवत गीता #🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏गुरु महिमा😇 #🙏कर्म क्या है❓ #🙏🏻आध्यात्मिकता😇
भगवत गीता - अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः| मामात्मपरदेहेष प्रद्विषन्ताडभ्यसयकाः ।| वे अहंकार, बल घमॅण्ड कामना और क्रोधादि के परायण और दरसरों की निन्दा करने वाले परुष अपने और द्रूसरों कि शरीरॅ में स्थित मुझ अन्तर्यामी सिद्वेष करने चाले 6& Il18 || ಖlrl यह श्लोक उन व्यक्तियों के स्वभाव को उजागर करता है जो दैवी स्वभाव की बजाय आसुरी गुणों सि भरे होते है। ऐसेव्यक्ति अपनी शक्ति अहंकार और घमंड मे लिप्त रहते है। उनके मन मे निरतर कामना और क्रोध का स्थान् रहता है जिससेचे अपने और दूसरों के शरीर में स्थित् भगवानकी उपस्थिति को स्वीकॉर नहीं करते और उनसे द्वेष खखते है।चे दरूसरोंकी निंदा करनेमें विश्वास खखते हैं 7٤ और अपना आलोचनात्मक प्रवृत्तियों कि माध्यम को दूसरों से श्रेष्ठ मानते है। इस प्रकार , यह श्लोक हमें बताता है किऐसे लोग जिनमें आसुरी गुण होते हैचे भगवान के प्रति नकारात्मक भाव d और समाज में अव्यवस्था और द्वेष फैलाते हैl अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः| मामात्मपरदेहेष प्रद्विषन्ताडभ्यसयकाः ।| वे अहंकार, बल घमॅण्ड कामना और क्रोधादि के परायण और दरसरों की निन्दा करने वाले परुष अपने और द्रूसरों कि शरीरॅ में स्थित मुझ अन्तर्यामी सिद्वेष करने चाले 6& Il18 || ಖlrl यह श्लोक उन व्यक्तियों के स्वभाव को उजागर करता है जो दैवी स्वभाव की बजाय आसुरी गुणों सि भरे होते है। ऐसेव्यक्ति अपनी शक्ति अहंकार और घमंड मे लिप्त रहते है। उनके मन मे निरतर कामना और क्रोध का स्थान् रहता है जिससेचे अपने और दूसरों के शरीर में स्थित् भगवानकी उपस्थिति को स्वीकॉर नहीं करते और उनसे द्वेष खखते है।चे दरूसरोंकी निंदा करनेमें विश्वास खखते हैं 7٤ और अपना आलोचनात्मक प्रवृत्तियों कि माध्यम को दूसरों से श्रेष्ठ मानते है। इस प्रकार , यह श्लोक हमें बताता है किऐसे लोग जिनमें आसुरी गुण होते हैचे भगवान के प्रति नकारात्मक भाव d और समाज में अव्यवस्था और द्वेष फैलाते हैl - ShareChat