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#महाभारत यह कथा महाभारत के उन गहरे प्रसंगों में से एक है, जो बताती है कि क्रोध और प्रतिशोध मनुष्य को किस दिशा में ले जा सकते हैं। इसमें ऋषि वशिष्ठ के पुत्र शक्ति, उनके पुत्र पाराशर और पांडवों के जीवन से जुड़ी महत्वपूर्ण घटनाएँ आती हैं। ऋषि शक्ति और राजा कल्माषपाद की कथा महाभारत में वर्णित है कि महान ऋषि वशिष्ठ के पुत्र का नाम शक्ति था। वे तेजस्वी, विद्वान और अत्यंत तपस्वी ब्राह्मण थे। उन्हें अपने तप और ब्राह्मणत्व का बहुत गर्व भी था। एक दिन शक्ति ऋषि वन में जा रहे थे। चलते-चलते वे एक झरने के पास पहुँचे, जहाँ एक बहुत संकरा पुल था। उसी समय दूसरी ओर से राजा कल्माषपाद भी आ रहे थे। पुल इतना पतला था कि एक समय में केवल एक व्यक्ति ही पार कर सकता था। राजा ने कहा — “मैं पहले आया हूँ, इसलिए तुम हट जाओ और मुझे जाने दो।” लेकिन शक्ति ऋषि ने उत्तर दिया — “मैं ब्राह्मण हूँ, तुमसे श्रेष्ठ हूँ। तुम्हें मुझे रास्ता देना चाहिए।” दोनों के बीच विवाद बढ़ गया। क्रोध में आकर शक्ति ऋषि ने राजा को श्राप दे दिया कि वह राक्षस बन जाए। श्राप के प्रभाव से राजा कल्माषपाद नरभक्षी राक्षस बन गया। राक्षस बनते ही उसने वहीं शक्ति ऋषि पर आक्रमण किया और उन्हें खा गया। वशिष्ठ का दुःख जब यह समाचार वशिष्ठ को मिला, तो वे अत्यंत दुखी हुए। उन्हें इस बात का भी पश्चाताप था कि उन्होंने अपने पुत्र को इतनी बड़ी तपशक्ति और श्राप देने की सामर्थ्य दी थी, जिसका उपयोग उसने क्रोध में कर लिया। यह घटना एक बड़ा संदेश देती है — शक्ति बिना विवेक के विनाश का कारण बन सकती है। पाराशर का प्रतिशोध शक्ति ऋषि के पुत्र का नाम पाराशर था। उनका पालन-पोषण उनके दादा वशिष्ठ ने किया। जब पाराशर बड़े हुए और उन्हें अपने पिता की मृत्यु का कारण पता चला, तो उनके भीतर प्रतिशोध की आग जल उठी। उन्होंने निश्चय किया कि वे समस्त राक्षसों का विनाश कर देंगे। इसके लिए उन्होंने एक भयंकर यज्ञ आरंभ करने की योजना बनाई। उस यज्ञ की अग्नि में सभी नरभक्षी राक्षस खिंचकर नष्ट होने वाले थे। लेकिन तभी वशिष्ठ ने उन्हें समझाया — “तुम्हारे पिता ने क्रोध में श्राप दिया और उसी श्राप ने अंततः उनका विनाश कर दिया। यदि तुम भी प्रतिशोध लोगे, तो यह बदले का चक्र कभी समाप्त नहीं होगा।” उन्होंने पाराशर से कहा कि क्रोध की बजाय उन लोगों के बारे में सोचो जो तुम्हें प्रिय हैं और जिनके लिए तुम्हारा जीवन महत्वपूर्ण है। वशिष्ठ की बात सुनकर पाराशर शांत हो गए और उन्होंने अपना यज्ञ रोक दिया। पाराशर का महान भविष्य बाद में यही पाराशर एक महान ऋषि बने। उन्हीं के पुत्र थे वेदव्यास, जिन्होंने महाभारत की रचना की। इस प्रकार यह कथा केवल प्रतिशोध की नहीं, बल्कि ज्ञान, संयम और क्षमा की भी कथा बन जाती है। पांडवों को यह कथा क्यों सुनाई गई? जब पांडवों को बार-बार अपमानित किया गया, उनके प्राण लेने की साजिशें हुईं और लाक्षागृह जैसी घटनाएँ हुईं, तब उनके मन में भी प्रतिशोध की आग थी। तभी अंकारपर्ण नामक गंधर्व ने उन्हें यह कथा सुनाई ताकि वे समझ सकें कि केवल बदले की भावना जीवन का मार्ग नहीं बन सकती। उसने पांडवों से कहा — “अपनी शक्ति और समय प्रतिशोध में नष्ट मत करो। अपना राज्य बनाओ, योग्य पुरोहित खोजो, विवाह करो और महान राजा बनो।” धौम्य को पुरोहित बनाना इसके बाद पांडव धौम्य ऋषि के पास गए और उन्हें अपना पारिवारिक पुरोहित बनाया। उस समय यज्ञ और धार्मिक अनुष्ठान राजाओं के जीवन का महत्वपूर्ण भाग थे, इसलिए योग्य पुरोहित का होना आवश्यक माना जाता था। धौम्य जीवनभर पांडवों के साथ खड़े रहे। द्रौपदी स्वयंवर की ओर इसी दौरान पांडवों को समाचार मिला कि द्रुपद अपनी पुत्री द्रौपदी का स्वयंवर आयोजित कर रहे हैं। द्रुपद और द्रोणाचार्य बचपन में गुरुकुल में साथ पढ़े थे और घनिष्ठ मित्र थे। दोनों ने वचन दिया था कि वे जीवन की हर उपलब्धि एक-दूसरे के साथ साझा करेंगे। लेकिन समय के साथ यही मित्रता आगे चलकर शत्रुता में बदल गई, जिसने महाभारत की कथा को नई दिशा दी।
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