अरे बिल तो आखिर गिरना ही था आखिर दो तिहाई बहुमत मिलना ही होता तब क्या NJAC नहीं था टेबल पर रखने के लिए
क्या ये अमित शाहऔर मोदी को नहीं पता था? बिल्कुल अच्छे से पता था
बिना प्रयोजन कोई उल्टा दांव नहीं खेला जाता
आज का दिन भारतीय राजनीति में विपक्ष के 'मूर्खता के उत्सव' के रूप में दर्ज होगा। विपक्ष जिसे अपनी विजय बता रहा है, वह दरअसल उनके राजनीतिक पतन का ट्रिगर पॉइंट ही साबित होगा । राजनीति में तालियां हमेशा जीत का प्रतीक नहीं होतीं, कभी-कभी वे विदाई की गूँज भी होती हैं। मोदी ने जो पटखनी दी है, उसकी धूल जब 2029 के चुनावों में उड़ेगी, तब शायद इन सुतिये विपक्षी नेताओं को समझ आएगा कि कल जो वो ताली पीट रहे थे वह जीत पर नहीं, बल्कि अपनी ही कब्र पर पीट रहे थे।
जिस 'इंडी गठबंधन' (I.N.D.I.A.) को लग रहा है कि उन्होंने बिल को रोककर सरकार को घेरा है, दरअसल उन्होंने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है या खुद ही कुल्हाड़ी पर पैर दे मारा है
महिला आरक्षण बिल ना पास होने की स्थिति मे विपक्ष के खेमे में भले ही जश्न का माहौल हो लेकिन हकीकत में यह जश्न उस 'सियासी जाल' का चक्र व्यूह है, जिसे प्रधानमंत्री मोदी ने बड़ी चतुराई से बुना है।
अब बीजेपी के पास 2029 तक के हर चुनाव के लिए एक अचूक हथियार है। वे जनता के बीच जाकर सीना ठोक कर कहेंगे कि "हम तो महिलाओ अधिकार देना चाहते थे, लेकिन विपक्ष ने तालियां बजाकर इसे रोक दिया।"
मोदी ने "साइलेंट वोटर" (महिलाएं) को अपनी ओर खींचने के लिए जो भावनात्मक कार्ड खेला है, विपक्ष ने उस पर जश्न मनाकर खुद को 'महिला विरोधी' के रूप में चित्रित होने का अवसर दे दिया है। #जागो और जगाओ


