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#GodMorningMonday #दुर्लभ_दर्शन_संत_के करलो किस्मत वालों # गीता तेरा ज्ञान अमृत # ♦️ गीता जी अध्याय 4 के श्लोक 31 से 40 तक मे गीता ज्ञान दाता जी ने श्री गीता जी में कहा की मेरा नाम(मंत्र) ऊँ है, ये वाचक है और मैं वाच्य हूँ। लेकिन जो सचिदानंद घन ब्रह्म (पुर्ण परमात्मा) है उसका ऩाम (मंत्र) ऊँ तत् सत् रूपी नाम से जाना जाता है। जिसके बारे में हे अर्जुन कोई तत्वदर्शी सन्त बताता है। अतःतत्वदर्शी सन्त की महिमा को जानने के लिए सभी जिज्ञासु और मुमुक आत्माएं श्री गीता जी के अध्याय 4 के श्लोक 31 से 40 का मर्म समझिये। यज्ञशिष्टामृृतभुजः, यान्ति, ब्रह्म, सनातनम्, न, अयम्, लोकः, अस्ति, अयज्ञस्य, कुतः, अन्यः, कुरुसत्तम।।31।। अनुवाद: (कुरुसत्तम) हे कुरुक्षेष्ठ अर्जुन! (यज्ञशिष्टामृतभुजः) उपरोक्त शास्त्राविधि रहित साधनाओं से बचे हुए बुद्धिमान साधक शास्त्र अनुकूल साधना से बचे हुए लाभ को उपभोग करके (सनातनम् ब्रह्म) आदि पुरुष परमेश्वर अर्थात्-पूर्णब्रह्म को (यान्ति) प्राप्त होते हैं और (अयज्ञस्य) शास्त्र विधि अनुसार पूर्ण प्रभु की भक्ति न करने वाले पुरुष के लिये तो (अयम्) यह (लोकः) मनुष्य-लोक भी सुखदायक (न) नहीं (अस्ति) है फिर (अन्यः) परलोक (कुतः) कैसे सुखदायक हो सकता है?(31) भावार्थ:- यज्ञ से बचे हुए अमृृत का भोग करने का अभिप्रायः है कि ‘‘पूर्ण परमात्मा की साधना करने वाले साधक अपने शरीर के कमलों को खोलने वाले मन्त्र का जाप करते हैं। वे मन्त्र श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जी तथा श्री शिव जी ,श्री दुर्गा जी व गणेश जी के जाप भी हैं जो संसारिक सुख प्राप्त कराते हैं। इन के मन्त्र जाप से उपरोक्त देवी व देवताओं के ऋण से मुक्ति मिलती है जो मन्त्र जाप की ऋण उतरने के पश्चात् शेष कमाई है उस शेष जाप की कमाई से पूर्ण परमात्मा के साधक को अत्यधिक संसारिक लाभ प्राप्त होता है। इस श्लोक 31 में यही कहा है कि पूर्ण परमात्मा का साधक यज्ञ अर्थात् साधना (अनुष्ठान) से बची शेष भक्ति कमाई का उपयोग करके पूर्ण परमात्मा को प्राप्त हो जाता है। भावार्थ है कि पूर्ण परमात्मा के विधिवत् साधक को संसारिक सुख भी अधिक प्राप्त होता है तथा पूर्ण मोक्ष भी प्राप्त होता है। विशेष - यही प्रमाण पवित्र गीता अध्याय 3 श्लोक 13 में वर्णन है तथा अध्याय 16 श्लोक 23-24 में भी है कि हे भारत जो साधक शास्त्र विधि त्याग कर मनमाना आचरण अर्थात् मनमुखी पूजा करते हैं उनको न तो कोई सुख प्राप्त होता है, न सिद्धि तथा न ही कोई गति प्राप्त होती है अर्थात् व्यर्थ है। इसलिए शास्त्रों में अर्थात् वेदों में जो भक्ति साधना के कर्म करने का आदेश है तथा जो न करने का आदेश है वही मानना श्रेयकर है। ♦️अध्याय 4 का श्लोक 32👇👇 एवम्, बहुविधाः, यज्ञाः, वितताः, ब्रह्मणः, मुखे, कर्मजान्, विद्धि, तान्, सर्वान्, एवम्, ज्ञात्वा, विमोक्ष्यसे।।32।। अनुवाद: (एवम्) इस प्रकार और भी (बहुविधाः) बहुत तरह के शास्त्राअनुसार (यज्ञाः) धार्मिक क्रियाऐं हैं (तान्) उन (सर्वान्) सबको तू (कर्मजान्) कर्मों के द्वारा होने वाली यज्ञों को (विद्धि) जान (एवम्) इस प्रकार (ब्रह्मणः) पूर्ण परमात्माके (मुखे) मुख कमल से (वितताः) पाँचवे वेद अर्थात् स्वसम वेद में विस्तार से कहे गये हैं। (ज्ञात्वा) जानकर (विमोक्ष्यसे) पूर्ण मुक्त हो जायगा। (32) ♦️अध्याय 4 का श्लोक 33 👇👇 श्रेयान्, द्रव्यमयात्, यज्ञात्, ज्ञानयज्ञः, परन्तप, सर्वम्, कर्म, अखिलम्, पार्थ, ज्ञाने, परिसमाप्यते।।33।। अनुवाद: (परन्तप, पार्थ) हे परंतप अर्जुन! (द्रव्यमयात्) द्रव्यमय अर्थात् धन के द्वारा किये जाने वाले दान, भण्डारे आदि (यज्ञात्) यज्ञ अर्थात् धार्मिक कर्मों की अपेक्षा (ज्ञानयज्ञः) ज्ञानयज्ञ (श्रेयान्) अत्यन्त श्रेष्ठ है तथा (सर्वम्) सम्पूर्ण (कर्म)शास्त्रा अनुकूल कर्म (अखिलम् ज्ञाने) सम्पूर्ण ज्ञान अर्थात् तत्वज्ञान में (परिसमाप्यते) समाप्त हो जाते हैं। (33) ♦️अध्याय 4 का श्लोक 34 👇👇 तत्, विद्धि, प्रणिपातेन, परिप्रश्नेन, सेवया, उपदेक्ष्यन्ति, ते, ज्ञानम्, ज्ञानिनः, तत्त्वदर्शिनः।।34।। अनुवाद: पवित्र गीता बोलने वाला प्रभु कह रहा है कि उपरोक्त नाना प्रकार की साधना तो मनमाना आचरण है। मेरे तक की साधना की अटकल लगाया ज्ञान है, परन्तु पूर्ण परमात्मा के पूर्ण मोक्ष मार्ग का मुझे भी ज्ञान नहीं है। उसके लिए इस मंत्र 34 में कहा है कि उस (तत्) तत्वज्ञान को (विद्धि) समझ उन पूर्ण परमात्मा के वास्तविक ज्ञान व समाधान को जानने वाले संतों को (प्रणिपातेन) भलीभाँति दण्डवत् प्रणाम करने से उनकी (सेवया) सेवा करने से और कपट छोड़कर (परिप्रश्नेन) सरलतापूर्वक प्रश्न करने से (ते) वे (तत्वदर्शिनः) पूर्ण ब्रह्म को तत्व से जानने वाले अर्थात् तत्वदर्शी (ज्ञानिनः) ज्ञानी महात्मा तुझे उस (ज्ञानम्) तत्वज्ञान का (उपदेक्ष्यन्ति) उपदेश करेंगे। (34) इसी का प्रमाण गीता अध्याय 2 श्लोक 15-16 में भी है। ♦️अध्याय 4 का श्लोक 35 👇👇 यत्, ज्ञात्वा, न, पुनः, मोहम्, एवम्, यास्यसि, पाण्डव, येन, भूतानि, अशेषेण, द्रक्ष्यसि, आत्मनि, अथो, मयि।।35।। अनुवाद: (यत्) जिस तत्वज्ञान को (ज्ञात्वा) जानकर (पुनः) फिर तू (एवम्) इस प्रकार (मोहम्) मोह को (न) नहीं (यास्यसि) प्राप्त होगा तथा (पाण्डव) हे अर्जुन! (येन) जिस ज्ञान के द्वारा तू (भूतानि) प्राणियों को (अशेषेण) पूर्ण रूप से (आत्मनि) पूर्ण परमात्मा जो आत्मा के साथ अभेद रूप में रहता है उस पूर्ण परमात्मा में (अथो) और पीछे (मयि) मुझे (द्रक्ष्यसि) देखेगा कि मैं काल हूँ यह जान जाएगा। (35) ♦️अध्याय 4 का श्लोक 36 👇👇 अपि, चेत्, असि, पापेभ्यः, सर्वेभ्यः, पापकृत्तमः, सर्वम्, ज्ञानप्लवेन, एव, वृजिनम्, सन्तरिष्यसि।।36।। अनुवाद: (चेत्) यदि तू अन्य (सर्वेभ्यः) सब (पापेभ्यः) पापियों से (अपि) भी (पापकृृत्तमः) अधिक पाप करने वाला (असि) है तो भी तू (ज्ञानप्लवेन) तत्वज्ञान के आधार पर वास्तविक नाम रूपी नौका द्वारा (सर्वम्) सर्वस जानकर (वृजिनम्) अज्ञान से पार जाकर (एव) निःसन्देह (सन्तरिष्यसि) पूर्ण तरह तर जायेगा अर्थात् पाप रहित होकर पूर्ण मुक्त हो जायेगा। (36) ♦️अध्याय 4 का श्लोक 37 👇👇 यथा, एधांसि, समिद्धः, अग्निः, भस्मसात्, कुरुते, अर्जुन, ज्ञानाग्निः, सर्वकर्माणि, भस्मसात्, कुरुते, तथा।।37।। अनुवाद: (अर्जुन) हे अर्जुन! (यथा) जैसे (समिद्धः) प्रज्वलित (अग्निः) अग्नि (एधांसि) ईंधनों को (भस्मसात्) भस्ममय (कुरुते) कर देता है (तथा) वैसे ही (ज्ञानाग्निः) तत्वज्ञान रूप अग्नि (सर्वकर्माणि) सम्पूर्ण अविधिवत् कर्मों को (भस्मसात्) भस्ममय (कुरुते) कर देता है। (37) ♦️अध्याय 4 का श्लोक 38 👇👇 न, हि, ज्ञानेन, सदृृशम्, पवित्राम्, इह, विद्यते, तत् स्वयम्, योगसंसिद्धः, कालेन, आत्मनि, विन्दति।।38।। अनुवाद: (इह) इस संसार में तत्वज्ञान के (सदृृशम्) समान (पवित्राम्) पवित्र करने वाला (हि) निःसन्देह कुछ भी (न) नहीं (विद्यते) जान पड़ता (योगसंसिद्धः) उस तत्वदर्शी संत के द्वारा दिए सत भक्ति मार्ग के द्वारा जिसकी भक्ति कमाई पूर्ण हो चुकी है (कालेन) समय अनुसार (तत् आत्मनि) आत्मा के साथ अभेद रूप में रहने वाले उस पूर्ण परमात्मा को गीता अध्याय 8 श्लोक 8 से 10 में वर्णित उल्लेख के आधार से(स्वयम्) अपने आप ही (विन्दति) प्राप्त कर लेता है। (38) ♦️अध्याय 4 का श्लोक 39 👇👇 श्रद्धावान्, लभते, ज्ञानम्, तत्परः, संयतेन्द्रियः, ज्ञानम्, लब्ध्वा, पराम्, शान्तिम्, अचिरेण, अधिगच्छति।।39।। अनुवाद: (संयतेन्द्रियः) जितेन्द्रिय (तत्परः) उस तत्वदर्शी संत द्वारा प्राप्त साधन के साधनपरायण (श्रद्धावान्) श्रद्धावान् मनुष्य भक्ति की उपलब्धि होने पर पूर्ण परमेश्वर के (ज्ञानम्) तत्वज्ञान को (लभते) प्राप्त होता है तथा (ज्ञानम्) तत्वज्ञान को (लब्ध्वा) प्राप्त होकर वह (अचिरेण) बिना विलम्ब के तत्काल ही भगवत्प्राप्तिरूप (पराम्) परम (शान्तिम्) शान्ति को (अधिगच्छति) प्राप्त हो जाता है। (39) ♦️अध्याय 4 का श्लोक 40 👇👇 अज्ञः, च, अश्रद्दधानः, च, संशयात्मा, विनश्यति, न, अयम् लोकः, अस्ति, न, परः, न, सुखम्, संशयात्मनः।।40।। अनुवाद: जो साधक उस तत्वदर्शी संत के ज्ञान व साधना पर अविश्वास करता है वह (अज्ञः) विवेकहीन (च) और (अश्रद्दधानः) श्रद्धारहित (च) तथा (संशयात्मा) संश्ययुक्त मनुष्य (विनश्यति) भक्ति मार्ग से अवश्य भ्रष्ट हो जाता है ऐसे (संशयात्मनः) संश्ययुक्त मनुष्य के लिये (न) न (अयम्) यह (लोकः) लोक में (न) न (परः) परलोक में (सुखम्) सुख (न अस्ति) नहीं है। (40) इसी का प्रमाण गीता अध्याय 6 श्लोक 40 में भी है। अधिक जानकारी के लिए Sant Rampal Ji Maharaj App डाउनलोड करें इसे Google Play पर प्राप्त करें। Sant Rampal Ji Maharaj #कबीर
कबीर - ऊँ   नाम का जाप ब्रह्म काहै। इएकी साधना से ब्रह्य लोक प्राप्त होता है जिसके विषय में गीता अध्याय 8 श्लोक १६ मे कह्ा है कि ब्रह्य लोक मैं गए साधक भी पुनर्जन्म को होते है। ull Sant Rampal Ji Maharaj संत रामपाल जी महाराज जी से App Download कीजिये নি:থুল্ক: नामदीक्षा व निःशुल्क  Ca 0 लिये संपर्क सूत्र : पुस्तक प्राप्त करने के Play +91 7496801823 Google [ SPIRITUAL LEADER SANT RAMPAL Jl @SAINTRAMPALIM SUPREMEGOD.ORG SAINT RAMPAL JI MAHARAJ ऊँ   नाम का जाप ब्रह्म काहै। इएकी साधना से ब्रह्य लोक प्राप्त होता है जिसके विषय में गीता अध्याय 8 श्लोक १६ मे कह्ा है कि ब्रह्य लोक मैं गए साधक भी पुनर्जन्म को होते है। ull Sant Rampal Ji Maharaj संत रामपाल जी महाराज जी से App Download कीजिये নি:থুল্ক: नामदीक्षा व निःशुल्क  Ca 0 लिये संपर्क सूत्र : पुस्तक प्राप्त करने के Play +91 7496801823 Google [ SPIRITUAL LEADER SANT RAMPAL Jl @SAINTRAMPALIM SUPREMEGOD.ORG SAINT RAMPAL JI MAHARAJ - ShareChat