Jaswant Dass
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#अयोध्यासे_जानेकेबाद_हनुमानको मिले पूर्ण परमात्मा क्या भक्त की पूजा करना सही है या परमात्मा की? हनुमान जी के उदाहरण से समझिए। जानने के लिए देखिए Sant Rampal Ji Maharaj यूट्यूब चैनल #कबीर
कबीर - हनुमान जी को मोक्ष का मार्ग बताने वाले आध्यात्मिक गुरु कौन थे? हनुमान जयंती पर देखिए हनुमान जी की अनसुनी गाथ 45:01 OOolSatlokAshram हनुमान जयंती पर देखिए हनुमान जी की अनसुनी गाथा J Sant Rampal जानने के लिए देखें Satlok Ashram YOUTUBE free Book @SatlokAshram CHANNEL 7496801825 (  6.3K videos 18M subscribers हनुमान जी को मोक्ष का मार्ग बताने वाले आध्यात्मिक गुरु कौन थे? हनुमान जयंती पर देखिए हनुमान जी की अनसुनी गाथ 45:01 OOolSatlokAshram हनुमान जयंती पर देखिए हनुमान जी की अनसुनी गाथा J Sant Rampal जानने के लिए देखें Satlok Ashram YOUTUBE free Book @SatlokAshram CHANNEL 7496801825 (  6.3K videos 18M subscribers - ShareChat
#अयोध्यासे_जानेकेबाद_हनुमानको मिले पूर्ण परमात्मा #कबीर
कबीर - हनुमान जी को मोक्ष की प्राप्ति रामचंद्र की भक्तिसे मिलो या फिर वह राम कोई और थाजिसकी भक्ति हनुमान जी करते थे? जानने के लिए देखिए Sant Rampal Ji Maharaj यूट्यूब चैनल Sant Rampal Ji YOUTUBE Tree Boo{ Maharaj CHANNEL 7496801825 aoamIRamtalर हनुमान जी को मोक्ष की प्राप्ति रामचंद्र की भक्तिसे मिलो या फिर वह राम कोई और थाजिसकी भक्ति हनुमान जी करते थे? जानने के लिए देखिए Sant Rampal Ji Maharaj यूट्यूब चैनल Sant Rampal Ji YOUTUBE Tree Boo{ Maharaj CHANNEL 7496801825 aoamIRamtalर - ShareChat
The soul of Marichi Ji undertook spiritual practice after receiving initiation from the First Tirthankara, Rishabhdev Ji. As a consequence, Marichi Ji's soul endured lives as a donkey, a dog, and other creatures, and wandered through both heavenly and hellish realms. Subsequently, he became Mahavir Jain. The evidence for this can be found on pages 294–296 of the book *Aao Jain Dharm Ko Jaanein* (Come, Let Us Know Jainism). Mahavir Ji, however, did not receive initiation from anyone at all; instead, he performed his spiritual practice by following his own arbitrary conduct. Therefore, consider: what must have become of him? After all, why did the soul of Mahavir Jain have to endure suffering after suffering in his previous births? For more information, be sure to watch the Sant Rampal Ji Maharaj YouTube channel. #जैन_धर्म_की_सच्चाई #Jain #Jainfood #jainism #jaintr #jaintemple #jainmuni #jainstatus #jainreligion #jainsongs #girnar #mahavirjayanti #ahimsa #SaintRampalJiQuotes #SantRampalJiMaharaj #hindu #sanatandharma #jains #jainstavan #jain108 #palitana #jinshasan #mahavir #jaijinendra #aadinath #jaindharm #कबीर
कबीर - Mahavir Jain walked his path without a formal Guru, the words of Kabir Sahib ]i remind us: yet 'WITHOUT AGURU, THEROSARY AND THE GiFT ARE BUT EMPTY GESTURES; THIS TRUTH IS ECHOED THROUGHOUT THEVEDASANDPURANAS: 'understanding of the true way to For a deeper liberation, tune into Sant Rampal Ji Maharaj on YouTube: Sant Rampal Ji YOUTUBE Free Boo Maharaj CHANNEL 7496801825 4 Mahavir Jain walked his path without a formal Guru, the words of Kabir Sahib ]i remind us: yet 'WITHOUT AGURU, THEROSARY AND THE GiFT ARE BUT EMPTY GESTURES; THIS TRUTH IS ECHOED THROUGHOUT THEVEDASANDPURANAS: 'understanding of the true way to For a deeper liberation, tune into Sant Rampal Ji Maharaj on YouTube: Sant Rampal Ji YOUTUBE Free Boo Maharaj CHANNEL 7496801825 4 - ShareChat
#जैन_धर्म_की_सच्चाई जैन धर्म में ‘णोंकार‘ अर्थात ओंकार मंत्र का जाप किया जाता है। यह मंत्र किसका है और इससे क्या लाभ प्राप्ति होती है? जानने के लिए देखिए Sant RampalJi YtChannel #कबीर
कबीर - महवीर जी ने तपस्या करने के बाद अपने अनुभव से ३६३पाखण्ड मत (थास्त्र विरुद्ध मनमानी साधना ) चलााए । षाखंड मतों से निर्वाण प्राप्त नही होता। निर्वाण प्राप्ति की शास्त्र सम्मत विधि जानने के लिए देखिए चैनल Sant Rampal Ji Maharaj Youluba  Sant Rampal Ji YOUTUBE Free Book | Maharaj CHANNEL 7496801825 @ SnintRampalJiMahnraj महवीर जी ने तपस्या करने के बाद अपने अनुभव से ३६३पाखण्ड मत (थास्त्र विरुद्ध मनमानी साधना ) चलााए । षाखंड मतों से निर्वाण प्राप्त नही होता। निर्वाण प्राप्ति की शास्त्र सम्मत विधि जानने के लिए देखिए चैनल Sant Rampal Ji Maharaj Youluba  Sant Rampal Ji YOUTUBE Free Book | Maharaj CHANNEL 7496801825 @ SnintRampalJiMahnraj - ShareChat
#जैन_धर्म_की_सच्चाई पाखंड मतों से नहीं, शास्त्र आधारित भक्ति से ही मोक्ष मिलता है। सही मार्ग जानिए। अधिक जानकारी के लिए अवश्य देखिए Sant Rampal Ji Maharaj यूट्यूब चैनल #कबीर
कबीर - जैसा कि जैन धर्म का मानना है इस सृष्टि का कोई रचयिता नहीं है। सच क्या है? जानने के लिए देखिए संपूर्ण सृष्टि रचना Sant Rampal Ji Maharaj यूट्यूब चैनल Sant Rampal Ji YOUTUBE fte bunk Maharaj CHANNEL 7496801625 | TBATIPI J` जैसा कि जैन धर्म का मानना है इस सृष्टि का कोई रचयिता नहीं है। सच क्या है? जानने के लिए देखिए संपूर्ण सृष्टि रचना Sant Rampal Ji Maharaj यूट्यूब चैनल Sant Rampal Ji YOUTUBE fte bunk Maharaj CHANNEL 7496801625 | TBATIPI J` - ShareChat
#GodMorningMonday #डॉBRअंबेडकरजी_कीबड़ीभूलPart2 . विष्णु अपने पिता ब्रह्म भगवान की प्राप्ति के लिए प्रस्थान तब विष्णु अपने पिता जी ब्रह्म भगवान का पता करते- करते पाताल लोक में चले गए, जहाँ शेषनाग था। उसने विष्णु को अपनी सीमा में प्रविष्ट होते देख कर क्रोधित हो कर जहर भरा फुंकारा मारा। उसके विष के प्रभाव से विष्णु जी का रंग सांवला हो गया, जैसे स्प्रे पेंट हो जाता है। तब विष्णु ने चाहा कि इस नाग को मजा चखाना चाहिए। तब ज्योति निरंजन ने देखा कि अब विष्णु को शांत करना चाहिए। तब आकाशवाणी हुई कि विष्णु अब तू अपनी माता जी के पास जा और सत्य-सत्य सारा विवरण बता देना तथा जो कष्ट आपको शेषनाग से हुआ है, इसका प्रतिशोध द्वापर युग में लेना। द्वापर युग में आप (विष्णु) तो कृष्ण अवतार धारण करोगे और कालीदह में कालिन्द्री नामक नाग, शेष नाग का अवतार होगा। ऊँच होई के नीच सतावै, ताकर ओएल मोही सों पावै। जो जीव देई पीर पुनी काँहु, हम पुनि ओएल दिवावें ताहूँ।तब विष्णु जी माता जी के पास आए तथा सत्य-सत्य कह दिया कि मुझे पिता के दर्शन नहीं हुए। इस बात से माता बहुत प्रसन्न हुई और कहा कि पुत्र तू सत्यवादी है। अब मैं अपनी शक्ति से आपको तेरे पिता से मिलाती हूँ तथा तेरे मन का संशय खत्म करती हूँ। कबीर देख पुत्र तोहि पिता भीटाऊँ, तौरे मन का धोखा मिटाऊँ। मन स्वरूप कर्ता कह जानों, मन ते दूजा और न मानो। स्वर्ग पाताल दौर मन केरा, मन अस्थीर मन अहै अनेरा। निंरकार मन ही को कहिए, मन की आस निश दिन रहिए। देख हूँ पलटि सुन्य मह ज्योति, जहाँ पर झिलमिल झालर होती।। इस प्रकार माता ने विष्णु से कहा कि मन ही जग का कर्ता है, यही ज्योति निरंजन है। ध्यान में जो एक हजार ज्योतियाँ नजर आती हैं वही उसका रूप है। जो शंख, घण्टा आदि का बाजा सुना, यह महास्वर्ग में निरंजन का ही बज रहा है। तब माता ने कहा कि हे पुत्र तुम सब देवों के सरताज हो और तेरी हर कामना व कार्य मैं पूर्ण करूंगी। तेरी पूजा सर्व जग में होगी। आपने मुझे सच- सच बताया है। काल के इक्कीस ब्रह्मण्ड़ों के प्राणियों की विशेष आदत है कि अपनी व्यर्थ महिमा बनाता है। जैसे दुर्गा जी श्री विष्णु जी को कह रही है कि तेरी पूजा जग में होगी। मैंने तुझे तेरे पिता के दर्शन करा दिए। दुर्गा ने केवल प्रकाश दिखा कर श्री विष्णु जी को बहका दिया। श्री विष्णु जी भी प्रभु की यही स्थिति अपने अनुयाइयों को समझाने लगे कि परमात्मा का केवल प्रकाश दिखाई देता है। परमात्मा निराकार है। इसके बाद आदि भवानी रूद्र(महेश जी) के पास गई तथा कहा कि महेश तू भी कर ले अपने पिता की खोज तेरे दोनों भाइयों को तो तुम्हारे पिता के दर्शन नहीं हुए उनको जो देना था वह प्रदान कर दिया है अब आप माँगो जो माँगना है। तब महेश ने कहा कि हे जननी ! मेरे दोनों बड़े भाईयों को पिता के दर्शन नहीं हुए फिर प्रयत्न करना व्यर्थ है। कृपा मुझे ऐसा वर दो कि मैं अमर (मृत्युंजय) हो जाऊँ। तब माता ने कहा कि यह मैं नहीं कर सकती। हाँ युक्ति बता सकती हूँ, जिससे तेरी आयु सबसे लम्बी बनी रहेगी। विधि योग समाधि है (इसलिए महादेव जी ज्यादातर समाधि में ही रहते हैं)। इस प्रकार माता ने तीनों पुत्रों को विभाग बांट दिए। भगवान ब्रह्मा जी को काल लोक में लख चैरासी के चोले (शरीर) रचने (बनाने) का अर्थात् रजोगुण प्रभावित करके संतान उत्पत्ति के लिए विवश करके जीव उत्पत्ति कराने का विभाग प्रदान किया। भगवान विष्णु जी को इन जीवों के पालन पोषण (कर्मानुसार) करने, तथा मोह-ममता उत्पन्न करके स्थिति बनाए रखने का विभाग दिया। भगवान शिव शंकर (महादेव) को संहार करने का विभाग प्रदान किया। क्योंकि इनके पिता निरंजन को एक लाख मानव शरीर धारी जीव प्रतिदिन खाने पड़ते हैं। यहां पर मन में एक प्रश्न उत्पन्न होगा कि ब्रह्मा, विष्णु तथा शंकर जी से उत्पत्ति, स्थिति और संहार कैसे होता है। ये तोनों अपने-2 लोक में रहते हैं। जैसे आजकल संचार प्रणाली को चलाने के लिए उपग्रहों को ऊपर आसमान में छोड़ा जाता है और वे नीचे पृथ्वी पर संचार प्रणाली को चलाते हैं। ठीक इसी प्रकार ये तीनों देव जहां भी रहते हैं इनके शरीर से निकलने वाले सूक्ष्म गुण की तरंगें तीनों लोकों में अपने आप हर प्राणी पर प्रभाव बनाए रहती है। परन्तु क्षर पुरूष (काल) स्वयं व्यक्त अर्थात् वास्तविक शरीर रूप में सबके सामने नहीं आता। उसी को प्राप्त करने के लिए तीनों देवों (ब्रह्मा जी, विष्णु जी,शिव जी) को वेदों में वर्णित विधि अनुसार भरसक साधना करने पर भी ब्रह्म (काल) के दर्शन नहीं हुए। बाद में ऋषियों ने वेदों को पढ़ा। उसमें लिखा है कि ‘अग्नेः तनूर् असि‘ (पवित्र यजुर्वेद अ. 1 मंत्र 15) परमेश्वर सशरीर है तथा पवित्र यजुर्वेद अध्याय 5 मंत्र 1 में लिखा है कि ‘अग्नेः तनूर् असि विष्णवे त्वा सोमस्य तनूर् असि‘। इस मंत्र में दो बार वेद गवाही दे रहा है कि सर्वव्यापक, सर्वपालन कर्ता सतपुरुष सशरीर है। पवित्र यजुर्वेद अध्याय 40 मंत्र 8 में कहा है कि (कविर् मनिषी) जिस परमेश्वर की सर्व प्राणियों को चाह है, वह कविर् अर्थात् कबीर है। उसका शरीर बिना नाड़ी (अस्नाविरम्) का है, (शुक्रम्) वीर्य से बनी पाँच तत्व से बनी भौतिक (अकायम्) काया रहित है। वह सर्व का मालिक सर्वोपरि सत्यलोक में विराजमान है, उस परमेश्वर का तेजपुंज का (स्वज्र्योति) स्वयं प्रकाशित शरीर है जो शब्द रूप अर्थात् अविनाशी है। वही कविर्देव (कबीर परमेश्वर) है जो सर्व ब्रह्मण्डों की रचना करने वाला (व्यदधाता) सर्व ब्रह्मण्डों का रचनहार (स्वयम्भूः) स्वयं प्रकट होने वाला (यथा तथ्य अर्थान्) वास्तव में (शाश्वत्) अविनाशी है (गीता अध्याय 15 श्लोक 17 में भी प्रमाण है।) भावार्थ है कि पूर्ण ब्रह्म का शरीर का नाम कबीर (कविर देव) है। उस परमेश्वर का शरीर नूर तत्व से बना है। परमात्मा का शरीर अति सूक्ष्म है जो उस साधक को दिखाई देता है जिसकी दिव्य दृष्टि खुल चुकी है। इस प्रकार जीव का भी सुक्ष्म शरीर है जिसके ऊपर पाँच तत्व का खोल (कवर) अर्थात् पाँच तत्व की काया चढ़ी होती है जो माता-पिता के संयोग से (शुक्रम) वीर्य से बनी है। शरीर त्यागने के पश्चात् भी जीव का सुक्ष्म शरीर साथ रहता है। वह शरीर उसी साधक को दिखाई देता है जिसकी दिव्य दृष्टि खुल चुकी है। इस प्रकार परमात्मा व जीव की स्थिति को समझें। वेदों में ओ3म् नाम के स्मरण का प्रमाण है जो केवल ब्रह्म साधना है। इस उद्देश्य से ओ3म् नाम के जाप को पूर्ण ब्रह्म का मान कर ऋषियों ने भी हजारों वर्ष हठयोग (समाधि लगा कर) करके प्रभु प्राप्ति की चेष्टा की, परन्तु प्रभु दर्शन नहीं हुए, सिद्धियाँ प्राप्त हो गई। उन्हीं सिद्धी रूपी खिलौनों से खेल कर ऋषि भी जन्म-मृत्यु के चक्र में ही रह गए तथा अपने अनुभव के शास्त्रों में परमात्मा को निराकार लिख दिया। ब्रह्म (काल) ने कसम खाई है कि मैं अपने वास्तविक रूप में किसी को दर्शन नहीं दूँगा। मुझे अव्यक्त जाना करेंगे (अव्यक्त का भावार्थ है कि कोई आकार में है परन्तु व्यक्तिगत रूप से स्थूल रूप में दर्शन नहीं देता। जैसे आकाश में बादल छा जाने पर दिन के समय सूर्य अदृश हो जाता है। वह दृश्यमान नहीं है, परन्तु वास्तव में बादलों के पार ज्यों का त्यों है, इस अवस्था को अव्यक्त कहते हैं।)। (प्रमाण के लिए गीता अध्याय 7 श्लोक 24-25, अध्याय 11 श्लोक 48 तथा 32) पवित्र गीता जी बोलने वाला ब्रह्म (काल) श्री कृष्ण जी के शरीर में प्रेतवत प्रवेश करके कह रहा है कि अर्जुन मैं बढ़ा हुआ काल हूँ और सर्व को खाने के लिए आया हूँ। यह मेरा वास्तविक रूप है, इसको तेरे अतिरिक्त न तो कोई पहले देख सका तथा न कोई आगे देख सकता है अर्थात् वेदों में वर्णित यज्ञ-जप-तप तथा ओ3म् नाम आदि की विधि से मेरे इस वास्तविक स्वरूप के दर्शन नहीं हो सकते। गीता अध्याय 11 श्लोक नं 48 मैं कृष्ण नहीं हूँ, ये मूर्ख लोग कृष्ण रूप में मुझ अव्यक्त को व्यक्त (मनुष्य रूप) मान रहे हैं। क्योंकि ये मेरे घटिया नियम से अपरिचित हैं कि मैं कभी वास्तविक इस काल रूप में सबके सामने नहीं आता। अपनी योग माया से छुपा रहता हूँ (गीता अध्याय 7 श्लोक नं. 24.25) विचार करें:- अपने छुपे रहने वाले विधान को स्वयं अश्रेष्ठ (अनुत्तम) क्यों कह रहे हैं? यदि पिता अपनी सन्तान को भी दर्शन नहीं देता तो उसमें कोई त्रुटि है जिस कारण से छुपा है तथा सुविधाएं भी प्रदान कर रहा है। काल (ब्रह्म) को शापवश एक लाख मानव शरीर धारी प्राणियों का आहार करना पड़ता है तथा 25 प्रतिशत प्रतिदिन जो ज्यादा उत्पन्न होते हैं उन्हें ठिकाने लगाने के लिए तथा कर्म भोग का दण्ड देने के लिए चैरासी लाख योनियों की रचना की हुई है। यदि सबके सामने बैठ कर किसी की पुत्री, किसी की पत्नी, किसी के पुत्र, माता-पिता को खाए तो सर्व को ब्रह्म से घृणा हो जाए तथा जब भी कभी पूर्ण परमात्मा कविरग्नि (कबीर परमेश्वर) स्वयं आए या अपना कोई संदेशवाहक (दूत) भेंजे तो सर्व प्राणी सत्यभक्ति करके काल के जाल से निकल जाएं। इसलिए धोखा देकर रखता है तथा पवित्र गीता अध्याय 7 श्लोक 18,24,25 में अपनी साधना से होने वाली मुक्ति (गति) को भी (अनुत्तमाम्) अति अश्रेष्ठ कहा है तथा अपने विधान (नियम)को भी (अनुत्तम) अश्रेष्ठ कहा है। प्रत्येक ब्रह्मण्ड में बने ब्रह्मलोक में एक महास्वर्ग बनाया है। महास्वर्ग में एक स्थान पर नकली सतलोक - नकली अलख लोक - नकली अगम लोक तथा नकली अनामी लोक की रचना प्राणियों को धोखा देने के लिए प्रकृति (दुर्गा/आदि माया) द्वारा करवा रखी है। कबीर साहेब का एक शब्द है ‘कर नैनों दीदार महल में प्यारा है‘ में वाणी है कि ‘काया भेद किया निरवारा, यह सब रचना पिण्ड मंझारा है। माया अविगत जाल पसारा, सो कारीगर भारा है। आदि माया किन्ही चतुराई, झूठी बाजी पिण्ड दिखाई, अविगत रचना रचि अण्ड माहि वाका प्रतिबिम्ब डारा है।‘ एक ब्रह्मण्ड में अन्य लोकों की भी रचना है, जैसे श्री ब्रह्मा जी का लोक, श्री विष्णु जी का लोक, श्री शिव जी का लोक। जहाँ पर बैठकर तीनों प्रभु नीचे के तीन लोकों (स्वर्गलोक अर्थात् इन्द्र का लोक - पृथ्वी लोक तथा पाताल लोक) पर एक – एक विभाग के मालिक बन कर प्रभुता करते हैं तथा अपने पिता काल के खाने के लिए प्राणियों की उत्पत्ति, स्थिति तथा संहार का कार्यभार संभालते हैं। तीनों प्रभुओं की भी जन्म व मृत्यु होती है। तब काल इन्हें भी खाता है। इसी ब्रह्मण्ड {इसे अण्ड भी कहते हैं क्योंकि ब्रह्मण्ड की बनावट अण्डाकार है, इसे पिण्ड भी कहते हैं क्योंकि शरीर (पिण्ड) में एक ब्रह्मण्ड की रचना कमलों में टी.वी. की तरह देखी जाती है} में एक मानसरोवर तथा धर्मराय (न्यायधीश) का भी लोक है तथा एक गुप्त स्थान पर पूर्ण परमात्मा अन्य रूप धारण करके रहता है जैसे प्रत्येक देश का राजदूत भवन होता है। वहाँ पर कोई नहीं जा सकता। वहाँ पर वे आत्माऐं रहती हैं जिनकी सत्यलोक की भक्ति अधूरी रहती है। जब भक्ति युग आता है तो उस समय परमेश्वर कबीर जी अपना प्रतिनिधी पूर्ण संत सतगुरु भेजते हैं। इन पुण्यात्माओं को पृथ्वी पर उस समय मानव शरीर प्राप्त होता है तथा ये शीघ्र ही सत भक्ति पर लग जाते हैं तथा सतगुरु से दीक्षा प्राप्त करके पूर्ण मोक्ष प्राप्त कर जाते हैं। उस स्थान पर रहने वाले हंस आत्माओं की निजी भक्ति कमाई खर्च नहीं होती। परमात्मा के भण्डार से सर्व सुविधाऐं उपलब्ध होती हैं। ब्रह्म (काल) के उपासकों की भक्ति कमाई स्वर्ग-महा स्वर्ग में समाप्त हो जाती है क्योंकि इस काल लोक (ब्रह्म लोक) तथा परब्रह्म लोक में प्राणियों को अपना किया कर्मफल ही मिलता है। क्षर पुरुष (ब्रह्म) ने अपने 20 ब्रह्मण्डों को चार महाब्रह्मण्डों में विभाजित किया है। एक महाब्रह्मण्ड में पाँच ब्रह्मण्डों का समूह बनाया है तथा चारों ओर से अण्डाकार गोलाई (परिधि) में रोका है तथा चारों महा ब्रह्मण्डों को भी फिर अण्डाकार गोलाई (परिधि) में रोका है। इक्कीसवें ब्रह्मण्ड की रचना एक महाब्रह्मण्ड जितना स्थान लेकर की है। इक्कीसवें ब्रह्मण्ड में प्रवेश होते ही तीन रास्ते बनाए हैं। इक्कीसवें ब्रह्मण्ड में भी बांई तरफ नकली सतलोक, नकली अलख लोक, नकली अगम लोक, नकली अनामी लोक की रचना प्राणियों को धोखे में रखने के लिए आदि माया से करवाई है तथा दांई तरफ बारह सर्व श्रेष्ठ ब्रह्म साधकों रखता है। फिर प्रत्येक युग में उन्हें अपने संदेश वाहक बनाकर पृथ्वी पर भेजता है, जो शास्त्र विधि रहित साधना व ज्ञान बताते हैं तथा स्वयं भी भक्तिहीन हो जाते हैं तथा अनुयाइयों को भी काल जाल में फंसा जाते हैं। फिर वे गुरु जी तथा अनुयाई दोनों ही नरक में जाते हैं। फिर सामने एक ताला लगा रखा है। वह रास्ता काल (ब्रह्म) के निज लोक में जाता है। जहाँ पर यह ब्रह्म (काल) अपने वास्तविक मानव सदृश काल रूप में रहता है। इसी स्थान पर एक पत्थर की टुकड़ी तवे के आकार की (चपाती पकाने की लोहे की गोल प्लेट सी होती है) स्वतः गर्म रहती है। जिस पर एक लाख मानव शरीर धारी प्राणियों के सूक्ष्म शरीर को भूनकर उनमें से गंदगी निकाल कर खाता है। उस समय सर्व प्राणी बहुत पीड़ा अनुभव करते हैं तथा हाहाकार मच जाती है। फिर कुछ समय उपरान्त वे बेहोश हो जाते हैं। जीव मरता नहीं। फिर धर्मराय के लोक में जाकर कर्माधार से अन्य जन्म प्राप्त करते हैं तथा जन्म-मृत्यु का चक्कर बना रहता है। उपरोक्त सामने लगा ताला ब्रह्म (काल) केवल अपने आहार वाले प्राणियों के लिए कुछ क्षण के लिए खोलता है। पूर्ण परमात्मा के सत्यनाम व सारनाम से यह ताला स्वयं खुल जाता है। ऐसे काल का जाल पूर्ण परमात्मा कविर्देव (कबीर साहेब) ने स्वयं ही अपने निजी भक्त धर्मदास जी को समझाया। Factful Debates YouTube #कबीर
कबीर - भगवान विष्णु का अपने पिता ( काल ब्रह्म ) की प्राप्ति के लिए प्रस्थान व माता का आशीर्वाद पाना | विष्णु से प्रकृति ने कहा कि पुत्र तू भी अपने पिता का पता लगा ले। तब विष्णु ' 3147 पिता जी काल (ब्रह्म) का पता करते करते पाताल लोक में चले गए॰ जहाँ शेषनाग था। उसने विष्णु को अपनी सीमा में प्रविष्ट होते देख कर क्रोधित होे कर जहर भरा फुंकारा मारा। उसके विष के प्रभाव से विष्णु जी का रंग सांवला हो गया॰ जैसे स्रे पेंट हो जाता है। तब विष्णु ने चाहा कि इस नाग को मजा चखाना चाहिए। तब ज्योति निरंजन (काल) ने देखा कि अब बिष्णु को शांत करना चाहिए। तब हुई कि विष्णु अब तू अपनी माता जी के पास जा और सत्य सत्य सारा आकाशवाणी है इसका प्रतिशोध द्वापर युग से हुआ विवरण बता देना तथा जो कष्ट आपको शेषनाग में लेना। द्वापर युग में आप (विष्णु) तो कृष्ण अवतार धारण करोगे और कालीदह में कालिन्द्री नामक नाग॰ शेष नाग का अवतार होगा | SPIRITUAL LEADER X SANT RAMPAL JI @SAINTRAMPALIIM SUPREMEGODORG SAINT RAMPAL JI MAHAPAJ भगवान विष्णु का अपने पिता ( काल ब्रह्म ) की प्राप्ति के लिए प्रस्थान व माता का आशीर्वाद पाना | विष्णु से प्रकृति ने कहा कि पुत्र तू भी अपने पिता का पता लगा ले। तब विष्णु ' 3147 पिता जी काल (ब्रह्म) का पता करते करते पाताल लोक में चले गए॰ जहाँ शेषनाग था। उसने विष्णु को अपनी सीमा में प्रविष्ट होते देख कर क्रोधित होे कर जहर भरा फुंकारा मारा। उसके विष के प्रभाव से विष्णु जी का रंग सांवला हो गया॰ जैसे स्रे पेंट हो जाता है। तब विष्णु ने चाहा कि इस नाग को मजा चखाना चाहिए। तब ज्योति निरंजन (काल) ने देखा कि अब बिष्णु को शांत करना चाहिए। तब हुई कि विष्णु अब तू अपनी माता जी के पास जा और सत्य सत्य सारा आकाशवाणी है इसका प्रतिशोध द्वापर युग से हुआ विवरण बता देना तथा जो कष्ट आपको शेषनाग में लेना। द्वापर युग में आप (विष्णु) तो कृष्ण अवतार धारण करोगे और कालीदह में कालिन्द्री नामक नाग॰ शेष नाग का अवतार होगा | SPIRITUAL LEADER X SANT RAMPAL JI @SAINTRAMPALIIM SUPREMEGODORG SAINT RAMPAL JI MAHAPAJ - ShareChat
क्या बुद्ध जी ने सभी लोकों का अनुभव किया था? यदि नहीं, तो फिर विवरण कैसे आया? अवश्य देखिए डॉ. भीमराव अंबेडकर जी की बड़ी भूल | क्या त्रिपिटक ग्रंथ में लिखी बातें वास्तविक आध्यात्मिक सत्य हैं? या कुछ और छिपा है? अवश्य देखिए डॉ. भीमराव अंबेडकर जी की बड़ी भूल | भाग - 2 Factful Debates यूट्यूब चैनल पर #डॉBRअंबेडकरजी_कीबड़ीभूलPart2 #buddha #innerpeace #buddhism #buddhist #jaybhim #babasaheb #ambedkar #jaibhim #babasahebambedkar #dhamm #FactfulDebatesYtChannel #कबीर
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#डॉBRअंबेडकरजी_कीबड़ीभूलPart2 Factful Debates YouTube #कबीर
कबीर - T4IL गौतम बुद्ध কী থা কীর্ৎ ज्ञान ? ு5ி ' dr; त्रिपिटक draf चिपिटक िपरा ग्रंथपर गथपर महाखुलासा JERIRI ಊain अंबेड़कर जी ನa14G எur अंबेडकर जी சபப2 की बड़ी भूल ?[01/-2 जानने के लिए अवश्य देखिए भीमराव अंबेडकर जी की बड़ी भूल 50. भाग 2 Factful Debates YouTube Channel gRI T4IL गौतम बुद्ध কী থা কীর্ৎ ज्ञान ? ு5ி ' dr; त्रिपिटक draf चिपिटक िपरा ग्रंथपर गथपर महाखुलासा JERIRI ಊain अंबेड़कर जी ನa14G எur अंबेडकर जी சபப2 की बड़ी भूल ?[01/-2 जानने के लिए अवश्य देखिए भीमराव अंबेडकर जी की बड़ी भूल 50. भाग 2 Factful Debates YouTube Channel gRI - ShareChat
#GodMorningSaturday #रामनवमी_पर_जानें_आदिराम_कौन . अगर है शोक अल्लाह से मिलने का तो हरदम नाम लौ लगाता जा।। यदि परमात्मा से मिलने का शौक रखता है तो प्रत्येक श्वांस (दम) के द्वारा नाम का स्मरण करता रह।अर्थात् न तो (रोजा) व्रत रखकर भूखा मर, न मस्जिद में जाकर पत्थर के महल में (सिजदा) प्रणाम कर। वजू) केवल जल से स्नान करने से मोक्ष नहीं है। सच्चे नाम के जाप से मोक्ष होगा। (कूजा तोड़ दे) घड़ा फोड़ दे यानि भ्रम का मार्ग छोड़ दे। सच्चे नाम के जाप रूपी शराब पीता जा यानि राम के नाम का नशा कर। जगतगुरु तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज Factful Debates YouTube #कबीर
कबीर - अगर है शोक अल्लाह से मिलने का तो हरदम नाम लौ लगाता जा। $ মাখক ! যহি পসোনা য সিলন কা থীক रखता है तो प्रत्येक श्वांस (दम) के द्वारा नाम का स्मरण करता रह। जगतगुरु तत्वदर्शी संत रानपाल जी महाराज ~olN O,lnn ROHTAK  अगर है शोक अल्लाह से मिलने का तो हरदम नाम लौ लगाता जा। $ মাখক ! যহি পসোনা য সিলন কা থীক रखता है तो प्रत्येक श्वांस (दम) के द्वारा नाम का स्मरण करता रह। जगतगुरु तत्वदर्शी संत रानपाल जी महाराज ~olN O,lnn ROHTAK - ShareChat
#GodMorningSaturday #रामनवमी_पर_जानें_आदिराम_कौन . अगर है शोक अल्लाह से मिलने का तो हरदम नाम लौ लगाता जा।। यदि परमात्मा से मिलने का शौक रखता है तो प्रत्येक श्वांस (दम) के द्वारा नाम का स्मरण करता रह।अर्थात् न तो (रोजा) व्रत रखकर भूखा मर, न मस्जिद में जाकर पत्थर के महल में (सिजदा) प्रणाम कर। वजू) केवल जल से स्नान करने से मोक्ष नहीं है। सच्चे नाम के जाप से मोक्ष होगा। (कूजा तोड़ दे) घड़ा फोड़ दे यानि भ्रम का मार्ग छोड़ दे। सच्चे नाम के जाप रूपी शराब पीता जा यानि राम के नाम का नशा कर। जगतगुरु तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज Factful Debates YouTube #कबीर
कबीर - अगर है शोक अल्लाह से मिलने का तो हरदम नाम लौ लगाता जा। $ মাখক ! যহি পসোনা য সিলন কা থীক रखता है तो प्रत्येक श्वांस (दम) के द्वारा नाम का स्मरण करता रह। जगतगुरु तत्वदर्शी संत रानपाल जी महाराज ~olN O,lnn ROHTAK  अगर है शोक अल्लाह से मिलने का तो हरदम नाम लौ लगाता जा। $ মাখক ! যহি পসোনা য সিলন কা থীক रखता है तो प्रत्येक श्वांस (दम) के द्वारा नाम का स्मरण करता रह। जगतगुरु तत्वदर्शी संत रानपाल जी महाराज ~olN O,lnn ROHTAK - ShareChat