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#किसान_मसीहा_संतरामपालजी
किसानों की आंखों के आंसू मुस्कान में बदल गए जब उनके डूबे खेतों में फिर से गेहूं की फसल लहलहाई।
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#कुरानमें_अल्लाहकबीर_का_जिक्र
कुरान में छिपे आध्यात्मिक रहस्यों को समझने के लिए तत्त्वदर्शी संत का मार्गदर्शन आवश्यक है।
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Baakhabar Sant Rampal Ji #कबीर
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. मुर्ति पुजा
सूक्ष्मवेद में आन उपासना निषेध बताया है। उपासना का अर्थ है, अपने ईष्ट देव के निकट जाना यानि ईष्ट को प्राप्त करने के लिए की जाने वाली तड़फ, दूसरे शब्दों में पूजा करना। आन उपासना वह पूजा है जो शास्त्रों में वर्णित नहीं है। मूर्ति-पूजा आन-उपासना है :- इस विषय पर सूक्ष्मवेद में परमात्मा कबीर साहेब जी ने इस प्रकार स्पष्ट किया है कि
कबीर~ पत्थर पूजें हरि मिले तो मैं पूजूँ पहार।
तातें तो चक्की भली, पीस खाए संसार।।
कबीर~बेद पढ़ैं पर भेद ना जानें, बांचें पुराण अठारा।
पत्थर की पूजा करें, भूले सिरजनहारा।।
किसी देव की पत्थर की मूर्ति बनाकर उसकी पूजा करते हैं जो शास्त्राविरूद्ध है। जिससे कुछ लाभ नहीं होता । कबीर परमेश्वर ने कहा है कि यदि एक छोटे पत्थर प्रतिमा के पूजने से परमात्मा प्राप्ति होती हो तो मैं तो पहाड़ की पूजा कर लूँ ताकि शीघ्र मोक्ष मिले। परंतु यह मूर्ति पूजा व्यर्थ है। इस मूर्ति वाले पत्थर से तो घर में रखी आटा पीसने वाली पत्थर की चक्की भी लाभदायक है जिससे कणक पीसकर आटा बनाकर सब भोजन बना कर खा रहे हैं।
वेदों व पुराणों का यथार्थ ज्ञान न होने के कारण हिन्दू धर्म के धर्मगुरू पढ़ते हैं वेद, पुराण व गीता, परंतु पूजा पत्थर की करते तथा अनुयाईयों से करवाते हैं। इनको सर्जनहार यानि परम अक्षर ब्रह्म का ज्ञान ही नहीं है। उसको न पूजकर अन्य देवी-देवताओं की पूजा तथा उन्हीं की काल्पनिक मूर्ति पत्थर की बनाकर पूजा का विधान लोकवेद के आधार से बनाकर यथार्थ परमात्मा को भूल गए हैं। उस परमेश्वर की भक्ति विधि का भी ज्ञान नहीं है।
विवेक से काम लेते हैं कि परमात्मा कबीर साहिब जी ने समझाने की कोशिश की है कि आप जी उस पत्थर की मुर्ति को भगवान कहते हो तो आपने भगवान को पत्थर बना दिया। ये भगवान की आरति है या गाली। और ना ही पत्थर आपको कुछ दे सकता है।
कबीर साहिब उदाहरण देकर बताते है कि जैसे आपकोआम का फल खाने की इच्छा हुई। किसी ने आपको बताया कि यह पत्थर की मूर्ति आम के फल की है। आम के फल के ढ़ेर सारे गुण बताए। आप जी उस आम के फल के गुण तो उसको खाकर प्राप्त कर सकते हैं। जो आम की मूर्ति पत्थर की बनी है, उससे वे लाभ प्राप्त नहीं कर सकते।
आप जी को आम का फल चाहिए। उसकी यथार्थ विधि है कि पहले मजदूरी-नौकरी करके धन प्राप्त करो। फिर बाजार में जाकर आम के फल विक्रेता को खोजो। फिर वह वांछित वस्तु मिलेगी। इसी प्रकार जिस भी देव के गुणों से प्रभावित होकर उससे लाभ लेने के लिए आप प्रयत्नशील हैं, उससे लाभ की प्राप्ति उसकी मूर्ति से नहीं हो सकती। उसकी विधि शास्त्रों में वर्णित है। वह अपनाऐं तथा मजदूरी यानि साधना करके भक्ति धन संग्रह करें। फिर वृक्ष की शाखा रूपी देव आप जी को मन वांछित फल आपके भक्ति कर्म के आधार से देंगे।
एक अन्य उदाहरण देकर कबीर साहिब जी बताते है कि किसी संत से उसके अनुयाईयों को बहुत सारे लाभ हुआ करते थे। श्रद्धालु अपनी समस्या बाबा यानि गुरू जी को बताते थे। गुरू जी उस कष्ट के निवारण की युक्ति बताते थे। अनुयाईयों को लाभ होता था। उस बाबा की मृत्यु के पश्चात् श्रद्धालुओं ने श्रद्धावश उस महात्मा की पत्थर की मूर्ति बनाकर मंदिर बनवाकर उसमें स्थापित कर दी।
फिर उसकी पूजा प्रारम्भ कर दी। उस मूर्ति को भोजन बनाकर भोग लगाने लगे। उसी के सामने अपने संकट निवारण की प्रार्थना करने लगे। उस मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठित करने का भी आयोजन करते हैं। यह अंध श्रद्धा भक्ति है जो मानव जीवन की नाशक है।
अन्य उदाहरण देकर कबीर साहिब जी कहते हैं कि एक डॉक्टर वैद्य था। जो भी रोगी उससे उपचार करवाता था, वह स्वस्थ हो जाता था। डॉक्टर रोगी को रोग बताता था और उसके उपचार के लिए औषधि देकर औषधि के सेवन की विधि बताता था। साथ में किन वस्तुओं का सेवन करें, किनका न करें, सब हिदायत देता था। इस प्रकार उपचार से रोगी स्वस्थ हो जाते थे। जिस कारण से वह डॉक्टर उस क्षेत्र के व्यक्तियों में आदरणीय बना था।
उसकी प्रसिद्धि दूर-दूर तक थी। यदि उस डॉक्टर की मृत्यु के पश्चात् उसकी पत्थर की मूर्ति बनवाकर मंदिर बनाकर प्राण प्रतिष्ठित करवाकर स्थापित कर दी जाए। फिर उसके सामने रोगी खड़ा होकर अपने रोग के उपचार के लिए प्रार्थना करे तो क्या वह पत्थर बोलेगा? क्या पहले जीवित रहते की तरह औषधि सेवन, विधि तथा परहेज बताएगा? नहीं, बिल्कुल नहीं।
कबीर साहिब जी कहते हैं उन रोगियों को उसी जैसा अनुभवी डॉक्टर खोजना होगा जो जीवित हो। पत्थर की मूर्ति से उपचार की इच्छा करने वाले अपने जीवन के साथ धोखा करेंगे। वे बिल्कुल भोले या बालक बुद्धि के हो सकते हैं।
एक बात और विशेष विचारणीय है कि जो व्यक्ति कहते हैं कि मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठित कर देने से मूर्ति सजीव मानी जाती है। यदि मूर्ति में प्राण डाल दिए हैं तो उसे आपके साथ बातें भी करनी चाहिए। भ्रमण के लिए भी जाना चाहिए। भोजन भी खाना चाहिए। ऐसा प्राण प्रतिष्ठित कोई भी मूर्ति नहीं करती है। इससे सिद्ध हुआ कि यह अंध श्रद्धा भक्ति के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है।
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[04/03, 9:36 am] Naveen Dass: समर्थ का शरणा गहो, रंग होरी हो।
कदै न हो अकाज, राम रंग होरी हो।।
समर्थ परमात्मा कबीर साहेब जी की शरण में( पूर्ण सतगुरु के माध्यम से) आने के बाद सारे काम सफल होते हैं। और मोक्ष भी प्राप्त होता है।
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[04/03, 9:36 am] Naveen Dass: भक्ति की शक्ति: प्रह्लाद की अटूट आस्था ने सिद्ध किया कि परमात्मा अपने शरणागत की रक्षा हर हाल में करते हैं।
अहंकार का अंत: हिरण्यकश्यप का पतन यह सिखाता है कि सत्य के मार्ग में कोई भी बाधा स्थायी नहीं होती।
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भक्ति की होली खेलो, मोक्ष का मार्ग पाओ।
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