Jaswant Dass
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#GodNightTuesday #Kisan_Majdoor_Bachao_Abhiyan . स्वामी रामानन्द जी को जीवित करना परमेश्वर कबीर जी ने अन्दर जाकर देखा रामान्नद जी का धड़ कहीं पर और सिर कहीं पर पड़ा था। शरीर पर चादर डाल रखी थी। कबीर साहेब ने अपने गुरुदेव के मृत शरीर को दण्डवत् प्रणाम किया और चरण छुए तथा कहा कि गुरुदेव उठो। दिल्ली के बादशाह आपके दर्शनार्थ आए हैं। एक बार उठना। दूसरी बार ही कहा था, सिर अपने आप उठकर धड़ पर लग गया और रामानन्द जी जीवित हो गए “बोलो सतगुरु देव की जय!” सर्व मनुष्य एक प्रभु के बच्चे हैं, जो दो मानता है वह अज्ञानी है। रामान्नद जी के शरीर से आधा खून और आधा दूध निकला हुआ था। जब साहेब कबीर से स्वामी रामानन्द जी ने कारण पूछा, हे कबीर प्रभु! मेरे शरीर से आधा रक्त और आधा दूध कैसे निकला है? कबीर साहेब ने बताया कि स्वामी जी आपके अन्दर यह थोड़ी-सी कसर और रह रही है कि अभी तक आप हिन्दू और मुसलमान को दो समझते हो। इसलिए आधा खून और आधा दूध निकला है। आप अन्य जाति वालों को अपना साथी समझ चुके हो। परंतु हिन्दू तथा मुसलमान एक ही परमेश्वर के बच्चे हैं। जीव सभी एक हैं। आप तो जानीजान हो। आप तो लीला कर रहे हो अर्थात् गोल-मोल बात करके सब समझा गए। कबीर-अलख इलाही एक है, नाम धराया दोय। कहै कबीर दो नाम सुनि, भरम परो मति कोय। कबीर-राम रहीमा एक है, नाम धराया दोय। कहै कबीर दो नाम सुनि, भरम परो मति कोय।। कबीर-कृष्ण करीमा एक है, नाम धराया दोय। कहै कबीर दो नाम सुनि, भरम परो मति कोय। कबीर-काशी काबा एक है, एकै राम रहीम। मैदा एक पकवान बहु, बैठि कबीरा जीम।। कबीर-एक वस्तु के नाम बहु, लीजै वस्तु पहिचान। नाम पक्ष नहीं कीजिये, सार तत्व ले जान।। कबीर-सब काहूका लीजिये, सांचा शब्द निहार। पक्षपात ना कीजिये, कहै कबीर विचार।। कबीर-राम कबीरा एक है, दूजा कबहू ना होय। अंतर टाटी कपट की, तातै दीखे दोय।। कबीर-राम कबीर एक है, कहन सुनन को दोय। दो करि सोई जानई, सतगुरु मिला न होय।। रामान्नद जी ने सिकंदर को सीने से लगाया तथा उसके बाद हिन्दू तथा मुसलमान को तथा सर्व जाति व धर्मों के व्यक्तियों को प्रभु के बच्चे जानकर प्यार देने लगे तथा अपने औपचारिक शिष्य वास्तव में परमेश्वर कबीर साहेब जी का धन्यवाद किया कि आपने मेरा अज्ञान पूर्ण रूप से दूर कर दिया। हम एक पिता प्रभु की संतान हैं, मुझे दृढ़ विश्वास हो गया। दिल्ली के बादशाह सिकंदर लोधी के साथ उनका धार्मिक गुरु शेखतकी भी बनारस गया था। वह रैस्ट हाऊस में ही रूका था। क्योंकि शेखतकी हिन्दू संतों से बहुत ईष्या करता था तथा उन्हें व उनके शिष्यों को काफिर कहता था। इसलिए स्वामी रामानन्द जी के आश्रम में जाने से इंकार कर दिया था। राजा सिकंदर लोधी के साथ स्वामी रामानन्द जी के आश्रम में नहीं गया था। शेखतकी पीर ने अल्लाह को नहीं पहचाना। भारत के सम्राट सिकंदर ने विश्राम गृह में आकर परमेश्वर कबीर साहेब जी द्वारा अपने असाध्य रोग का निवारण केवल आशीर्वाद मात्रा से करने तथा स्वामी रामानन्द जी को पुनर् जीवित करने की अद्भुत करिश्मे की बात खुशी के साथ अपने धार्मिक पीर शेखतकी को बताई तथा कहा कि पीर जी मैं पूर्ण रूप से स्वस्थ हूँ। मुझे कोई पीड़ा किसी अंग में नहीं है। {शाम का समय था। प्रभु कबीर साहेब जी सुबह आने की कहकर अपनी कुटिया पर चले गये थे।} शेखतकी ने बादशाह के मुख से अन्य पीर की भूरि भूरि प्रशंसा सुनी तो अंदर ही अंदर जल-भुन गया। रात भर करवटें बदलता रहा। परमेश्वर कबीर साहेब जी को नीचा दिखाने की योजना बनाता रहा। #बाढ़_का_स्थाई_समाधान_Phase2 Sant Rampal Ji Maharaj #कबीर
कबीर - स्वामी रामानंद जी को जीवित करना। दिल्ली के बादशाह सिकंदर लोधी ने स्वामी रामानंद जी की गर्दन तलवार से काट दी थी। कबीर साहेब जी ने देखा कि रामानंद जी का घड कहीं और सिर कहीं पर पड़ा था। तब कबीर साहेब ने मृत शरीर को प्रणाम किया और কমা কি उठो। गुरुदेव बार कहते ही सिर और # रामानंद जी जीवित हो गए। satlokashramorg @Satlokashram @Satlokashram001 स्वामी रामानंद जी को जीवित करना। दिल्ली के बादशाह सिकंदर लोधी ने स्वामी रामानंद जी की गर्दन तलवार से काट दी थी। कबीर साहेब जी ने देखा कि रामानंद जी का घड कहीं और सिर कहीं पर पड़ा था। तब कबीर साहेब ने मृत शरीर को प्रणाम किया और কমা কি उठो। गुरुदेव बार कहते ही सिर और # रामानंद जी जीवित हो गए। satlokashramorg @Satlokashram @Satlokashram001 - ShareChat
#GodNightTuesday #Kisan_Majdoor_Bachao_Abhiyan #बाढ़_का_स्थाई_समाधान_Phase2 . सर्व मनुष्य एक प्रभु के बच्चे हैं कोई कहे मेरा राम बड़ा है, कोई कहे खुदाई री। कोई कहे मेरा ईसा मसीह बड़ा है, ये बटा रहे लगाई री। सभी मनुष्य एक परमात्मा की संतान हैं, अज्ञानता वस अलग-अलग धर्मों में मजहबो में जाति में बट गए सबका मालिक एक है, लेकिन उस सच्चे मालिक को पाने की सही विधि किसी के पास नहीं है। परमात्मा के पाने की विधि पूर्ण संत ही बताते हैं । सर्व मनुष्य एक प्रभु के बच्चे हैं, जो दो मानता है वह अज्ञानी है। सिकन्दर लोदी द्वारा रामानंद जी की हत्या के बाद रामानंद जी के शरीर से आधा खून और आधा दूध निकला हुआ था। जब साहेब कबीर से स्वामी रामानन्द जी ने कारण पूछा तो साहेब ने बताया कि स्वामी जी आपके अन्दर यह थोड़ी-सी कसर और रह गई है कि अभी तक आप हिन्दू और मुसलमान को दो समझते हो। इसलिए आधा खून और आधा दूध निकला है। आप अन्य जाति वालों को अपना साथी समझ चुके हो। यह जीव सभी एक हैं। आप तो जानीजान हो। आप तो लीला कर रहे हो अर्थात् उसको गोल-मोल भी कर दिया और समझा भी गए। कबीर-अलख इलाही एक है, नाम धराया दोय। कहे कबीर दो नाम सुनी , भरम परो मति कोय। कबीर-राम रहीमा एक है,नाम धराया दोय। कहै कबीर दो नाम सुनी, भरम परो मति कोय।। कबीर-कृष्ण करीमा एक है,नाम धराया दोय। कहै कबीर दो नाम सुनी, भरम परो मति कोय।। कबीर-काशी काबा एक है, एकै राम-रहीम। मैदा एक पकवान बहु,बैठी कबीरा जीम।। कबीर-एक वस्तू के नाम बहु, लीजै वस्तू पहचान। नाम पक्ष नहीं कीजिये, सार तत्व ले जान।। कबीर- सब कहुका लीजिये, सांचा शब्द निहार। पक्षपात ना कीजिये, कहै कबीर विचार।। कबीर-राम कबीरा एक है, दूजा कबहु ना होय। अंतर टाटी कपट की, ताते दिखे दोय।। कबीर-राम कबीरा एक है, कहन सुनन को दोय दो करी सोई जानइ , सद्गुरु मिला न होय।। रामानंद जी ने सिकंदर को सीने से लगाया तथा उसके बाद हिन्दू तथा मुसलमान को तथा सर्व जाति व धर्मों के व्यक्तियों को प्रभु के बच्चे जानकर प्यार देने लगे तथा अपने औपचारिक शिष्य वास्तव में परमेश्वर कबीर साहेब जी का धन्यवाद किया कि आपने मेरा अज्ञान पूर्ण रूप से दूर कर दिया। हम एक पिता प्रभु की संतान हैं, मुझे दृढ़ विश्वास हो गया। दिल्ली के बादशाह सिकंदर लोधी के साथ उनका धार्मिक गुरु शेखतकी भी बनारस गया था। वह रैस्ट हाऊस(विश्राम गृह) में ही रूका था। क्योंकि शेखतकी हिन्दू संतों से बहुत ईष्र्या करता था तथा उन्हें व उनके शिष्यों को काफिर कहता था। इसलिए स्वामी रामानन्द जी के आश्रम में जाने से इंकार कर दिया था। राजा सिकंदर लोधी के साथ स्वामी रामानन्द जी के आश्रम में नहीं गया था। महाराजा सिकंदर ने विश्राम गृह में आकर परमेश्वर कबीर साहेब जी द्वारा अपने असाध्य रोग का निवारण केवल आशीर्वाद मात्र से करने तथा स्वामी रामानन्द जी को पुनर् जीवित करने की कथा खुशी के साथ अपने धार्मिक पीर शेखतकी को बताई तथा कहा कि पीर जी मैं पूर्ण रूप से स्वस्थ हूँ। मेरे किसी अंग में कोई पीड़ा नहीं है। रात्रि का समय था। प्रभु कबीर साहेब जी सुबह आने की कहकर अपनी कुटिया पर चले गये थे। शेखतकी ने बादशाह के मुख से अन्य संत की भूरी-भूरी प्रशंसा सुनी तो अन्दर ही अन्दर जल-भुन गया। रात भर करवटें बदलता रहा। परमेश्वर कबीर साहेब जी को नीचा दिखाने की योजना बनाता रहा। Sant Rampal Ji Maharaj #कबीर
कबीर - 2audಾr सबका मालिक एक! SantRampalJiMaharaj कोई कहे हमरा राम बड़ा है, कोई कहे खुदाई रे | कोई कहे ईसा मसीह बड़ा है, ये बांटा रहे लगाई रे ।। कौन है सबका मालिक जिसका सभी धार्मिक ग्रन्थों व शास्त्रों में प्रभु / मालिक/ रब / खुदा / अल्लाह / राम / साहेब / गोड / परमेश्वर उस एक प्रत्यक्ष नाम लिख कर महिमा गाई है। की कौन है॰ कैसा है नथा कह्ां रहता है? " जानने लिए कृपया पढ़े पवित्र पुस्तक 5 எ்I निःशुल्क पाएं पवित्र पुस्तक परा पता भरजे  ज्ञान गँंगा अपचा लाम +91 7496801823 @SVARNAYUGA SVARNAYUGA ISUPREMEGOD.ORG Followuis ons 2audಾr सबका मालिक एक! SantRampalJiMaharaj कोई कहे हमरा राम बड़ा है, कोई कहे खुदाई रे | कोई कहे ईसा मसीह बड़ा है, ये बांटा रहे लगाई रे ।। कौन है सबका मालिक जिसका सभी धार्मिक ग्रन्थों व शास्त्रों में प्रभु / मालिक/ रब / खुदा / अल्लाह / राम / साहेब / गोड / परमेश्वर उस एक प्रत्यक्ष नाम लिख कर महिमा गाई है। की कौन है॰ कैसा है नथा कह्ां रहता है? जानने लिए कृपया पढ़े पवित्र पुस्तक 5 எ்I निःशुल्क पाएं पवित्र पुस्तक परा पता भरजे  ज्ञान गँंगा अपचा लाम +91 7496801823 @SVARNAYUGA SVARNAYUGA ISUPREMEGOD.ORG Followuis ons - ShareChat
#GodNightTuesday #Kisan_Majdoor_Bachao_Abhiyan #बाढ़_का_स्थाई_समाधान_Phase2 . शास्त्रानुकुल साधना एक चार ईट्टों की बनी माता को भगवान मान लेंगे उस माता पर कुत्ता पेशाब करता है वह भगवान है! पत्थर की मूर्ति को पूजते हैं, पीरो मजारों को पूजते है जो बोल नहीं सकते। समाधान नहीं कर सकते। तीर्थों पर जाते हैं। क्या मिलता है, कुछ नहीं। संत रामपाल दास जी महाराज अपने सतसंग मे कहते है कि जब गंगा मे नहाने से पाप कटते हैं तो सबसे पहले कछुवे मेंढक मछली सैकडों जीवों के कट जाने चाहिये वे तो गंगा मे ही रहते हैं । गंगा मे नहाने से तन का मैल दूर हो गया मन का मैल कैसे दूर करोगे। उसके लिए कबीर साहेब कहते है कि कबीर -पर्वत पर्वत मैं फिरा कारण अपने राम। राम सरीखे संत मिले, जिन सारे सब काम।। कबीर परमात्मा हमें समझाने के लिए एक शिक्षक की तरह अपने उपर उदाहरण देकर कहते है मैंने भगवान को पर्वत पर्वत जंगलो में ढूंढा कहीं भगवान नही मिले। राम जैसे ज्ञानी संत मिले उन संतो से मेरा हर काम सफल हो गया। कबीर- तीर्थ जाये एक फल, संत मिले अनेक। फल पूर्ण संत के सतसंग से अनेक फल मिलते है मन का मैल दूर होता है आत्मा निर्मल होती है। पूर्ण संत की शरण लो वह पूर्ण गुरू आपको पूर्ण परमात्मा की भक्ति भी बतायेगा आपको ज्ञान भी मिलेगा और आपका समाधान भी करेगा। पूर्ण संत के पास से आप खाली हाथ नही आ सकते आपको ज्ञान मोक्ष मार्ग और समाधान मिलता है लेकिन इन पत्थरो को पूजने से कुछ नही मिलता। वेद, गीता मे नहीं लिखा कि पत्थर तीर्थ पूजो। लोग गाय को पूजते है ये मानकर गाय मे 33 करोड़ देवी देवताओं का वास है, पूर्ण संत से हमें तत्वज्ञान मिलता है। पूर्ण परमात्मा की पूजा विधि मिलती है जिससे पूर्ण मोक्ष होगा। हमारी रक्षा होगी! सतनाम सारनाम गायत्री तीन तरह के मंत्र मिले। जिनसे इतना कुछ मिला हमारे विकार दूर कर दिये......... Sant Rampal Ji Maharaj #कबीर
कबीर - मिरे रूपये हैःमेरा घर है॰ मेरा परिवार है॰ मैं ऐसा हूं , मैं यों कर दूंगा !! अरे॰ तूतो (प्रतिक्षण) मर रहा है॰ कर क्या देगा ? मिरे रूपये हैःमेरा घर है॰ मेरा परिवार है॰ मैं ऐसा हूं , मैं यों कर दूंगा !! अरे॰ तूतो (प्रतिक्षण) मर रहा है॰ कर क्या देगा ? - ShareChat
#GodNightTuesday #Kisan_Majdoor_Bachao_Abhiyan #बाढ़_का_स्थाई_समाधान_Phase2 . शास्त्रानुकुल साधना एक चार ईट्टों की बनी माता को भगवान मान लेंगे उस माता पर कुत्ता पेशाब करता है वह भगवान है! पत्थर की मूर्ति को पूजते हैं, पीरो मजारों को पूजते है जो बोल नहीं सकते। समाधान नहीं कर सकते। तीर्थों पर जाते हैं। क्या मिलता है, कुछ नहीं। संत रामपाल दास जी महाराज अपने सतसंग मे कहते है कि जब गंगा मे नहाने से पाप कटते हैं तो सबसे पहले कछुवे मेंढक मछली सैकडों जीवों के कट जाने चाहिये वे तो गंगा मे ही रहते हैं । गंगा मे नहाने से तन का मैल दूर हो गया मन का मैल कैसे दूर करोगे। उसके लिए कबीर साहेब कहते है कि कबीर -पर्वत पर्वत मैं फिरा कारण अपने राम। राम सरीखे संत मिले, जिन सारे सब काम।। कबीर परमात्मा हमें समझाने के लिए एक शिक्षक की तरह अपने उपर उदाहरण देकर कहते है मैंने भगवान को पर्वत पर्वत जंगलो में ढूंढा कहीं भगवान नही मिले। राम जैसे ज्ञानी संत मिले उन संतो से मेरा हर काम सफल हो गया। कबीर- तीर्थ जाये एक फल, संत मिले अनेक। फल पूर्ण संत के सतसंग से अनेक फल मिलते है मन का मैल दूर होता है आत्मा निर्मल होती है। पूर्ण संत की शरण लो वह पूर्ण गुरू आपको पूर्ण परमात्मा की भक्ति भी बतायेगा आपको ज्ञान भी मिलेगा और आपका समाधान भी करेगा। पूर्ण संत के पास से आप खाली हाथ नही आ सकते आपको ज्ञान मोक्ष मार्ग और समाधान मिलता है लेकिन इन पत्थरो को पूजने से कुछ नही मिलता। वेद, गीता मे नहीं लिखा कि पत्थर तीर्थ पूजो। लोग गाय को पूजते है ये मानकर गाय मे 33 करोड़ देवी देवताओं का वास है, पूर्ण संत से हमें तत्वज्ञान मिलता है। पूर्ण परमात्मा की पूजा विधि मिलती है जिससे पूर्ण मोक्ष होगा। हमारी रक्षा होगी! सतनाम सारनाम गायत्री तीन तरह के मंत्र मिले। जिनसे इतना कुछ मिला हमारे विकार दूर कर दिये......... Sant Rampal Ji Maharaj #कबीर
कबीर - मिरे रूपये हैःमेरा घर है॰ मेरा परिवार है॰ मैं ऐसा हूं , मैं यों कर दूंगा !! अरे॰ तूतो (प्रतिक्षण) मर रहा है॰ कर क्या देगा ? मिरे रूपये हैःमेरा घर है॰ मेरा परिवार है॰ मैं ऐसा हूं , मैं यों कर दूंगा !! अरे॰ तूतो (प्रतिक्षण) मर रहा है॰ कर क्या देगा ? - ShareChat
#GodNightTuesday #Kisan_Majdoor_Bachao_Abhiyan #बाढ़_का_स्थाई_समाधान_Phase2 . इंसान क्यो नही। अपने मकान का नवीकरण करने के लिये जापान मे एक मकान तोडा जा रहा था। यह मकान पांच साल पहले बनकर तैयार हुआ था। तभी वहां पर काम करने वाले व्यक्तियो ने देखा कि एक छिपकली दिवार मे उसके पैरो पर किल लगने कारण वहा पर जमी पडी है। जब उन्होंने यह दृश्य देखा तो बहूत दया आई। तभी उसको ध्यान आया कि यह कील तो पहले जब पाच साल पहले मकान बना था तब ठोकी गई थी। छिपकली पांच साल से जीवित थी। दिवार के अन्दर की तरफ अन्धेरे मे और हिलढुल भी नही सकती थी।वह अविश्वासनीय असम्भव व चौकाने वाला सच था। यह समझ से परे था कि एक छिपकली पांच साल तक बिना हिले डुले कैसे रह सकती है। उन व्यक्तियों ने छिपकली अब तक क्या करती रही और कैसे भोजन प्राप्त करती रही जानने के लिये काम रोक दिया और हर गतिविधि पर नजर बनाये रखी। थोडी देर बाद एक दुसरी छिपकली मुह मे भोजन दबा कर ना जाने कहां से आ गई। उस ठुकी हुई छिपकली को खाना खिलाने लग गई। यह एक अद्भुत नजारा था। जो कि हृदय को छू गया। एक छोटा जीव पीछले पांच साल से अपने साथी को भोजन करा रहा है। मनुष्य जीवन चौरासी लाख योणिया मे श्रृष्ट माना गया है। मनुष्य ये कार्य नही करता। आज के समाज में एक व्यक्ति बिमार हो जाता है या वृध्द अवस्था मे आ जाता है तो घर वाले उससे मुह मोडना शुरू कर देते है। मनुष्य जाति मे आपसी भाईचार व सदभावना प्रायकर खत्म हो गई है। सब लोग अपने स्वार्थ के लिये दुसरो को हानी पहुचा देते है। होना वही होता है जो परमात्मा को मंजूर होता है। Sant Rampal Ji Maharaj #कबीर
कबीर - जब छिपकली कर सकती है, तो हम क्यों नहीूं? Qeep da Se जापान में घटी औरकसे नोजनाको जररत को पूर एक करता रही हे अपना काम रोक दिया।  सच्ची घटना है थोड़ी ही देर बाद पता नहीं कहा  7 छिपकली अपने मुह भें से ி गोजन दबाये उस फसी हुइ छिपकली = अपने मकान का नवीनीकरण  कोखिलाने केलिये ! उप्फ! यह दृश्य  करे केलिये एकजापानी नकानको उसके दिल को अंदर तक छू गया।  दीवारें कोतोड़ रहाथा। तमी उसने  अद्धुत ! दूसरीछिपकलीनेअपने  देखा कि दीवार के अंदरःकी तरफ साथी के बचने की उम्मीद नर्ही छोड़ी लकड़ी पर एक छिपकली , चाहर से थी॰ बह पहली छिपकली को पिछले  उसके पैर पर कील के कारण  ठका पोँच साल से भोजन करवा रही थी।  एक ही जगह पर जमा पड़ी हे।  [ಕಹಾಔಔ-ಪ್ವಾಪತಕ್" अजीब हे जब उसने यह दृश्व देखातो उसे  यह कर सकता हे दवा आई।जब उसने आगे जांच  560` प्राणी, जिसे बुद्धि नें सर्वश्रेष्ठ होने का  ಕಗೆ 'ಾ [೯೯೯ ಈಳ ri ತಗಹ್ आशोर्वाद मिला हुआ है॰ नहीं कर मकान बनते समव पांच साल पहले  ठोकी गई धी।  सकता ! कृपवा अपने प्रिय लोगों को कभी  छिपकली इस स्थिति में पोँच  न छोड़ें ! उनकी तकलीफ के समय  মাল নন্ধতীনিন থী নীতাকে 34t अपनी पीठ न दिखायें! आज आप  पार्टशन के बीच, बिना हिले-डुले? सौभाग्यशाली हो सकते हैं पर कल तो अविश्वसनीय, असंभव और  यह अनिश्चित ही हे और कल चीजें बदल বীকষা নন নালা ঘা! शी सकती हैॅ ! कुछ भी बनाने के लिये  ওমক্কী মদন্স ম ৭ থা কি ব্ে भी लग सकता हे पर उसे पूरा जीवन  छिपकली , अपनी जगह से एक इंच तड़ने में एक पल भी नहीं लगता।  मी न हिली, वह कैसे जीवित रह प्रकृति ने हमारी अंगुलियों के बीच వాగౌ గై? भी इसीलिये दी है ताकि उसने यह देखने के लिये कि॰ शायद जगह  हम किसी दूसरे का हाथ थाम सके ! छिपकली अब तक क्या करती रही है  जब छिपकली कर सकती है, तो हम क्यों नहीूं? Qeep da Se जापान में घटी औरकसे नोजनाको जररत को पूर एक करता रही हे अपना काम रोक दिया।  सच्ची घटना है थोड़ी ही देर बाद पता नहीं कहा  7 छिपकली अपने मुह भें से ி गोजन दबाये उस फसी हुइ छिपकली = अपने मकान का नवीनीकरण  कोखिलाने केलिये ! उप्फ! यह दृश्य  करे केलिये एकजापानी नकानको उसके दिल को अंदर तक छू गया।  दीवारें कोतोड़ रहाथा। तमी उसने  अद्धुत ! दूसरीछिपकलीनेअपने  देखा कि दीवार के अंदरःकी तरफ साथी के बचने की उम्मीद नर्ही छोड़ी लकड़ी पर एक छिपकली , चाहर से थी॰ बह पहली छिपकली को पिछले  उसके पैर पर कील के कारण  ठका पोँच साल से भोजन करवा रही थी।  एक ही जगह पर जमा पड़ी हे।  [ಕಹಾಔಔ-ಪ್ವಾಪತಕ್" अजीब हे जब उसने यह दृश्व देखातो उसे  यह कर सकता हे दवा आई।जब उसने आगे जांच  560` प्राणी, जिसे बुद्धि नें सर्वश्रेष्ठ होने का  ಕಗೆ 'ಾ [೯೯೯ ಈಳ ri ತಗಹ್ आशोर्वाद मिला हुआ है॰ नहीं कर मकान बनते समव पांच साल पहले  ठोकी गई धी।  सकता ! कृपवा अपने प्रिय लोगों को कभी  छिपकली इस स्थिति में पोँच  न छोड़ें ! उनकी तकलीफ के समय  মাল নন্ধতীনিন থী নীতাকে 34t अपनी पीठ न दिखायें! आज आप  पार्टशन के बीच, बिना हिले-डुले? सौभाग्यशाली हो सकते हैं पर कल तो अविश्वसनीय, असंभव और  यह अनिश्चित ही हे और कल चीजें बदल বীকষা নন নালা ঘা! शी सकती हैॅ ! कुछ भी बनाने के लिये  ওমক্কী মদন্স ম ৭ থা কি ব্ে भी लग सकता हे पर उसे पूरा जीवन  छिपकली , अपनी जगह से एक इंच तड़ने में एक पल भी नहीं लगता।  मी न हिली, वह कैसे जीवित रह प्रकृति ने हमारी अंगुलियों के बीच వాగౌ గై? भी इसीलिये दी है ताकि उसने यह देखने के लिये कि॰ शायद जगह  हम किसी दूसरे का हाथ थाम सके ! छिपकली अब तक क्या करती रही है - ShareChat
#GodMorningMonday #दुर्लभ_दर्शन_संत_के करलो किस्मत वालों Sant Rampal Ji Maharaj #गीता तेरा ज्ञान अमृत ♦️गीता अध्याय 2 का श्लोक 17 👇👇 नाशरहित तो उसको जान (येन्) जिसका विनाश करने में कोई भी समर्थ नहीं है। पूर्ण परमात्मा अविनाशी है, वो कभी मरता नहीं। ♦️ गीता अध्याय 2 का श्लोक 19 👇👇 पूर्ण प्रभु दयालु है वह किसी को मारता नहीं। जो कहे कि आत्मा मरती है व पूर्ण परमात्मा किसी को मारता है, वे दोनों ही अज्ञानी हैं। ♦️गीता अध्याय 5 के श्लोक 25 👇👇 तत्वदर्शी संत से दीक्षा लेकर शास्त्रविधि अनुसार साधना करने से जिनके सब पाप नष्ट हो गए हैं वह सब प्राणियों का हितैषी होता है। वह सत्य भक्ति व शुभ कर्म करने वाला साधक सुखदायी परमात्मा सतपुरूष को प्राप्त होते हैं। ♦️गीता अध्याय 17 श्लोक 23 👇👇 ऊँ, तत्, सत्, इति, निर्देशः, ब्रह्मणः, त्रिविधः,स्मृतः ब्राह्मणाः, तेन, वेदाः, च, यज्ञाः, च विहिताः, पुरा।। सच्चिदानंद घन ब्रह्म का मन्त्र ‘‘ऊँ तत् सत्‘‘ है। इन तीनों मंत्रों के जाप से परम गति प्राप्त होगी। यह मन्त्र तुझे तत्वदर्शी संत देगे। इसकी उपासना तीन तरह से तीन बार मे होती है। 🙏🙏इस आध्यात्मिक रहस्य को जानने के लिए अवश्य देखें साधना चैनल हर रोज शाम 7:30 बजे। Sant Rampal Ji Maharaj #कबीर
कबीर - अवश्य जानिए SA NEWS श्रीमद्भगवद्गीता " यथारूप & महाराज  হাসণান: নিঃযুল্ক Rir శ ক& ব্র লিব ஈஈ 1= ^^ 4 *^> ননন্ধারী  7496801825 "44 अधिक  49 HNT7 श्रीमद्भगवत गीता जी अध्याय గ్రాగాగ अपना  Whatsapp  ೩ হলাক 23 ম রণিন 3 মনী ( स्धना। dd గౌ का भेद जानिए। देखिये साधना tu ७३० pm SA HEWS CHANNEL @SATLOKCHAHNEL 5A HEWS CHAHHEL; SAHEWECHANNEIL 5UPREHECOD ORC अवश्य जानिए SA NEWS श्रीमद्भगवद्गीता " यथारूप & महाराज  হাসণান: নিঃযুল্ক Rir శ ক& ব্র লিব ஈஈ 1= ^^ 4 *^> ননন্ধারী  7496801825 "44 अधिक  49 HNT7 श्रीमद्भगवत गीता जी अध्याय గ్రాగాగ अपना  Whatsapp  ೩ হলাক 23 ম রণিন 3 মনী ( स्धना। dd గౌ का भेद जानिए। देखिये साधना tu ७३० pm SA HEWS CHANNEL @SATLOKCHAHNEL 5A HEWS CHAHHEL; SAHEWECHANNEIL 5UPREHECOD ORC - ShareChat
#GodMorningMonday #दुर्लभ_दर्शन_संत_के करलो किस्मत वालों . #गीता_तेरा_ज्ञान_अमृत ♦️गीता अध्याय 7 का श्लोक 20 उन-उन भोगों की कामना द्वारा जिनका ज्ञान हरा जा चुका है वे लोग अज्ञान रूप अंधकार वाले नियम के आश्रय से अन्य देवताओं को पूजते हैं। ♦️गीता अध्याय 2 का श्लोक 17 नाशरहित तो उसको जान (येन्) जिसका विनाश करने में कोई भी समर्थ नहीं है। पूर्ण परमात्मा अविनाशी है, वो कभी मरता नहीं। ♦️गीता अध्याय 2 का श्लोक 19 पूर्ण प्रभु दयालु है वह किसी को मारता नहीं। जो कहे कि आत्मा मरती है व पूर्ण परमात्मा किसी को मारता है, वे दोनों ही अज्ञानी हैं। श्रीमद्भगवत गीता का ज्ञान श्री कृष्ण ने नहीं बोला, यह तो श्री कृष्ण जी के शरीर में प्रेतवत प्रवेश होकर ब्रह्म ने बोला था। ♦️गीता अध्याय 18 श्लोक 66 का भावार्थ है कि गीता ज्ञान दाता ने अपने से अन्य परमेश्वर की शरण में जाने के लिए कहा है। व्रज का अर्थ जाना है, परंतु संत रामपाल जी महाराज जी के अतिरिक्त सर्व अनुवादकों ने ‘‘व्रज’’ का अर्थ आना किया है। ♦️गीता अध्याय 5:25 तत्वदर्शी संत से दीक्षा लेकर शास्त्रविधि अनुसार साधना करने से जिनके सब पाप नष्ट हो गए हैं वह सब प्राणियों का हितैषी होता है। वह सत्य भक्ति व शुभ कर्म करने वाला साधक सुखदायी परमात्मा सतपुरूष को प्राप्त होते हैं। ♦️गीता अध्याय 17 श्लोक 23 ऊँ, तत्, सत्, इति, निर्देशः, ब्रह्मणः, त्रिविधः, स्मृतः ब्राह्मणाः, तेन, वेदाः, च, यज्ञाः, च विहिताः, पुरा।। सच्चिदानंद घन ब्रह्म की भक्ति का मन्त्र ‘‘ऊँ तत् सत्‘‘ है। इन तीनों मंत्रों के जाप से परम गति प्राप्त होगी। ♦️गीता अध्याय 5 का श्लोक 6 शास्त्रविधि रहित साधना के कारण दुःख ही प्राप्त होता है तथा शास्त्रानुकूल साधना से साधक प्रभु को अविलम्ब ही प्राप्त हो जाता है। ♦️गीता अध्याय 6 का श्लोक 16 भक्ति न तो एकान्त स्थान पर विशेष आसन या मुद्रा में बैठने से तथा न ही अत्यधिक खाने वाले की और न बिल्कुल न खाने वाले अर्थात् व्रत रखने वाले की तथा न ही बहुत शयन करने वाले की तथा न ही हठ करके अधिक जागने वाले की सिद्ध होती है। ♦️गीता अध्याय 10 का श्लोक 33, मैं अक्षरों में ओंकार हूँ। समाप्त न होने वाला काल तथा सब ओर मुखवाला विराट्स्वरूप धारण करनेवाला भी मैं ही हूँ। अध्याय 11:32 में भी गीता ज्ञान दाता स्वयं कहता है कि मैं काल हूँ। आध्यात्मिक जानकारी के लिए आप संत रामपाल जी महाराज जी के मंगलमय प्रवचन सुनिए। Sant Rampal Ji Maharaj YOUTUBE चैनल पर प्रतिदिन 7:30-8.30 बजे। संत रामपाल जी महाराज जी इस विश्व में एकमात्र पूर्ण संत हैं। आप सभी से विनम्र निवेदन है अविलंब संत रामपाल जी महाराज जी से नि:शुल्क नाम दीक्षा लें और अपना जीवन सफल बनाएं। Sant Rampal Ji Maharaj #कबीर
कबीर - NEIS शत शमपाल णी महाशज श्रीमद्यवत गीता के अध्याय 9 श्लोक २५ में ऐसा क्यों कहा गया हैकिजो पितर भूत   अधिक जामकारी फेरिए निःयूरक 3a हैँंग उ्हींकोपाप्तहोंगे३ देवता ~04.-- पूनते பப்பu5 CSATLOHCHANNEL SAEWSCHANMEL 5A HEV5 CHAHHEL OSAHEVSCKAHHLL  supnrhtoon Ono NEIS शत शमपाल णी महाशज श्रीमद्यवत गीता के अध्याय 9 श्लोक २५ में ऐसा क्यों कहा गया हैकिजो पितर भूत   अधिक जामकारी फेरिए निःयूरक 3a हैँंग उ्हींकोपाप्तहोंगे३ देवता ~04.-- पूनते பப்பu5 CSATLOHCHANNEL SAEWSCHANMEL 5A HEV5 CHAHHEL OSAHEVSCKAHHLL  supnrhtoon Ono - ShareChat
#GodMorningMonday #दुर्लभ_दर्शन_संत_के करलो किस्मत वालों # गीता तेरा ज्ञान अमृत # ♦️ गीता जी अध्याय 4 के श्लोक 31 से 40 तक मे गीता ज्ञान दाता जी ने श्री गीता जी में कहा की मेरा नाम(मंत्र) ऊँ है, ये वाचक है और मैं वाच्य हूँ। लेकिन जो सचिदानंद घन ब्रह्म (पुर्ण परमात्मा) है उसका ऩाम (मंत्र) ऊँ तत् सत् रूपी नाम से जाना जाता है। जिसके बारे में हे अर्जुन कोई तत्वदर्शी सन्त बताता है। अतःतत्वदर्शी सन्त की महिमा को जानने के लिए सभी जिज्ञासु और मुमुक आत्माएं श्री गीता जी के अध्याय 4 के श्लोक 31 से 40 का मर्म समझिये। यज्ञशिष्टामृृतभुजः, यान्ति, ब्रह्म, सनातनम्, न, अयम्, लोकः, अस्ति, अयज्ञस्य, कुतः, अन्यः, कुरुसत्तम।।31।। अनुवाद: (कुरुसत्तम) हे कुरुक्षेष्ठ अर्जुन! (यज्ञशिष्टामृतभुजः) उपरोक्त शास्त्राविधि रहित साधनाओं से बचे हुए बुद्धिमान साधक शास्त्र अनुकूल साधना से बचे हुए लाभ को उपभोग करके (सनातनम् ब्रह्म) आदि पुरुष परमेश्वर अर्थात्-पूर्णब्रह्म को (यान्ति) प्राप्त होते हैं और (अयज्ञस्य) शास्त्र विधि अनुसार पूर्ण प्रभु की भक्ति न करने वाले पुरुष के लिये तो (अयम्) यह (लोकः) मनुष्य-लोक भी सुखदायक (न) नहीं (अस्ति) है फिर (अन्यः) परलोक (कुतः) कैसे सुखदायक हो सकता है?(31) भावार्थ:- यज्ञ से बचे हुए अमृृत का भोग करने का अभिप्रायः है कि ‘‘पूर्ण परमात्मा की साधना करने वाले साधक अपने शरीर के कमलों को खोलने वाले मन्त्र का जाप करते हैं। वे मन्त्र श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जी तथा श्री शिव जी ,श्री दुर्गा जी व गणेश जी के जाप भी हैं जो संसारिक सुख प्राप्त कराते हैं। इन के मन्त्र जाप से उपरोक्त देवी व देवताओं के ऋण से मुक्ति मिलती है जो मन्त्र जाप की ऋण उतरने के पश्चात् शेष कमाई है उस शेष जाप की कमाई से पूर्ण परमात्मा के साधक को अत्यधिक संसारिक लाभ प्राप्त होता है। इस श्लोक 31 में यही कहा है कि पूर्ण परमात्मा का साधक यज्ञ अर्थात् साधना (अनुष्ठान) से बची शेष भक्ति कमाई का उपयोग करके पूर्ण परमात्मा को प्राप्त हो जाता है। भावार्थ है कि पूर्ण परमात्मा के विधिवत् साधक को संसारिक सुख भी अधिक प्राप्त होता है तथा पूर्ण मोक्ष भी प्राप्त होता है। विशेष - यही प्रमाण पवित्र गीता अध्याय 3 श्लोक 13 में वर्णन है तथा अध्याय 16 श्लोक 23-24 में भी है कि हे भारत जो साधक शास्त्र विधि त्याग कर मनमाना आचरण अर्थात् मनमुखी पूजा करते हैं उनको न तो कोई सुख प्राप्त होता है, न सिद्धि तथा न ही कोई गति प्राप्त होती है अर्थात् व्यर्थ है। इसलिए शास्त्रों में अर्थात् वेदों में जो भक्ति साधना के कर्म करने का आदेश है तथा जो न करने का आदेश है वही मानना श्रेयकर है। ♦️अध्याय 4 का श्लोक 32👇👇 एवम्, बहुविधाः, यज्ञाः, वितताः, ब्रह्मणः, मुखे, कर्मजान्, विद्धि, तान्, सर्वान्, एवम्, ज्ञात्वा, विमोक्ष्यसे।।32।। अनुवाद: (एवम्) इस प्रकार और भी (बहुविधाः) बहुत तरह के शास्त्राअनुसार (यज्ञाः) धार्मिक क्रियाऐं हैं (तान्) उन (सर्वान्) सबको तू (कर्मजान्) कर्मों के द्वारा होने वाली यज्ञों को (विद्धि) जान (एवम्) इस प्रकार (ब्रह्मणः) पूर्ण परमात्माके (मुखे) मुख कमल से (वितताः) पाँचवे वेद अर्थात् स्वसम वेद में विस्तार से कहे गये हैं। (ज्ञात्वा) जानकर (विमोक्ष्यसे) पूर्ण मुक्त हो जायगा। (32) ♦️अध्याय 4 का श्लोक 33 👇👇 श्रेयान्, द्रव्यमयात्, यज्ञात्, ज्ञानयज्ञः, परन्तप, सर्वम्, कर्म, अखिलम्, पार्थ, ज्ञाने, परिसमाप्यते।।33।। अनुवाद: (परन्तप, पार्थ) हे परंतप अर्जुन! (द्रव्यमयात्) द्रव्यमय अर्थात् धन के द्वारा किये जाने वाले दान, भण्डारे आदि (यज्ञात्) यज्ञ अर्थात् धार्मिक कर्मों की अपेक्षा (ज्ञानयज्ञः) ज्ञानयज्ञ (श्रेयान्) अत्यन्त श्रेष्ठ है तथा (सर्वम्) सम्पूर्ण (कर्म)शास्त्रा अनुकूल कर्म (अखिलम् ज्ञाने) सम्पूर्ण ज्ञान अर्थात् तत्वज्ञान में (परिसमाप्यते) समाप्त हो जाते हैं। (33) ♦️अध्याय 4 का श्लोक 34 👇👇 तत्, विद्धि, प्रणिपातेन, परिप्रश्नेन, सेवया, उपदेक्ष्यन्ति, ते, ज्ञानम्, ज्ञानिनः, तत्त्वदर्शिनः।।34।। अनुवाद: पवित्र गीता बोलने वाला प्रभु कह रहा है कि उपरोक्त नाना प्रकार की साधना तो मनमाना आचरण है। मेरे तक की साधना की अटकल लगाया ज्ञान है, परन्तु पूर्ण परमात्मा के पूर्ण मोक्ष मार्ग का मुझे भी ज्ञान नहीं है। उसके लिए इस मंत्र 34 में कहा है कि उस (तत्) तत्वज्ञान को (विद्धि) समझ उन पूर्ण परमात्मा के वास्तविक ज्ञान व समाधान को जानने वाले संतों को (प्रणिपातेन) भलीभाँति दण्डवत् प्रणाम करने से उनकी (सेवया) सेवा करने से और कपट छोड़कर (परिप्रश्नेन) सरलतापूर्वक प्रश्न करने से (ते) वे (तत्वदर्शिनः) पूर्ण ब्रह्म को तत्व से जानने वाले अर्थात् तत्वदर्शी (ज्ञानिनः) ज्ञानी महात्मा तुझे उस (ज्ञानम्) तत्वज्ञान का (उपदेक्ष्यन्ति) उपदेश करेंगे। (34) इसी का प्रमाण गीता अध्याय 2 श्लोक 15-16 में भी है। ♦️अध्याय 4 का श्लोक 35 👇👇 यत्, ज्ञात्वा, न, पुनः, मोहम्, एवम्, यास्यसि, पाण्डव, येन, भूतानि, अशेषेण, द्रक्ष्यसि, आत्मनि, अथो, मयि।।35।। अनुवाद: (यत्) जिस तत्वज्ञान को (ज्ञात्वा) जानकर (पुनः) फिर तू (एवम्) इस प्रकार (मोहम्) मोह को (न) नहीं (यास्यसि) प्राप्त होगा तथा (पाण्डव) हे अर्जुन! (येन) जिस ज्ञान के द्वारा तू (भूतानि) प्राणियों को (अशेषेण) पूर्ण रूप से (आत्मनि) पूर्ण परमात्मा जो आत्मा के साथ अभेद रूप में रहता है उस पूर्ण परमात्मा में (अथो) और पीछे (मयि) मुझे (द्रक्ष्यसि) देखेगा कि मैं काल हूँ यह जान जाएगा। (35) ♦️अध्याय 4 का श्लोक 36 👇👇 अपि, चेत्, असि, पापेभ्यः, सर्वेभ्यः, पापकृत्तमः, सर्वम्, ज्ञानप्लवेन, एव, वृजिनम्, सन्तरिष्यसि।।36।। अनुवाद: (चेत्) यदि तू अन्य (सर्वेभ्यः) सब (पापेभ्यः) पापियों से (अपि) भी (पापकृृत्तमः) अधिक पाप करने वाला (असि) है तो भी तू (ज्ञानप्लवेन) तत्वज्ञान के आधार पर वास्तविक नाम रूपी नौका द्वारा (सर्वम्) सर्वस जानकर (वृजिनम्) अज्ञान से पार जाकर (एव) निःसन्देह (सन्तरिष्यसि) पूर्ण तरह तर जायेगा अर्थात् पाप रहित होकर पूर्ण मुक्त हो जायेगा। (36) ♦️अध्याय 4 का श्लोक 37 👇👇 यथा, एधांसि, समिद्धः, अग्निः, भस्मसात्, कुरुते, अर्जुन, ज्ञानाग्निः, सर्वकर्माणि, भस्मसात्, कुरुते, तथा।।37।। अनुवाद: (अर्जुन) हे अर्जुन! (यथा) जैसे (समिद्धः) प्रज्वलित (अग्निः) अग्नि (एधांसि) ईंधनों को (भस्मसात्) भस्ममय (कुरुते) कर देता है (तथा) वैसे ही (ज्ञानाग्निः) तत्वज्ञान रूप अग्नि (सर्वकर्माणि) सम्पूर्ण अविधिवत् कर्मों को (भस्मसात्) भस्ममय (कुरुते) कर देता है। (37) ♦️अध्याय 4 का श्लोक 38 👇👇 न, हि, ज्ञानेन, सदृृशम्, पवित्राम्, इह, विद्यते, तत् स्वयम्, योगसंसिद्धः, कालेन, आत्मनि, विन्दति।।38।। अनुवाद: (इह) इस संसार में तत्वज्ञान के (सदृृशम्) समान (पवित्राम्) पवित्र करने वाला (हि) निःसन्देह कुछ भी (न) नहीं (विद्यते) जान पड़ता (योगसंसिद्धः) उस तत्वदर्शी संत के द्वारा दिए सत भक्ति मार्ग के द्वारा जिसकी भक्ति कमाई पूर्ण हो चुकी है (कालेन) समय अनुसार (तत् आत्मनि) आत्मा के साथ अभेद रूप में रहने वाले उस पूर्ण परमात्मा को गीता अध्याय 8 श्लोक 8 से 10 में वर्णित उल्लेख के आधार से(स्वयम्) अपने आप ही (विन्दति) प्राप्त कर लेता है। (38) ♦️अध्याय 4 का श्लोक 39 👇👇 श्रद्धावान्, लभते, ज्ञानम्, तत्परः, संयतेन्द्रियः, ज्ञानम्, लब्ध्वा, पराम्, शान्तिम्, अचिरेण, अधिगच्छति।।39।। अनुवाद: (संयतेन्द्रियः) जितेन्द्रिय (तत्परः) उस तत्वदर्शी संत द्वारा प्राप्त साधन के साधनपरायण (श्रद्धावान्) श्रद्धावान् मनुष्य भक्ति की उपलब्धि होने पर पूर्ण परमेश्वर के (ज्ञानम्) तत्वज्ञान को (लभते) प्राप्त होता है तथा (ज्ञानम्) तत्वज्ञान को (लब्ध्वा) प्राप्त होकर वह (अचिरेण) बिना विलम्ब के तत्काल ही भगवत्प्राप्तिरूप (पराम्) परम (शान्तिम्) शान्ति को (अधिगच्छति) प्राप्त हो जाता है। (39) ♦️अध्याय 4 का श्लोक 40 👇👇 अज्ञः, च, अश्रद्दधानः, च, संशयात्मा, विनश्यति, न, अयम् लोकः, अस्ति, न, परः, न, सुखम्, संशयात्मनः।।40।। अनुवाद: जो साधक उस तत्वदर्शी संत के ज्ञान व साधना पर अविश्वास करता है वह (अज्ञः) विवेकहीन (च) और (अश्रद्दधानः) श्रद्धारहित (च) तथा (संशयात्मा) संश्ययुक्त मनुष्य (विनश्यति) भक्ति मार्ग से अवश्य भ्रष्ट हो जाता है ऐसे (संशयात्मनः) संश्ययुक्त मनुष्य के लिये (न) न (अयम्) यह (लोकः) लोक में (न) न (परः) परलोक में (सुखम्) सुख (न अस्ति) नहीं है। (40) इसी का प्रमाण गीता अध्याय 6 श्लोक 40 में भी है। अधिक जानकारी के लिए Sant Rampal Ji Maharaj App डाउनलोड करें इसे Google Play पर प्राप्त करें। Sant Rampal Ji Maharaj #कबीर
कबीर - ऊँ   नाम का जाप ब्रह्म काहै। इएकी साधना से ब्रह्य लोक प्राप्त होता है जिसके विषय में गीता अध्याय 8 श्लोक १६ मे कह्ा है कि ब्रह्य लोक मैं गए साधक भी पुनर्जन्म को होते है। ull Sant Rampal Ji Maharaj संत रामपाल जी महाराज जी से App Download कीजिये নি:থুল্ক: नामदीक्षा व निःशुल्क  Ca 0 लिये संपर्क सूत्र : पुस्तक प्राप्त करने के Play +91 7496801823 Google [ SPIRITUAL LEADER SANT RAMPAL Jl @SAINTRAMPALIM SUPREMEGOD.ORG SAINT RAMPAL JI MAHARAJ ऊँ   नाम का जाप ब्रह्म काहै। इएकी साधना से ब्रह्य लोक प्राप्त होता है जिसके विषय में गीता अध्याय 8 श्लोक १६ मे कह्ा है कि ब्रह्य लोक मैं गए साधक भी पुनर्जन्म को होते है। ull Sant Rampal Ji Maharaj संत रामपाल जी महाराज जी से App Download कीजिये নি:থুল্ক: नामदीक्षा व निःशुल्क  Ca 0 लिये संपर्क सूत्र : पुस्तक प्राप्त करने के Play +91 7496801823 Google [ SPIRITUAL LEADER SANT RAMPAL Jl @SAINTRAMPALIM SUPREMEGOD.ORG SAINT RAMPAL JI MAHARAJ - ShareChat
#GodMorningMonday #दुर्लभ_दर्शन_संत_के करलो किस्मत वालों . पागल हाथी प्रताप को भगवान पर गहरी और सच्ची आस्था थी। उन्हें विश्वास था कि भगवान हर किसी में, हर चीज़ में और हर जगह मौजूद हैं। एक दिन जब वह मंदिर जा रहे थे, तो एक आदमी दौड़ता हुआ उनके पास आया और चिल्लाया। अरे! एक पागल हाथी इधर भाग रहा है। यह सब कुछ कुचल रहा है। यहाँ से हट जाओ! दूसरे राहगीर डर के मारे भाग खड़े हुए, लेकिन प्रताप ने सोचा कि यह हाथी भी भगवान का रूप है। वह भगवान से क्यों भागे? प्रताप सड़क के बीच में खड़ा हो गया और हाथी का इंतजार करने लगा। महावत ने उसे फिर चेतावनी दी कि भाग जाओ! कहीं छिप जाओ। लेकिन प्रताप नहीं माना। हाथी जोरदार कदमों से पास आया और अपनी सूंड में प्रताप को जकड़कर एक तरफ फेंक दिया। प्रताप बेहोश हो गए और उन्हें घायल अवस्था में घर ले जाया गया। जब होश में आए, तो उनके गुरु ने उनसे पूछा कि तुम्हें पता था कि पागल हाथी आ रहा है, फिर भी तुम क्यों नहीं भागे? प्रताप ने जवाब दिया कि भगवान की शक्ति हर जगह हैं। पशु और मानव रूप में आत्मा का प्रतिबिम्ब है। इसलिए मुझे लगा कि भगवान हाथी के रूप में प्रकट हो रहे हैं। गुरु जी ने मुस्कराते हुए कहा कि बिल्कुल सही, भगवान की शक्ति हर जगह हैं। पागल हाथी-भगवान तुम्हारी ओर आ रहे थे, लेकिन महावत-भगवान ने तुम्हें वहाँ से हट जाने के लिए कहा था। तुमने महावत-भगवान की चेतावनी क्यों नहीं सुनी? प्रताप को समझ आया कि भले ही भगवान हर जगह हैं, लेकिन उनकी चेतावनियों को भी सुनना आवश्यक है। उन्होंने सीखा कि सच्ची आस्था में विवेक और समझ का होना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। 🙏🙏इस आध्यात्मिक रहस्य को जानने के लिए अवश्य देखें साधना चैनल हर रोज शाम 7:30 बजे। Sant Rampal Ji Maharaj #कबीर
कबीर - NEWS हरियाणा हाथी UG Folowus On: SA News Channel SNews Haryana SANEWS.in NEWS हरियाणा हाथी UG Folowus On: SA News Channel SNews Haryana SANEWS.in - ShareChat
#GodMorningMonday #दुर्लभ_दर्शन_संत_के करलो किस्मत वालों # गीता तेरा ज्ञान अमृत # ♦️ गीता जी अध्याय 4 के श्लोक 31 से 40 तक मे गीता ज्ञान दाता जी ने श्री गीता जी में कहा की मेरा नाम(मंत्र) ऊँ है, ये वाचक है और मैं वाच्य हूँ। लेकिन जो सचिदानंद घन ब्रह्म (पुर्ण परमात्मा) है उसका ऩाम (मंत्र) ऊँ तत् सत् रूपी नाम से जाना जाता है। जिसके बारे में हे अर्जुन कोई तत्वदर्शी सन्त बताता है। अतःतत्वदर्शी सन्त की महिमा को जानने के लिए सभी जिज्ञासु और मुमुक आत्माएं श्री गीता जी के अध्याय 4 के श्लोक 31 से 40 का मर्म समझिये। यज्ञशिष्टामृृतभुजः, यान्ति, ब्रह्म, सनातनम्, न, अयम्, लोकः, अस्ति, अयज्ञस्य, कुतः, अन्यः, कुरुसत्तम।।31।। अनुवाद: (कुरुसत्तम) हे कुरुक्षेष्ठ अर्जुन! (यज्ञशिष्टामृतभुजः) उपरोक्त शास्त्राविधि रहित साधनाओं से बचे हुए बुद्धिमान साधक शास्त्र अनुकूल साधना से बचे हुए लाभ को उपभोग करके (सनातनम् ब्रह्म) आदि पुरुष परमेश्वर अर्थात्-पूर्णब्रह्म को (यान्ति) प्राप्त होते हैं और (अयज्ञस्य) शास्त्र विधि अनुसार पूर्ण प्रभु की भक्ति न करने वाले पुरुष के लिये तो (अयम्) यह (लोकः) मनुष्य-लोक भी सुखदायक (न) नहीं (अस्ति) है फिर (अन्यः) परलोक (कुतः) कैसे सुखदायक हो सकता है?(31) भावार्थ:- यज्ञ से बचे हुए अमृृत का भोग करने का अभिप्रायः है कि ‘‘पूर्ण परमात्मा की साधना करने वाले साधक अपने शरीर के कमलों को खोलने वाले मन्त्र का जाप करते हैं। वे मन्त्र श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जी तथा श्री शिव जी ,श्री दुर्गा जी व गणेश जी के जाप भी हैं जो संसारिक सुख प्राप्त कराते हैं। इन के मन्त्र जाप से उपरोक्त देवी व देवताओं के ऋण से मुक्ति मिलती है जो मन्त्र जाप की ऋण उतरने के पश्चात् शेष कमाई है उस शेष जाप की कमाई से पूर्ण परमात्मा के साधक को अत्यधिक संसारिक लाभ प्राप्त होता है। इस श्लोक 31 में यही कहा है कि पूर्ण परमात्मा का साधक यज्ञ अर्थात् साधना (अनुष्ठान) से बची शेष भक्ति कमाई का उपयोग करके पूर्ण परमात्मा को प्राप्त हो जाता है। भावार्थ है कि पूर्ण परमात्मा के विधिवत् साधक को संसारिक सुख भी अधिक प्राप्त होता है तथा पूर्ण मोक्ष भी प्राप्त होता है। विशेष - यही प्रमाण पवित्र गीता अध्याय 3 श्लोक 13 में वर्णन है तथा अध्याय 16 श्लोक 23-24 में भी है कि हे भारत जो साधक शास्त्र विधि त्याग कर मनमाना आचरण अर्थात् मनमुखी पूजा करते हैं उनको न तो कोई सुख प्राप्त होता है, न सिद्धि तथा न ही कोई गति प्राप्त होती है अर्थात् व्यर्थ है। इसलिए शास्त्रों में अर्थात् वेदों में जो भक्ति साधना के कर्म करने का आदेश है तथा जो न करने का आदेश है वही मानना श्रेयकर है। ♦️अध्याय 4 का श्लोक 32👇👇 एवम्, बहुविधाः, यज्ञाः, वितताः, ब्रह्मणः, मुखे, कर्मजान्, विद्धि, तान्, सर्वान्, एवम्, ज्ञात्वा, विमोक्ष्यसे।।32।। अनुवाद: (एवम्) इस प्रकार और भी (बहुविधाः) बहुत तरह के शास्त्राअनुसार (यज्ञाः) धार्मिक क्रियाऐं हैं (तान्) उन (सर्वान्) सबको तू (कर्मजान्) कर्मों के द्वारा होने वाली यज्ञों को (विद्धि) जान (एवम्) इस प्रकार (ब्रह्मणः) पूर्ण परमात्माके (मुखे) मुख कमल से (वितताः) पाँचवे वेद अर्थात् स्वसम वेद में विस्तार से कहे गये हैं। (ज्ञात्वा) जानकर (विमोक्ष्यसे) पूर्ण मुक्त हो जायगा। (32) ♦️अध्याय 4 का श्लोक 33 👇👇 श्रेयान्, द्रव्यमयात्, यज्ञात्, ज्ञानयज्ञः, परन्तप, सर्वम्, कर्म, अखिलम्, पार्थ, ज्ञाने, परिसमाप्यते।।33।। अनुवाद: (परन्तप, पार्थ) हे परंतप अर्जुन! (द्रव्यमयात्) द्रव्यमय अर्थात् धन के द्वारा किये जाने वाले दान, भण्डारे आदि (यज्ञात्) यज्ञ अर्थात् धार्मिक कर्मों की अपेक्षा (ज्ञानयज्ञः) ज्ञानयज्ञ (श्रेयान्) अत्यन्त श्रेष्ठ है तथा (सर्वम्) सम्पूर्ण (कर्म)शास्त्रा अनुकूल कर्म (अखिलम् ज्ञाने) सम्पूर्ण ज्ञान अर्थात् तत्वज्ञान में (परिसमाप्यते) समाप्त हो जाते हैं। (33) ♦️अध्याय 4 का श्लोक 34 👇👇 तत्, विद्धि, प्रणिपातेन, परिप्रश्नेन, सेवया, उपदेक्ष्यन्ति, ते, ज्ञानम्, ज्ञानिनः, तत्त्वदर्शिनः।।34।। अनुवाद: पवित्र गीता बोलने वाला प्रभु कह रहा है कि उपरोक्त नाना प्रकार की साधना तो मनमाना आचरण है। मेरे तक की साधना की अटकल लगाया ज्ञान है, परन्तु पूर्ण परमात्मा के पूर्ण मोक्ष मार्ग का मुझे भी ज्ञान नहीं है। उसके लिए इस मंत्र 34 में कहा है कि उस (तत्) तत्वज्ञान को (विद्धि) समझ उन पूर्ण परमात्मा के वास्तविक ज्ञान व समाधान को जानने वाले संतों को (प्रणिपातेन) भलीभाँति दण्डवत् प्रणाम करने से उनकी (सेवया) सेवा करने से और कपट छोड़कर (परिप्रश्नेन) सरलतापूर्वक प्रश्न करने से (ते) वे (तत्वदर्शिनः) पूर्ण ब्रह्म को तत्व से जानने वाले अर्थात् तत्वदर्शी (ज्ञानिनः) ज्ञानी महात्मा तुझे उस (ज्ञानम्) तत्वज्ञान का (उपदेक्ष्यन्ति) उपदेश करेंगे। (34) इसी का प्रमाण गीता अध्याय 2 श्लोक 15-16 में भी है। ♦️अध्याय 4 का श्लोक 35 👇👇 यत्, ज्ञात्वा, न, पुनः, मोहम्, एवम्, यास्यसि, पाण्डव, येन, भूतानि, अशेषेण, द्रक्ष्यसि, आत्मनि, अथो, मयि।।35।। अनुवाद: (यत्) जिस तत्वज्ञान को (ज्ञात्वा) जानकर (पुनः) फिर तू (एवम्) इस प्रकार (मोहम्) मोह को (न) नहीं (यास्यसि) प्राप्त होगा तथा (पाण्डव) हे अर्जुन! (येन) जिस ज्ञान के द्वारा तू (भूतानि) प्राणियों को (अशेषेण) पूर्ण रूप से (आत्मनि) पूर्ण परमात्मा जो आत्मा के साथ अभेद रूप में रहता है उस पूर्ण परमात्मा में (अथो) और पीछे (मयि) मुझे (द्रक्ष्यसि) देखेगा कि मैं काल हूँ यह जान जाएगा। (35) ♦️अध्याय 4 का श्लोक 36 👇👇 अपि, चेत्, असि, पापेभ्यः, सर्वेभ्यः, पापकृत्तमः, सर्वम्, ज्ञानप्लवेन, एव, वृजिनम्, सन्तरिष्यसि।।36।। अनुवाद: (चेत्) यदि तू अन्य (सर्वेभ्यः) सब (पापेभ्यः) पापियों से (अपि) भी (पापकृृत्तमः) अधिक पाप करने वाला (असि) है तो भी तू (ज्ञानप्लवेन) तत्वज्ञान के आधार पर वास्तविक नाम रूपी नौका द्वारा (सर्वम्) सर्वस जानकर (वृजिनम्) अज्ञान से पार जाकर (एव) निःसन्देह (सन्तरिष्यसि) पूर्ण तरह तर जायेगा अर्थात् पाप रहित होकर पूर्ण मुक्त हो जायेगा। (36) ♦️अध्याय 4 का श्लोक 37 👇👇 यथा, एधांसि, समिद्धः, अग्निः, भस्मसात्, कुरुते, अर्जुन, ज्ञानाग्निः, सर्वकर्माणि, भस्मसात्, कुरुते, तथा।।37।। अनुवाद: (अर्जुन) हे अर्जुन! (यथा) जैसे (समिद्धः) प्रज्वलित (अग्निः) अग्नि (एधांसि) ईंधनों को (भस्मसात्) भस्ममय (कुरुते) कर देता है (तथा) वैसे ही (ज्ञानाग्निः) तत्वज्ञान रूप अग्नि (सर्वकर्माणि) सम्पूर्ण अविधिवत् कर्मों को (भस्मसात्) भस्ममय (कुरुते) कर देता है। (37) ♦️अध्याय 4 का श्लोक 38 👇👇 न, हि, ज्ञानेन, सदृृशम्, पवित्राम्, इह, विद्यते, तत् स्वयम्, योगसंसिद्धः, कालेन, आत्मनि, विन्दति।।38।। अनुवाद: (इह) इस संसार में तत्वज्ञान के (सदृृशम्) समान (पवित्राम्) पवित्र करने वाला (हि) निःसन्देह कुछ भी (न) नहीं (विद्यते) जान पड़ता (योगसंसिद्धः) उस तत्वदर्शी संत के द्वारा दिए सत भक्ति मार्ग के द्वारा जिसकी भक्ति कमाई पूर्ण हो चुकी है (कालेन) समय अनुसार (तत् आत्मनि) आत्मा के साथ अभेद रूप में रहने वाले उस पूर्ण परमात्मा को गीता अध्याय 8 श्लोक 8 से 10 में वर्णित उल्लेख के आधार से(स्वयम्) अपने आप ही (विन्दति) प्राप्त कर लेता है। (38) ♦️अध्याय 4 का श्लोक 39 👇👇 श्रद्धावान्, लभते, ज्ञानम्, तत्परः, संयतेन्द्रियः, ज्ञानम्, लब्ध्वा, पराम्, शान्तिम्, अचिरेण, अधिगच्छति।।39।। अनुवाद: (संयतेन्द्रियः) जितेन्द्रिय (तत्परः) उस तत्वदर्शी संत द्वारा प्राप्त साधन के साधनपरायण (श्रद्धावान्) श्रद्धावान् मनुष्य भक्ति की उपलब्धि होने पर पूर्ण परमेश्वर के (ज्ञानम्) तत्वज्ञान को (लभते) प्राप्त होता है तथा (ज्ञानम्) तत्वज्ञान को (लब्ध्वा) प्राप्त होकर वह (अचिरेण) बिना विलम्ब के तत्काल ही भगवत्प्राप्तिरूप (पराम्) परम (शान्तिम्) शान्ति को (अधिगच्छति) प्राप्त हो जाता है। (39) ♦️अध्याय 4 का श्लोक 40 👇👇 अज्ञः, च, अश्रद्दधानः, च, संशयात्मा, विनश्यति, न, अयम् लोकः, अस्ति, न, परः, न, सुखम्, संशयात्मनः।।40।। अनुवाद: जो साधक उस तत्वदर्शी संत के ज्ञान व साधना पर अविश्वास करता है वह (अज्ञः) विवेकहीन (च) और (अश्रद्दधानः) श्रद्धारहित (च) तथा (संशयात्मा) संश्ययुक्त मनुष्य (विनश्यति) भक्ति मार्ग से अवश्य भ्रष्ट हो जाता है ऐसे (संशयात्मनः) संश्ययुक्त मनुष्य के लिये (न) न (अयम्) यह (लोकः) लोक में (न) न (परः) परलोक में (सुखम्) सुख (न अस्ति) नहीं है। (40) इसी का प्रमाण गीता अध्याय 6 श्लोक 40 में भी है। अधिक जानकारी के लिए Sant Rampal Ji Maharaj App डाउनलोड करें इसे Google Play पर प्राप्त करें। Sant Rampal Ji Maharaj #कबीर
कबीर - तत्वदर्शी गीता अध्याय 4 श्लोक ३४ में संकेत किया गया है कि पूर्ण ज्ञान के लिये संत तत्वदर्शी वही बताएंगे। के पास जा , वह तत्वदर्शी संत कौन है? जानने के लिये अवश्य पढ़ें पवित्र पुस्तक ज्ञान गंगा। संत रामपाल जी महाराज जी से Sant Rampal Ji Maharaj App Download कीजिये  ব নিঃথুল্ক  নি:থুল্ক : नामदीक्षा पुस्तक प्राप्त करने के लिये संपर्क सूत्र +91 7496801823 Googe Play SPIRITUAL LEADER' SANT RAMPAL Ji SUPREMEGOD ORG @SAINTRAMPALIM SAINT RAMPAL Ji MAHARA तत्वदर्शी गीता अध्याय 4 श्लोक ३४ में संकेत किया गया है कि पूर्ण ज्ञान के लिये संत तत्वदर्शी वही बताएंगे। के पास जा , वह तत्वदर्शी संत कौन है? जानने के लिये अवश्य पढ़ें पवित्र पुस्तक ज्ञान गंगा। संत रामपाल जी महाराज जी से Sant Rampal Ji Maharaj App Download कीजिये  ব নিঃথুল্ক  নি:থুল্ক : नामदीक्षा पुस्तक प्राप्त करने के लिये संपर्क सूत्र +91 7496801823 Googe Play SPIRITUAL LEADER' SANT RAMPAL Ji SUPREMEGOD ORG @SAINTRAMPALIM SAINT RAMPAL Ji MAHARA - ShareChat