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#मेरी कविता #📚कविता-कहानी संग्रह
मेरी कविता - अफ़सोस के नजराने कितने बड़े थे कि हर शख्स़ को अपने ही आंसू गैर ना लगे थे निकाली खामियां दिनकर में इतनी कि फिर चंदा पर दाग ना दिखे थे कैसे कैसे लोग यहां जमा हुए थे पूछो मत की उन्हें फिजा में बिखरे दर्द ना दिखे थे नकाब में इतने क्या मंतव्य छुपे थे कि असल सूरत में नायाब सीरत से ना दिखे थे थोड़ा दिखाना था हकीकत को भी की पैंतरे हुनर के इतने भी न बदलने थे माना तुम हो दिलखुश अंदाज के कि हमारे परचम पर ना लिए मजे थे पर देख कर किस्मत की आजमाइश हमारी कि दिल खोलकर बिन तमाशे पर क्यूं हंसे थे..? स्वाती छीपा अफ़सोस के नजराने कितने बड़े थे कि हर शख्स़ को अपने ही आंसू गैर ना लगे थे निकाली खामियां दिनकर में इतनी कि फिर चंदा पर दाग ना दिखे थे कैसे कैसे लोग यहां जमा हुए थे पूछो मत की उन्हें फिजा में बिखरे दर्द ना दिखे थे नकाब में इतने क्या मंतव्य छुपे थे कि असल सूरत में नायाब सीरत से ना दिखे थे थोड़ा दिखाना था हकीकत को भी की पैंतरे हुनर के इतने भी न बदलने थे माना तुम हो दिलखुश अंदाज के कि हमारे परचम पर ना लिए मजे थे पर देख कर किस्मत की आजमाइश हमारी कि दिल खोलकर बिन तमाशे पर क्यूं हंसे थे..? स्वाती छीपा - ShareChat