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‼️दो बातें मूर्खता से होती हैं ‼️ 1- दुःख तो दूसरे ने दे दिया‒ परो ददातीति और 2- सुख मैं अपने उद्योग से कर लेता हूँ ‒अहं करोमीति। 👩‍❤️‍👩अगर अपने उद्योग से सुख होता तो आज कोई दुःखी नहीं होता । दूसरे को दुःख देने वाला कभी सुखी नहीं हो सकता‒यह सिद्धान्त है । जो दुःख देने के लिये पीछे पड़ा है, उसको भयंकर पाप लगेगा और भयंकर दुःख भोगना पड़ेगा । परन्तु जिसको दुःख मिलता है, उसका तो *प्रारब्ध* है । सर्वसमर्थ और परम सुहृद् परमात्मा के जीते-जी कोई दुःख दे सकता है ? मैंने पहले भी एक बात सुनायी थी कि एक नगर के किनारे जंगल में एक बाबाजी बैठे भजन कर रहे थे । वहाँ से कई आदमी धन लूट करके भाग रहे थे । पुलिस पीछे पड़ी थी । उन्होंने देखा कि मारे जायँगे तो बाबजी के पास धन रखकर छिप गये । पुलिस वहाँ आयी और धन देखकर बाबाजी को मारने लगी । बाबाजी बोले‒ ‘बधूं तू जाणे छे’ ‘हे नाथ ! सब आप जानते हो’ । इसका अर्थ यह हुआ कि मैंने अपनी जानकारी में किसी को दुःख दिया नहीं और मार पड़ रही है तो मैं जानता नहीं कि किस कर्म का फल है । हे भगवन्‌ ! आप ही जानो, हमारे को इसका पता नहीं है । बिना कसूर मार पड़ती है, इतने पर भी उन्होंने किसी को दोष नहीं दिया । अतः जिसको मार पड़ती है, उसमें ऐसा धैर्य चाहिये । दूसरा बेचारा दुःख दे नहीं सकता, हम अपनी मूर्खता से दुःख पा रहे हैं । एक बात मैं और कहता हूँ । दुःख देने वाला दुःख दे नहीं सकेगा, प्रत्युत सुख देगा ! मैंने ऐसा देखा है । दूसरा करना चाहता है अनिष्ट और हमारा होता है इष्ट । यह मेरे अनुभव की बात है । मैं तो यहाँ तक कहता हूँ कि सुख-दुःख देने के लिये परिस्थिति के पास समय ही नहीं है ! वह बेचारी तो अपनी धुन में जा रही है, आपको छूती ही नहीं, फिर वह आपको सुख-दुःख कैसे दे सकती है । इसीलिये सत्संग से, सद्विचारों से, सद्भावों से आदमी सदा मस्त, मौज में रह सकता है; क्योंकि परिस्थिति दुःख देती है नहीं ।👩‍❤️‍👩 🧘दुःख तो उसको पकड़ करके आप कर रहे हो । अनुकूल परिस्थिति मिले तो उसमें आप सुख मान लेते हो और प्रतिकूल परिस्थिति मिले तो उसमें आप दुःख मान लेते हो, यह गलती होती है आपकी। वास्तव में परिस्थिति तो जा रही है बेचारी ! दिन-रात की तरह यह सुखदायी- दुःखदायी परिस्थिति आती रहेगी। जैसे दिन के बाद रात और रात के बाद दिन आता रहता है, ऐसे ही सुख के बाद दुःख और दुःख के बाद सुख आता रहेगा।🧘 🛐मनुष्य के लिये कल्याण की बात खुली है। मनुष्य-शरीर केवल अपना कल्याण करने के लिये है, भोग भोगने के लिये नहीं‒ 🛐 *एहि तन कर फल बिषय न भाई।*( मानस ७/४४/१ ) 🤹हमारे पास धन, सम्पत्ति, वैभव, बेटा, पोता, मकान आदि अनुकूल सामग्री है, तो इसको देखकर लोग कहते हैं कि यह बहुत सुखी है। हमारे पास सामग्री नहीं है; खाने को अन्न नहीं, पहनने को वस्त्र नहीं, रहने को मकान नहीं‒ऐसी दशा है तो इसको देखकर लोग कहते हैं कि यह बहुत दुःखी है। एक तो सुख-दुःख की यह परिभाषा है । 🤹 🧘दूसरी, जो मन में हरदम प्रसन्न रहता है, कभी दुःखी नहीं होता, उसको सुखी कहते हैं और जो मन में दुःखी रहता है, उसको दुःखी कहते हैं। *इस प्रकार एक तो सुख-सामग्री का नाम सुख है और दुःख-सामग्री का नाम दुःख है तथा एक हृदय में प्रसन्नता का नाम सुख है और हृदय में जलन का नाम दुःख है।* इनमें सामग्री वाला सुख-दुःख तो परिस्थिति का है और हृदय का सुख-दुःख मूर्खता का है। इस मूर्खता को मिटाने की खास जिम्मेवारी मनुष्य के ऊपर है। जैसे किसी भाषा का ज्ञान न हो तो उस अज्ञान को दूर करने के लिये हम वह भाषा सीख सकते हैं, ऐसे ही सुख-दुःख हमारे में है ही नहीं‒इस विद्या को मनुष्य मात्र सीख सकता है। इस ज्ञान के लिये ही मानव शरीर मिला है। अतः मानव शरीर में आकर सुखी-दुःखी नहीं होना है, प्रत्युत सुख-दुःख दोनों से ऊँचा उठना है। ऊँचा उठना क्या होता है ? कि न सुख ही पहुँचता और न दुःख ही पहुँचता है। पातञ्जलयोग दर्शन के व्यासभाष्य में एक श्लोक आया है :‒🧘 *प्रज्ञाप्रासादमारुह्याऽशोच्यः शोचतो जनान् ।* *भूमिष्ठानिव शैलस्थः सर्वान्प्राज्ञोऽनुपश्यति ॥* ( १/४७ का व्यासभाष्य ) ✍️अर्थात्‌ जैसे पर्वत पर खड़ा हुआ मनुष्य नीचे पृथ्वी पर खड़े लोगों को देखता है, ऐसे ही प्रज्ञा रूपी प्रासाद-( महल ) पर खड़ा हुआ अशोच्य पुरुष शोक करने वाले लोगों को देखता है।✍️ 🧘समाधि-अवस्था में योगी की बुद्धि ऋतम्भरा अर्थात्‌ सत्य को धारण करने वाली हो जाती है‒ *ऋतम्भरा तत्र प्रज्ञा।* 🧘 ( योगदर्शन १/४८ ) ❣️विवेक-विचार से भी ऐसी बुद्धि प्राप्त हो जाती है। जैसे पृथ्वी पर कभी बाढ़ आती है, कभी आग लगती ही, कभी सुखदायी परिस्थिति आती है, कभी दुःखदायी परिस्थिति आती है, तरह-तरह की परिस्थितियाँ आती हैं, पर पर्वत पर खड़े हुए मनुष्य के पास उनमें से कोई भी परिस्थिति नहीं पहुँचती। वह केवल देखता है, सुखी-दुःखी नहीं होता। इसको सुख-दुःख से ऊँचा उठना कहते हैं और ऐसी स्थिति आपकी, हमारी सबकी हो सकती है।❣️ 👩‍❤️‍👩हम जो सुखी-दुःखी होते हैं, यह हमारी गलती है। इसमें गलती क्या है ? लक्ष्मणजी ने अध्यात्म रामायण में निषादराज गुह से कहा है :‒👩‍❤️‍👩 *सुखस्य दुःखस्य न कोऽपि दाता परो ददातीति कुबुद्धिरेषा ।* *अहं करोमीति वृथाभिमानः स्वकर्मसूत्रे ग्रथितो हि लोकः ॥* ( २/६/६ ) ✍️सुख-दुःख को देने वाला दूसरा कोई नहीं है। दूसरा सुख-दुःख देता है‒यह समझना कुबुद्धि है । मैं करता हूँ‒यह वृथा अभिमान है। सब लोग अपने-अपने कर्मों की डोरी से बँधे हुए हैं। यही बात तुलसीकृत श्रीरामचरितमानस में भी आयी है :‒✍️ *काहु न कोउ सुख दुख कर दाता ।* *निज कृत करम भोग सबु भ्राता ॥* ( मानस २/९२/२ ) 🌷सुख-दुःख देने वाला दूसरा कोई नहीं है‒यह खास सूत्र है ! दूसरा दुःख देता है‒यह कुबुद्धि है, कुत्सित बुद्धि है, खोटी बुद्धि है । अमुक आदमी ने मेरे को दुःख दे दिया‒यह सिद्धान्त की दृष्टि से गलत है। इस विषय में एक बात तो यह है कि परमात्मा परम दयालु हैं, परम हितैषी हैं, अन्तर्यामी हैं और सर्वसमर्थ हैं। ऐसे परमात्मा के रहते हुए, उनकी जानकारी में कोई भी किसी को दुःख दे सकता है क्या ? दूसरी बात यह है कि अगर दूसरा दुःख देता है तो दुःख कभी मिटने का है ही नहीं; क्योंकि दूसरा तो कोई- न-कोई रहेगा ही। कहीं जाओ, किसी भी योनि में जाओ, देवता बन जाओ, राक्षस बन जाओ, असुर बन जाओ, भूत-प्रेत-पिशाच बन जाओ, मनुष्य बन जाओ, दूसरा रहेगा ही। फिर दुःख कैसे मिटेगा ? ये दोनों बातें बड़ी प्रबल हैं ।🌷 🪴हमारे सामने सुख और दुःख दोनों आते हैं। सुख-दुःख देने वाला दूसरा कोई नहीं है, प्रत्युत सब अपने किये हुए कर्मों के फल को भोगते हैं । पातञ्जलयोगदर्शन में लिखा है :‒🪴 *सति मूले तद्विपाको जात्यायुर्भोगाः।* ( २/१३ ) ✍️अर्थात्‌ पहले किये हुए कर्मों के फल से जन्म, आयु और भोग होता है। ✍️ ⁉️भोग नाम किसका है ?⁉️ *अनुकूलवेदनीयं सुखम्, प्रतिकूलवेदनीयं दुःखम् और सुखदुःख अन्यतरः साक्षात्कारो भोगः।* 🧘अथात् सुखदायी और दुःखदायी परिस्थिति सामने आ जाय और उस परिस्थिति का अनुभव हो जाय, उसमें अनुकूल- प्रतिकूल की मान्यता हो जाय, इसका नाम ‘भोग’ है। अब एक बात बड़े रहस्य की, बहुत मार्मिक और काम की है। आप ध्यान दें । आपने अच्छा काम किया है तो सुखदायी परिस्थिति आपके सामने आयेगी और बुरा काम किया है तो दुःखदायी परिस्थिति आपके सामने आयेगी। यह तो है कर्मों की बात। 🧘 ♦️अब परिस्थिति को लेकर सुखी-दुःखी होना केवल मूर्खता है। वह परमात्मा का विधान है, जो हमारे कर्मों का नाश करके हमें शुद्ध करने के लिये हुआ है । ♦️ 🍀 आध्यात्मिक ज्ञान 🍀 #☝अनमोल ज्ञान #🕉️सनातन धर्म🚩 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇
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