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**कलियुग और रामचरितमानस: सदियों पहले लिखा गया आज का सच** सोचिए, क्या कोई बिना इंटरनेट और बिना किसी आधुनिक मशीन के यह बता सकता है कि आज से सदियों बाद आपकी दुनिया कैसी दिखेगी? क्या आप जानते हैं कि आज से ठीक 452 साल पहले, जब न बिजली थी, न इंटरनेट और न ही आधुनिक विज्ञान, तब एक संत ने आपके स्मार्टफोन, आज की जहरीली राजनीति और आपके घर के भीतर मरते हुए रिश्तों की पटकथा लिख दी थी? जब हम आज की भागदौड़, गिरते हुए रिश्तों और बाज़ारों में बिकती शिक्षा को देखते हैं, तो हमें लगता है कि यह सब नया है। लेकिन सच तो यह है कि गोस्वामी तुलसीदास जी ने **'रामचरितमानस'** के पन्नों पर सदियों पहले ही हमारे आज का सच दिखा दिया था। आइए, उन दो चौपाइयों के भीतर झाँकते हैं, जहाँ भविष्य की स्याही से आज का चेहरा उकेरा गया है। उनकी चौपाइयां आज महज़ शब्द नहीं, बल्कि हमारे समाज का 'लाइव टेलीकास्ट' हैं: > **चौपाई:** > **बरन धर्म नहिं आश्रम चारी। श्रुति विरोध रत सब नर नारी॥** > **द्विज श्रुति बेचक भूप प्रजासन। कोउ नहिं मान निगम अनुसासन॥** > **अर्थ:** कलियुग में लोग अपने कर्तव्य भूल जाएंगे, रिश्तों की मर्यादा खत्म हो जाएगी। स्त्रियां और पुरुष दोनों ही मर्यादाओं को तोड़कर मनमानी करेंगे। जो ज्ञानी हैं, वे ज्ञान को बेचेंगे और जो रक्षक हैं, वे भक्षक बन जाएंगे। समाज में कोई भी व्यक्ति नैतिकता या मानवीय नियमों को नहीं मानेगा। ### **1. रिश्तों का पतन और 'श्रुति विरोध'** 'बरन धर्म' का अर्थ है—वह जिम्मेदारी जो हमें इंसान बनाती है। आज पिता का धर्म, पुत्र का धर्म और पति-पत्नी की मर्यादा, सब कुछ 'निजी पसंद' की भेंट चढ़ चुका है। जिसे हम 'मॉर्डन' होना कहते हैं, तुलसीदास जी ने उसे 'श्रुति विरोध' (प्राकृतिक नियमों का अपमान) कहा था। आज 'फ्रीडम' के नाम पर हम अपनों से ही दूर हो रहे हैं। जब संस्कार बोझ लगने लगें और स्वार्थ ही जीवन का लक्ष्य बन जाए, तो समझ लीजिए समाज की नींव हिलने लगी है। ### **2. द्विज श्रुति बेचक: शिक्षा का बाज़ारीकरण** तुलसीदास जी ने चेतावनी दी थी कि कलियुग में सबसे बड़ा पाप यह होगा कि ज्ञान की बोली लगेगी। ज़रा अपने आसपास देखिए—महंगे स्कूल, आलीशान कोचिंग सेंटर और अध्यात्म के नाम पर खुली दुकानें। पुराने समय में शिक्षा 'दान' थी, व्यापार नहीं। आज गुरु मार्गदर्शक कम और 'बिजनेसमैन' ज्यादा नज़र आते हैं। सरस्वती की इस नीलामी पर 'श्रुति बेचक' शब्द आज के एजुकेशन मार्केट पर सबसे सटीक प्रहार है। ### **3. भूप प्रजासन: रक्षक ही जब भक्षक बन जाएं** तुलसीदास जी ने लिखा कि कलियुग के राजा (सत्ताधीश) रक्षक नहीं, भक्षक होंगे। आज सत्ता की कुर्सी पर बैठे लोग जनसेवक के बजाय प्रजा का हक डकारने वाले शिकारी बन चुके हैं। भ्रष्टाचार की दीमक और घोटालों की सड़ांध व्यवस्था की दीवारों से टपक रही है। जिसे हमने सुरक्षा के लिए चुना, वही जब शोषण करने लगे, तो आम आदमी कहाँ जाए? ### **4. कोउ नहिं मान निगम अनुसासन** यहाँ नियम का मतलब सिर्फ कानून तोड़ना नहीं है। हमने प्रकृति के नियम तोड़े, इसलिए आपदाएं आईं; भोजन के नियम तोड़े, इसलिए बीमारियां आईं; और व्यवहार के नियम तोड़े, इसलिए अपराध बढ़े। आज हर व्यक्ति 'जुगाड़' और 'शॉर्टकट' के नशे में चूर है। **जागिए, इससे पहले कि अंधेरा गहरा जाए!** बाबा तुलसी ने जो चित्र खींचा था, वह आज आपके मोबाइल, आपके ऑफिस और आपके घर के भीतर साक्षात मौजूद है। हम चाँद पर पहुँच गए, लेकिन अपनों के दिल तक पहुँचने का रास्ता भूल गए। हम विज्ञान में 'सुपरपावर' तो बन गए, लेकिन संस्कारों के मामले में आज भी निर्धन हैं। यह विश्लेषण हमें डराने के लिए नहीं, बल्कि यह याद दिलाने के लिए है कि हम वापस उस 'अनुशासन' और 'मर्यादा' की ओर लौटें, जो हमें सच में मानव बनाती है। प्रकृति का नियम अटल है—यदि हम अपनी जड़ों (संस्कारों) को काटेंगे, तो शाखाएं (भविष्य) कभी हरी-भरी नहीं रह सकेंगी। **कलियुग बदला नहीं है, बस तुलसी के शब्द चरित्र बनकर हमारे सामने खड़े हो गए हैं।** #रामायण ज्ञान #रामायण
रामायण ज्ञान - जयश्री राभ जयश्री राभ - ShareChat