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" भाग्य और कर्म "
"भाग्य कर्म का परिणाम है,
और कर्म भाग्य का निर्माता।"
सनातन धर्म में भाग्य (दैव) और कर्म का विषय अत्यंत गूढ़ एवं महत्वपूर्ण माना गया है। अनेक लोग अपने जीवन की सफलता या असफलता का कारण केवल भाग्य को मानते हैं, जबकि शास्त्र स्पष्ट कहते हैं कि भाग्य कर्मों का संचित फल है।
श्रीमद्भगवद्गीता का सिद्धांत
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
(गीता 2.47)
मनुष्य का अधिकार केवल कर्म करने में है, फल पर नहीं। इसलिए फल की चिंता छोड़कर कर्म करते रहो।
यही गीता का मूल संदेश है—कर्म करो, भाग्य स्वयं निर्मित होगा।
भाग्य क्या है ...!!?
भाग्य कोई रहस्यमयी शक्ति नहीं, बल्कि हमारे पूर्व जन्मों और वर्तमान जीवन के कर्मों का संचित फल है।
शास्त्र कहते हैं—
' यथा बीजं तथा फलम्। '
जैसा बीज बोया जाएगा,
वैसा ही फल प्राप्त होगा।
यदि बीज आम का होगा तो आम ही मिलेगा, बबूल का नहीं। उसी प्रकार शुभ कर्म शुभ भाग्य और अशुभ कर्म अशुभ भाग्य बनाते हैं।
'कर्म क्या है ...!!?'
कर्म केवल शारीरिक कार्य नहीं है। मन, वचन और शरीर से किया गया प्रत्येक कार्य कर्म कहलाता है।
मन से सोचना — मानसिक कर्म।
वाणी से बोलना — वाचिक कर्म।
शरीर से कार्य करना — शारीरिक कर्म।
इसलिए भगवान हर कर्म का सूक्ष्म लेखा रखते हैं।
क्या भाग्य सब कुछ बदल देता है ...!!?
नहीं।
यदि भाग्य ही सब कुछ होता तो भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से युद्ध करने के लिए क्यों कहते?
वे कहते—
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः॥
(गीता 2.37)
इसलिए उठो और अपने कर्तव्य का पालन करो।
यदि सब कुछ पहले से तय होता, तो कर्म करने की प्रेरणा देने का कोई अर्थ नहीं होता।
भाग्य और कर्म का संबंध...
भाग्य और कर्म का संबंध खेत और किसान जैसा है।
खेत = भाग्य
किसान का परिश्रम = कर्म
उपज दोनों के मेल से होती है।
अच्छा खेत हो लेकिन किसान मेहनत न करे तो फसल नहीं होगी।
साधारण भूमि हो लेकिन किसान परिश्रम करे तो अच्छी फसल उग सकती है।
महाभारत का उदाहरण::
अर्जुन का भाग्य महान था, लेकिन यदि वह गांडीव रखकर बैठ जाता तो विजय नहीं मिलती।
भगवान श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं—
निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्॥
(गीता 11.33)
अर्थात्—हे अर्जुन! उठो और केवल निमित्त बनो।
रामायण का संदेश....
भगवान श्रीराम वनवास को भाग्य मानकर बैठे नहीं रहे।
उन्होंने धर्म का पालन किया, संघर्ष किया, समुद्र पर सेतु बनाया और रावण का वध किया।
यदि वे केवल भाग्य पर निर्भर रहते, तो धर्म की विजय कैसे होती?
चाणक्य नीति...
उद्यमेन हि सिद्ध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥
केवल इच्छा करने से कार्य सिद्ध नहीं होते। जैसे सोए हुए सिंह के मुख में हिरण स्वयं नहीं आता।
भाग्य कब बदलता है ...!!?
भाग्य बदलता है—
सत्कर्म से।
भक्ति से।
तप से।
सेवा से।
दान से।
सदाचार से।
महर्षि वाल्मीकि इसका सर्वोत्तम उदाहरण हैं। डाकू रत्नाकर अपने कर्म बदलकर महर्षि वाल्मीकि बन गए। यदि भाग्य अपरिवर्तनीय होता, तो यह परिवर्तन संभव न होता।
यदि भाग्य ही सब कुछ है—
तो शिक्षा की आवश्यकता क्यों?
चिकित्सा क्यों?
खेती क्यों?
व्यापार क्यों?
परिश्रम क्यों?
संपूर्ण संसार कर्म पर ही चल रहा है।
भाग्य और कर्म का उदाहरण...
कल्पना कीजिए कि आपके पास एक नाव है।
नदी का प्रवाह = भाग्य
नाव के चप्पू = कर्म
यदि चप्पू चलाना छोड़ दें तो नाव केवल धारा के भरोसे बहती रहेगी। लेकिन यदि पुरुषार्थ करें, तो धारा के विपरीत भी आगे बढ़ा जा सकता है।
तुलसीदास जी कहते हैं
कर्म प्रधान विश्व करि राखा।
जो जस करइ सो तस फल चाखा॥
भगवान ने संसार को कर्मप्रधान बनाया है। जैसा कर्म करेगा, वैसा ही फल पाएगा।
भाग्य और पुरुषार्थ...
शास्त्रों में पुरुषार्थ को सर्वोच्च स्थान दिया गया है।
भाग्य पूर्व कर्मों का परिणाम है, जबकि पुरुषार्थ वर्तमान का प्रयास है।
आज का पुरुषार्थ ही कल का भाग्य बनता है।
भाग्य और कर्म विरोधी नहीं, बल्कि एक ही वृक्ष की दो शाखाएँ हैं।
भाग्य = बीते हुए कर्मों का फल।
वर्तमान कर्म = भविष्य के भाग्य का बीज।
इसलिए मनुष्य को भाग्य को दोष देने के बजाय अपने कर्मों को श्रेष्ठ बनाना चाहिए। यही श्रीकृष्ण का संदेश है, यही रामायण का आदर्श है, और यही सनातन धर्म का शाश्वत सिद्धांत है।
भाग्य हाथ की रेखाओं में नहीं,
कर्म की दिशा में लिखा जाता है।
जो पुरुषार्थ करता है,
वही अपने भाग्य का निर्माता बनता है।
जय श्री कृष्ण
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