#महाभारत
#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣6️⃣9️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
राजा पाण्डु की मृत्यु और माद्री का उनके साथ चितारोहण...(दिन 369)
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तस्मान्मे सुतयोः कुन्ति वर्तितव्यं स्वपुत्रवत् । मां च कामयमानोऽयं राजा प्रेतवशं गतः ।। २८ ।।
अतः आप ही जीवित रहकर मेरे पुत्रोंका भी अपने पुत्रोंके समान ही पालन कीजियेगा। इसके सिवा ये महाराज मेरी ही कामना रखकर मृत्युके अधीन हुए हैं ।। २८ ।।
वैशम्पायन उवाच
(ऋषयस्तान् समाश्वास्य पाण्डवान् सत्यविक्रमान् ।
ऊचुः कुन्तीं च माद्रीं च समाश्वास्य तपस्विनः ।।
सुभगे बालपुत्रे तु न मर्तव्यं कथंचन । पाण्डवांश्चापि नेष्यामः कुरुराष्ट्र परंतपान् ।।
अधर्मेष्वर्थजातेषु धृतराष्ट्रश्च लोभवान् । स कदाचिन्न वर्तेत पाण्डवेषु यथाविधि ।।
कुन्त्याश्च वृष्णयो नाथाः कुन्तिभोजस्तथैव च । माद्याश्च बलिनां श्रेष्ठः शल्यो भ्राता महारथः ।।
भर्ना तु मरणं सार्धं फलवन्नात्र संशयः ।
युवाभ्यां दुष्करं चैतद् वदन्ति द्विजपुङ्गवाः ।।
मृते भर्तरि या साध्वी ब्रह्मचर्यव्रते स्थिता । यमैश्च नियमैः श्रान्ता मनोवाक्कायजैः शुभैः ।।
व्रतोपवासनियमैः कृच्छ्रेश्चान्द्रायणादिभिः । भूशय्यां क्षारलवणवर्जनं चैकभोजनम् ।। येन केनापि विधिना देहशोषणतत्परा । देहपोषणसंयुक्ता विषयैर्हतचेतना ।।
देहव्ययेन नरकं महदाप्नोत्यसंशयः ।
तस्मात्संशोषयेद् देहं विषया नाशमाप्नुयुः ।।
भर्तारं चिन्तयन्ती सा भर्तारं निस्तरेच्छुभा । तारितश्चापि भर्ता स्यादात्मा पुत्रस्तथैव च ।। तस्माज्जीवितमेवैतद् युवयोर्विद्म शोभनम् ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- तदनन्तर तपस्वी ऋषियोंने सत्यपराक्रमी पाण्डवोंको धीरज बँधाकर कुन्ती और माद्रीको भी आश्वासन देते हुए कहा- 'सुभगे ! तुम दोनोंके पुत्र अभी बालक हैं, अतः तुम्हें किसी प्रकार देह-त्याग नहीं करना चाहिये। हमलोग शत्रुदमन पाण्डवोंको कौरव राष्ट्रकी राजधानीमें पहुँचा देंगे। राजा धृतराष्ट्र अधर्ममय धनके लिये लोभरखता है, अतः वह कभी पाण्डवोंके साथ यथायोग्य बर्ताव नहीं कर सकता। कुन्तीके रक्षक एवं सहायक वृष्णिवंशी और राजा कुन्तिभोज हैं तथा माद्री के बलवानों में श्रेष्ठ महारथी शल्य उसके भाई हैं। इसमें संदेह नहीं कि पतिके साथ मृत्यु स्वीकार करना पत्नीके लिये महान् फलदायक होता है; तथापि तुम दोनोंके लिये यह कार्य अत्यन्त कठोर है, यह बात सभी श्रेष्ठ ब्राह्मण कहते हैं। जो स्त्री साध्वी होती है, वह अपने पतिकी मृत्यु हो जानेके बाद ब्रह्मचर्यके पालनमें अविचलभावसे लगी रहती है, यम और नियमोंके पालनका क्लेश सहन करती है और मन, वाणी एवं शरीरद्वारा किये जानेवाले शुभ कर्मों तथा कृच्छ्रचान्द्रायणादि व्रत, उपवास और नियमोंका अनुष्ठान करती है। वह क्षार (पापड़ आदि) और लवणका त्याग करके एक बार ही भोजन करती और भूमिपर शयन करती है। वह जिस किसी प्रकारसे अपने शरीरको सुखानेके प्रयत्नमें लगी रहती है। किंतु विषयोंके द्वारा नष्ट हुई बुद्धिवाली जो नारी देहको पुष्ट करनेमें ही लगी रहती है, वह तो इस (दुर्लभमनुष्य-) शरीरको व्यर्थ ही नष्ट करके निःसंदेह महान् नरकको प्राप्त होती है। अतः साध्वी स्त्रीको उचित है कि वह अपने शरीरको सुखाये, जिससे सम्पूर्ण विषय-कामनाएँ नष्ट हो जायें। इस प्रकार उपर्युक्त धर्मका पालन करनेवाली जो शुभलक्षणा नारी अपने पतिदेवका चिन्तन करती रहती है, वह अपने पतिका भी उद्धार कर देती है। इस तरह वह स्वयं अपनेको, अपने पतिको एवं पुत्रको भी संसारसे तार देती है। अतः हमलोग तो यही अच्छा मानते हैं कि तुम दोनों जीवन धारण करो'।
कुन्त्युवाच
यथा पाण्डोश्च निर्देशस्तथा विप्रगणस्य च । आज्ञा शिरसि निक्षिप्ता करिष्यामि च तत् तथा ।। यथाऽऽहुर्भगवन्तो हि तन्मन्ये शोभनं परम् । भर्तुश्च मम पुत्राणां मम चैव न संशयः ।।
कुन्ती बोली-महात्माओ ! हमारे लिये महाराज पाण्डुकी आज्ञा जैसे शिरोधार्य है, उसी प्रकार आप सब ब्राह्मणोंकी भी है। आपका आदेश में सिर-माथे रखती हूँ। आप जैसा कहेंगे, वैसा ही करूँगी। पूज्यपाद विप्रगण जैसा कहते हैं, उसीको मैं अपने पति, पुत्रों तथा अपने-आपके लिये भी परम कल्याणकारी समझती हूँ- इसमें तनिक भी संशय नहीं है।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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