ShareChat
click to see wallet page
search
#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-3️⃣9️⃣9️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) त्रयस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः राजकुमारों का रंगभूमि में अस्त्र-कौशल दिखाना...(दिन 399) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ वैशम्पायन उवाच कृतास्त्रान् धार्तराष्ट्रांश्च पाण्डुपुत्रांश्च भारत । दृष्ट्वा द्रोणोऽब्रवीद् राजन् धृतराष्ट्रं जनेश्वरम् ।। १ ।। कृपस्य सोमदत्तस्य बाह्लीकस्य च धीमतः । गाङ्गेयस्य च सांनिध्ये व्यासस्य विदुरस्य च ।। २ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- भारत ! जब द्रोणने देखा कि धृतराष्ट्रके पुत्र तथा पाण्डव अस्त्र-विद्याकी शिक्षा समाप्त कर चुके, तब उन्होंने कृपाचार्य, सोमदत्त, बुद्धिमान् बाह्लीक, गंगानन्दन भीष्म, महर्षि व्यास तथा विदुरजीके निकट राजा धृतराष्ट्रसे कहा- ।। १-२ ।। राजन् सम्प्राप्तविद्यास्ते कुमाराः कुरुसत्तम । ते दर्शयेयुः स्वां शिक्षां राजन्ननुमते तव ।। ३ ।। ततोऽब्रवीन्महाराजः प्रहृष्टेनान्तरात्मना । 'राजन्! आपके कुमार अस्त्र-विद्याकी शिक्षा प्राप्त कर चुके हैं। कुरुश्रेष्ठ ! यदि आपकी अनुमति हो तो वे अपनी सीखी हुई अस्त्र-संचालनकी कलाका प्रदर्शन करें'। यह सुनकर महाराज धृतराष्ट्र अत्यन्त प्रसन्नचित्तसे बोले ।। ३ ।। धृतराष्ट्र उवाच भारद्वाज महत् कर्म कृतं ते द्विजसत्तम ।। ४ ।। धृतराष्ट्रने कहा-द्विजश्रेष्ठ भरद्वाजनन्दन ! आपने (राजकुमारोंको अस्त्रकी शिक्षा देकर) बहुत बड़ा कार्य किया है ।। ४ ।। यदानुमन्यसे कालं यस्मिन् देशे यथा यथा। तथा तथा विधानाय स्वयमाज्ञापयस्व माम् ।। ५ ।। आप कुमारोंकी अस्त्र-शिक्षाके प्रदर्शनके लिये जब जो समय ठीक समझें, जिस स्थानपर जिस-जिस प्रकारका प्रबन्ध आवश्यक मानें, उस-उस तरहकी तैयारी करनेके लिये स्वयं ही मुझे आज्ञा दें ।। ५ ।। स्पृहयाम्यद्य निर्वेदात् पुरुषाणां सचक्षुषाम् । अस्त्रहेतोः पराक्रान्तान् ये मे द्रक्ष्यन्ति पुत्रकान् ।। ६ ।। आज मैं नेत्रहीन होनेके कारण दुःखी होकर, जिनके पास आँखें हैं, उन मनुष्योंके सुख और सौभाग्यको पानेके लिये तरस रहा हूँ; क्योंकि वे अस्त्र-कौशलका प्रदर्शन करनेके लिये भाँति-भाँतिके पराक्रम करनेवाले मेरे पुत्रोंको देखेंगे ।। ६ ।। क्षत्तर्यद् गुरुराचार्यो ब्रवीति कुरु तत् तथा। न हीदृशं प्रियं मन्ये भविता धर्मवत्सल ।। ७ ।। (आचार्यसे इतना कहकर राजा धृतराष्ट्र विदुरसे बोले-) 'धर्मवत्सल ! विदुर ! गुरु द्रोणाचार्य जो काम जैसे कहते हैं, उसी प्रकार उसे करो। मेरी रायमें इसके समान प्रिय कार्य दूसरा नहीं होगा' ।। ७ ।। ततो राजानमामन्त्र्य निर्गतो विदुरो बहिः। भारद्वाजो महाप्राज्ञो मापयामास मेदिनीम् ।। ८ ।। तदनन्तर राजाकी आज्ञा लेकर विदुरजी (आचार्य द्रोणके साथ) बाहर निकले। महाबुद्धिमान् भरद्वाजनन्दन द्रोणने रंगमण्डपके लिये एक भूमि पसंद की और उसका माप करवाया ।। ८ ।। समामवृक्षां निर्गुल्मामुदक्प्रस्रवणान्विताम् । तस्यां भूमौ बलिं चक्रे तिथौ नक्षत्रपूजिते ।। ९ ।। अवघुष्टे समाजे च तदर्थं वदतां वरः । रङ्गभूमौ सुविपुलं शास्त्रदृष्टं यथाविधि ।। १० ।। प्रेक्षागारं सुविहितं चक्क्रुस्ते तस्य शिल्पिनः । राज्ञः सर्वायुधोपेतं स्त्रीणां चैव नरर्षभ ।। ११ ।। मञ्चाश्च कारयामासुस्तत्र जानपदा जनाः। विपुलानुच्छ्रयोपेतान् शिबिकाश्च महाधनाः ।। १२ ।। वह भूमि समतल थी। उसमें वृक्ष या झाड़-झंखाड़ नहीं थे। वह उत्तरदिशाकी ओर नीची थी। वक्ताओंमें श्रेष्ठ द्रोणने वास्तुपूजन देखनेके लिये डिण्डिम-घोष कराके वीरसमुदायको आमन्त्रित किया और उत्तम नक्षत्रसे युक्त तिथिमें उस भूमिपर वास्तुपूजन किया। तत्पश्चात् उनके शिल्पियोंने उस रंगभूमिमें वास्तु-शास्त्रके अनुसार विधिपूर्वक एक अति विशाल प्रेक्षागृहकी नींव डाली तथा राजा और राजघरानेकी स्त्रियोंके बैठनेके लिये वहाँ सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न बहुत सुन्दर भवन बनाया। जनपदके लोगोंने अपने बैठनेके लिये वहाँ ऊँचे और विशाल मंच बनवाये तथा (स्त्रियोंको लानेके लिये) बहुमूल्य शिबिकाएँ तैयार करायीं ।। ९-१२ ।। तस्मिंस्ततोऽहनि प्राप्ते राजा ससचिवस्तदा । भीष्मं प्रमुखतः कृत्वा कृपं चाचार्यसत्तमम् ।। १३ ।। (बाह्लीकं सोमदत्तं च भूरिश्रवसमेव च । कुरूनन्यांश्च सचिवानादाय नगराद् बहिः ।।) मुक्ताजालपरिक्षिप्तं वैदूर्यमणिशोभितम्। शातकुम्भमयं दिव्यं प्रेक्षागारमुपागमत् ।। १४ ।। तत्पश्चात् जब निश्चित दिन आया, तब मन्त्रियोंसहित राजा धृतराष्ट्र भीष्मजी तथा आचार्यप्रवर कृपको आगे करके बाह्लीक, सोमदत्त, भूरिश्रवा तथा अन्यान्य कौरवों और मन्त्रियोंको साथ ले नगरसे बाहर उस दिव्य प्रेक्षागृहमें आये। उसमें मोतियोंकी झालरें लगी थीं, वैदूर्यमणियोंसे उस भवनको सजाया गया था तथा उसकी दीवारों में स्वर्णखण्ड मढ़े गये थे ।। १३-१४ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
महाभारत - श्रीमह्भाख्तमू श्रीमह्भाख्तमू - ShareChat