#जय शनिदेव
`पद्म पुराण – दशरथकृत शनि-स्तोत्र का दुर्लभ श्लोक –`
`दशरथ जी ने जब शनि को रोहिणी-शकट भेदन से रोका , तब यह श्लोक कहा था , सम्पूर्ण स्तोत्र प्रसिद्ध है ही , किन्तु यह श्लोक कम सुनने में आता है ।`
`प्रसादं कुरु मे सौरे वारदो भव भास्करे ।`
`एवं स्तुतस्तदा सौरिर्ग्रहराजो महाबलः ॥१८॥`
`वरं ब्रूहि राजेन्द्र ददामि तव सुव्रत ।`
`न भेतव्यं त्वया राजन् भयं तव ह्युपस्थितम् ॥१९॥`
[ `पद्म पुराण , उत्तर खण्ड , अध्याय ३५ , श्लोक १८-१९` ]
`अर्थात 👉🏻 दशरथ बोले – हे सूर्यपुत्र , मुझ पर कृपा करो , वरदाता हो जाओ । तब महाबली ग्रहराज शनि बोले – हे राजेन्द्र वर माँगो , मैं देता हूँ । हे राजन , तुम्हें भय नहीं करना चाहिए , जो भय उपस्थित था वह अब नहीं रहा ।`
`विशेष –शनिवार को पीपल वृक्ष के नीचे जल एवं काले तिल अर्पित कर ३ बार प्रणाम करे – रोहिणी-भेद दोष का नाश होगा ।`
`दशरथ-स्तोत्र के ३ दुर्लभ वर – शनिदेव ने दशरथ को ४ वर दिए थे`
`१. जो इस स्तोत्र को पढ़ेगा , उसे शनि-पीड़ा नहीं होगी ।`
`२. शनिवार को इसका पाठ करने वाले को दरिद्रता नहीं छूएगी ।`
`३. तेल-अभिषेक के समान फल अकेले इस स्तोत्र से मिलेगा ।`
`वैसे तो सम्पूर्ण स्तोत्र ३८ श्लोक का है – किन्तु ये १८ एवं १८ श्लोक "वर-प्राप्ति" के बीज हैं ।`
`"""न भेतव्यं त्वया राजन्""" — शनि का अभय वचन आज भी जीवित है ।`
`☄️ चित्र तथा श्लोकार्थ का समन्वय –`
`१. शनि का स्वरूप अर्थात – श्लोक का उत्तरार्ध`
`चित्र में – शनि देव श्याम वर्ण , चतुर्भुज , त्रिशूल-गदा-धनुष धारण किए , काक वाहन पर विराजमान हैं औऱ अभय मुद्रा में हैं ।`
`श्लोक में – वरं ब्रूहि राजेन्द्र... न भेतव्यं त्वया राजन्`– `वही "अभय मुद्रा" श्लोक का वचन है ।`
`महाबलः ग्रहराजो– चित्र में त्रिशूल-गदा-धनुष वही "महाबल" दिखा रहे हैं ।`
`☝🏻चित्र में जो शनि "वरद" मुद्रा में हैं , वही श्लोक में "वरं ब्रूहि" कह रहे हैं । रूप वही – एवं – वचन भी वही ।`
`२. "सौरे , भास्करे" सम्बोधन अर्थात – चित्र का ॐ तथा सूर्य का तेज`
`श्लोक में –दशरथ ने कहा "हे सौरे , हे भास्करे" – सूर्यपुत्र मानकर स्तुति की ।`
`☆चित्र में –सिर के ऊपर "ॐ" प्रकाशित है 👉🏻 सूर्य का बीज "ॐ" ही है ।`
`☆तेजोमय आभा-मण्डल 👉🏻 भास्कर-पुत्र का तेज ।`
`☆ श्याम वर्ण होते हुए भी स्वर्ण-आभूषण – सूर्य का तेज औऱ शनि की नीलिमा अर्थात 👉🏻 "सौरे" ।`
`☝🏻 दशरथ ने जिस "सूर्यपुत्र" को ललकारा , चित्र – उसी "भास्कर-पुत्र" को वरदाता रूप में दिखा रहा है ।`
`३. पूजन-सामग्री अर्थात – श्लोक की "प्रसादं कुरु" प्रार्थना`
`चित्र में –सामने शंख , दीपक , नारियल , केला , पुष्प , तिल , तथा धूप – ये सब शनि-पूजन के द्रव्य हैं ।`
`श्लोक में – प्रसादं कुरु मे 👉🏻 कृपा करो । भक्त जब ये द्रव्य चढ़ाता है तो वही "प्रसादं कुरु" की याचना करता है ।`
`☝🏻 चित्र "उपचार-समर्पण" दिखा रहा है , श्लोक "कृपा-याचना" कर रहा है । दोनों मिलकर पूर्ण उपासना बनते हैं ।`
`४. काक वाहन औऱ व्याघ्र चर्म अर्थात – "भयं तव ह्युपस्थितम्" का निवारण`
`काक अर्थात – शनिदेव का दूत , यम का संदेशवाहक 👉🏻 भय का प्रतीक एवं व्याघ्र चर्म अर्थात – मृत्यु-भय पर विजय का प्रतीक है ।`
`श्लोक में – न भेतव्यं... भयं तव ह्युपस्थितम् – शनि ने भय हर लिया ।`
`☝🏻 चित्र में शनि काक पर बैठकर भी अभय दे रहे हैं 👉🏻 अर्थात – "भय का कारण मैं हूँ , भय का निवारण भी मैं ही हूँ" ।`
`प्रसादं कुरु मे सौरे — वरद शनि का यही स्वरूप है ।`
`🌄🌄 प्रभात वन्दन 🌄🌄©®`


