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ऋष्यमूक पर्वत, जहाँ हुई श्री राम-सुग्रीव मित्रता और श्रीलंका विजय की शुरुआत : ऋष्यमूक पर्वत का वर्णन रामायण में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान के रूप में मिलता है। मान्यता है कि यह पर्वत आज के कर्नाटक के हम्पी में स्थित है और यही क्षेत्र प्राचीन किष्किंधा नगरी था। लोककथाओं के अनुसार रावण के अत्याचारों से पीड़ित अनेक ऋषियों ने भगवान विष्णु से रावण के विनाश हेतु मौन रहकर तपस्या की। जब रावण को यह ज्ञात हुआ कि ऋषि उसके अंत के लिए तप कर रहे हैं, तो उसने क्रोधित होकर उन सभी ऋषियों का वध करा दिया। कहा जाता है कि उन्हीं मूक ऋषियों के शवों से बने पर्वत का नाम ऋष्यमूक पड़ा। बाद में महर्षि मातंग ने इस स्थान को अपने आश्रम से पुनः पवित्र किया। इसी क्षेत्र में वानरराज बाली और सुग्रीव का प्रसंग भी जुड़ा है। दुदुम्भी नामक दैत्य का वध कर बाली ने उसका शव दूर फेंका, जिससे मातंग ऋषि का आश्रम अपवित्र हो गया। क्रोधित होकर मातंग ऋषि ने बाली को श्राप दिया कि यदि वह ऋष्यमूक पर्वत के निकट आएगा तो उसकी मृत्यु हो जाएगी। इसी श्राप के कारण सुग्रीव अपने मंत्रियों और हनुमान जी के साथ ऋष्यमूक पर्वत पर सुरक्षित रहे। बाद में यहीं श्री राम और सुग्रीव की मित्रता हुई तथा श्री राम ने बाली का वध कर सुग्रीव को किष्किंधा का राज्य दिलाया। आज भी हम्पी का यह क्षेत्र रामायण से जुड़ी पवित्र स्मृतियों के कारण श्रद्धा का केंद्र माना जाता है। 🙏 जय श्री राम 🙏 #❤️Love You ज़िंदगी ❤️
❤️Love You ज़िंदगी ❤️ - बाली का उद्धार करि, दीन्हा कपि को राज। ऋष्यमूक पावन भया, सिद्ध हुए सब काज।I ऋष्यमूक पर्वत बाली का उद्धार करि, दीन्हा कपि को राज। ऋष्यमूक पावन भया, सिद्ध हुए सब काज।I ऋष्यमूक पर्वत - ShareChat