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#हीरों के राँझों के नगमें क्या अब भी सुने जाते हैं हाँ वहाँ
हीरों के राँझों के नगमें क्या अब भी सुने जाते हैं हाँ वहाँ - लाहौर के उस पहले ज़िले के, दो परगना में पहुँचे रेशम गली के, दूजे कूचे के, चौथे मकाँ में पहुँचे कहते हैं जिसको , दरूजा मुलुक उस, पाकिस्ताँ में ப लिखता हूँ ख़त मैं हिन्दोस्ताँ से, पहलू ए ्हुसनाँ में ओ हुस्नाँ 10 मैं तो हूँ बैठा, ओ हुसनाँसेरी यादों में खोया पुरानी पल पल को गिनता, पल पल को चुनता , बीती कहानी में खोया पत्ते जब झड़ते , हिन्दोस्ताँ में , बातें तुम्हारी ये बोलें होता उजाला , हिन्दोस्ताँ में यादें  तुम्हारी ये बोलें ओ हुस्नाँ मेरी, ये तो बता दो होता है ऐसा क्या उस गुलिस्ताँ में रहती हो नन्हीं कबूतर ्सी गुम तुम जहाँ ओ हुस्नाँ . पत्ते क्या झड़ते हैं पाकिस्ताँ में बैसे ही जैसे झड़ते यहाँ ओ हुस्नाँ.. होता उजाला क्या बैसा ही है जैसा होता हिन्दुस्ताँ में हाँ 3EFii... लाहौर के उस पहले ज़िले के, दो परगना में पहुँचे रेशम गली के, दूजे कूचे के, चौथे मकाँ में पहुँचे कहते हैं जिसको , दरूजा मुलुक उस, पाकिस्ताँ में ப लिखता हूँ ख़त मैं हिन्दोस्ताँ से, पहलू ए ्हुसनाँ में ओ हुस्नाँ 10 मैं तो हूँ बैठा, ओ हुसनाँसेरी यादों में खोया पुरानी पल पल को गिनता, पल पल को चुनता , बीती कहानी में खोया पत्ते जब झड़ते , हिन्दोस्ताँ में , बातें तुम्हारी ये बोलें होता उजाला , हिन्दोस्ताँ में यादें  तुम्हारी ये बोलें ओ हुस्नाँ मेरी, ये तो बता दो होता है ऐसा क्या उस गुलिस्ताँ में रहती हो नन्हीं कबूतर ्सी गुम तुम जहाँ ओ हुस्नाँ . पत्ते क्या झड़ते हैं पाकिस्ताँ में बैसे ही जैसे झड़ते यहाँ ओ हुस्नाँ.. होता उजाला क्या बैसा ही है जैसा होता हिन्दुस्ताँ में हाँ 3EFii... - ShareChat