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#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-4️⃣0️⃣8️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) षट्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः भीमसेन के द्वारा कर्ण का तिरस्कार और दुर्योधन द्वारा उसका सम्मान...(दिन 408) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ आचार्यः कलशाज्जातो द्रोणः शस्त्रभृतां वरः । गौतमस्यान्ववाये च शरस्तम्बाच्च गौतमः ।। १५ ।। 'समस्त शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ हमारे आचार्य द्रोणका जन्म कलशसे हुआ है। महर्षि गौतमके कुलमें कृपाचार्यकी उत्पत्ति भी सरकंडोंके समूहसे हुई है ।। १५ ।। भवतां च यथा जन्म तदप्यागमितं मया । सकुण्डलं सकवचं सर्वलक्षणलक्षितम् । कथमादित्यसदृशं मृगी व्याघ्रं जनिष्यति ।। १६ ।। 'तुम सब भाइयोंका जन्म जिस प्रकार हुआ है, वह भी मुझे अच्छी तरह मालूम है। समस्त शुभ लक्षणोंसे सुशोभित तथा कुण्डल और कवचके साथ उत्पन्न हुआ सूर्यके समान तेजस्वी कर्ण किसी सूत जातिकी स्त्रीका पुत्र कैसे हो सकता है। क्या कोई हरिणी अपने पेटसे बाघ पैदा कर सकती है? ।। १६ ।। (कथमादित्यसंकाशं सूतोऽमुं जनयिष्यति । एवं क्षत्रगुणैर्युक्तं शूरं समितिशोभनम् ।।) पृथिवीराज्यमहोंऽयं नाङ्गराज्यं नरेश्वरः । अनेन बाहुवीर्येण मया चाज्ञानुवर्तिना ।। १७ ।। 'इस सूर्य-सदृश तेजस्वी वीरको, जो इस प्रकार क्षत्रियोचित गुणोंसे सम्पन्न तथा समरांगणको सुशोभित करनेवाला है, कोई सूत जातिका मनुष्य कैसे उत्पन्न कर सकता है? राजा कर्ण अपने इस बाहुबलसे तथा मुझ जैसे आज्ञापालक मित्रकी सहायतासे अंग-देशका ही नहीं, समूची पृथ्वीका राज्य पानेका अधिकारी है ।। १७ ।। यस्य वा मनुजस्येदं न क्षान्तं मद्विचेष्टितम् । रथमारुह्य पद्भयां स विनामयतु कार्मुकम् ।। १८ ।। 'जिस मनुष्यसे मेरा यह बर्ताव नहीं सहा जाता हो, वह रथपर चढ़कर पैरोंसे अपने धनुषको नवावे- हमारे साथ युद्धके लिये तैयार हो जाय' ।। १८ ।। ततः सर्वस्य रङ्गस्य हाहाकारो महानभूत् । साधुवादानुसम्बद्धः सूर्यश्चास्तमुपागमत् ।। १९ ।। यह सुनकर समूचे रंगमण्डपमें दुर्योधनको मिलने वाले साधुवादके साथ ही (युद्धकी सम्भावनासे) महान् हाहाकार मच गया। इतनेमें ही सूर्यदेव अस्ताचलको चले गये ।। १९ ।। ततो दुर्योधनः कर्णमालम्ब्याग्रकरे नृपः । दीपिकाग्निकृतालोकस्तस्माद् रङ्गाद् विनिर्ययौ ।। २० ।। तब दुर्योधन कर्ण के हाथकी अगुलियाँ पकड़कर मशाल की रोशनी करा उस रंगभूमि से बाहर निकल गया ।। २० ।। पाण्डवाश्च सहद्रोणाः सकृपाश्च विशाम्पते । भीष्मेण सहिताः सर्वे ययुः स्वं स्वं निवेशनम् ।। २१ ।। राजन् ! समस्त पाण्डव भी द्रोण, कृपाचार्य और भीष्मजीके साथ अपने-अपने निवासस्थानको चल दिये ।। २१ ।। अर्जुनेति जनः कश्चित् कश्चित् कर्णेति भारत । कश्चिद् दुर्योधनेत्येवं ब्रुवन्तः प्रस्थितास्तदा ।। २२ ।। भारत ! उस समय दर्शकों में से कोई अर्जुन की, कोई कर्ण की और कोई दुर्योधन की प्रशंसा करते हुए चले गये ।। २२ ।। कुन्त्याश्च प्रत्यभिज्ञाय दिव्यलक्षणसूचितम् । पुत्रमङ्गेश्वरं स्नेहाच्छन्ना प्रीतिरजायत ।। २३ ।। दिव्य लक्षणोंसे लक्षित अपने पुत्र अंगराज कर्णको पहचानकर कुन्तीके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई; किंतु वह दूसरोंपर प्रकट न हुई ।। २३ ।। दुर्योधनस्यापि तदा कर्णमासाद्य पार्थिव । भयमर्जुनसंजातं क्षिप्रमन्तरधीयत ।। २४ ।। जनमेजय ! उस समय कर्णको मित्रके रूपमें पाकर दुर्योधनका भी अर्जुनसे होने वाला भय शीघ्र दूर हो गया ।। २४ ।। स चापि वीरः कृतशस्त्रनिश्रमः परेण साम्नाभ्यवदत् सुयोधनम् । युधिष्ठिरस्याप्यभवत् तदा मति- र्न कर्णतुल्योऽस्ति धनुर्धरः क्षितौ ।। २५ ।। वीरवर कर्णने शस्त्रोंके अभ्यासमें बड़ा परिश्रम किया था, वह भी दुर्योधनके साथ परम स्नेह और सान्त्वनापूर्ण बातें करने लगा। उस समय युधिष्ठिरको भी यह विश्वास हो गया कि इस पृथ्वीपर कर्णके समान धनुर्धर कोई नहीं है ।। २५ ।। इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि अस्त्रदर्शने षट्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १३६ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें अस्त्र-कौशलदर्शनविषयक एक सौ छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १३६ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
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