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।। ॐ ।। अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम्। पितृणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम्॥ #यथार्थ गीता #🧘सदगुरु जी🙏 #❤️जीवन की सीख #🙏गुरु महिमा😇 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 नागों में मैं अनन्त अर्थात् शेषनाग हूँ। वैसे यह कोई सर्प नहीं है। गीता की समकालीन पुस्तक श्रीमद्भागवत में इसके रूप की चर्चा है कि इस पृथ्वी से तीस हजार योजन की दूरी पर परमात्मा की वैष्णवी शक्ति है, जिसके सिर पर यह पृथ्वी सरसों के दाने की तरह भाररहित टिकी है। उस युग में योजन का पैमाना चाहे जो रहा हो, फिर भी यह पर्याप्त दूर है। वस्तुतः यह आकर्षण शक्ति का चित्रण है। वैज्ञानिकों ने जिसे ईथर माना है। ग्रह-उपग्रह सभी उसी शक्ति के आधार पर टिके हैं। उस शून्य में ग्रहों का कोई भार भी नहीं है। वह शक्ति सर्प की कुण्डली की तरह सभी ग्रहों को लपेटे है। यही है वह अनन्त, जिससे पृथ्वी धारण की जाती है। श्रीकृष्ण कहते हैं-ऐसी ईश्वरीय शक्ति मैं हूँ। जलचरों में उनका अधिपति 'वरुण' हूँ तथा पितरों में 'अर्यमा' हूँ। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह पाँच यम हैं। इनके पालन में आनेवाले विकारों को काटना 'अर:' है। विकारों के शमन से पितृ अर्थात् भूत-संस्कार तृप्त होते हैं, निवृत्ति प्रदान कर देते हैं। शासन करनेवालों में मैं यमराज हूँ।
यथार्थ गीता - I 3 Il अनन्तश्वास्मि नागानां वरूणो यादसामहम्। पितृणामर्थ्यमा चास्मि यमः संयमतामहम्।। नागों में मैं अनन्त अर्थात् शेषनाग हूँ वैसे यह कोई सर्प नहीं है। गीता की वस्तुतः यह आकर्षण समकालीन पुस्तक श्रीमद्रभागवत में शक्ति का चित्रण है। इसके रुप की चर्चा है कि इस पृथ्वी वैज्ञानिकों जिसे ईथर से तीस हजार योजन की दूरी पर माना है। ग्रह उपग्रह सभी परमात्मा की वैष्णवी शक्ति है॰ उसी शक्ति के आधार सरसों जिसके सिर पर यह पृथ्वी के दाने की तरह भाररहित टिकी है। पर टिके हैं। उस शून्य में ग्रहों का कोई भार भी नहीं है। वह शक्ति सर्प की की तरह सभी Ssளி ग्रहों को लपेटे है। यही है वह अनन्त, जिससे जलचरों में उनका धारण की जाती है। पृथ्वी अधिपति वरुण ह श्रीकृष्ण ` ಹ೯ಗ मैं हूँ। ऐसी ईश्वरीय शक्ति अहिंसा, सत्य, अस्तेय, पितरों में अर्ख़्यमा' हूँ और अपरिग्रह पाँच यम हैं। इनके पालन পমমর্য में आनेवाले विकारों को काटना  अरः हैं। विकारों के शमन से पितृ अर्थात् भूत- संस्कार तृप्त होते हैं निवृत्ति प्रदान कर देते हैं। शासन करने वालों में मैं यमराज हूँ अर्थात् उपर्युक्त पाँच यम यमों का नियामक हूँ। अपरिग्रह সমবর্য अहिंसा 3{4 सत्य श्रीकृष्ण कहते हैं  मैं ही हूँ, इन दिव्य शक्तियों का आधार जो समस्त जगत को धारण और संचालन करता है। I I 3 Il अनन्तश्वास्मि नागानां वरूणो यादसामहम्। पितृणामर्थ्यमा चास्मि यमः संयमतामहम्।। नागों में मैं अनन्त अर्थात् शेषनाग हूँ वैसे यह कोई सर्प नहीं है। गीता की वस्तुतः यह आकर्षण समकालीन पुस्तक श्रीमद्रभागवत में शक्ति का चित्रण है। इसके रुप की चर्चा है कि इस पृथ्वी वैज्ञानिकों जिसे ईथर से तीस हजार योजन की दूरी पर माना है। ग्रह उपग्रह सभी परमात्मा की वैष्णवी शक्ति है॰ उसी शक्ति के आधार सरसों जिसके सिर पर यह पृथ्वी के दाने की तरह भाररहित टिकी है। पर टिके हैं। उस शून्य में ग्रहों का कोई भार भी नहीं है। वह शक्ति सर्प की की तरह सभी Ssளி ग्रहों को लपेटे है। यही है वह अनन्त, जिससे जलचरों में उनका धारण की जाती है। पृथ्वी अधिपति वरुण ह श्रीकृष्ण ` ಹ೯ಗ मैं हूँ। ऐसी ईश्वरीय शक्ति अहिंसा, सत्य, अस्तेय, पितरों में अर्ख़्यमा' हूँ और अपरिग्रह पाँच यम हैं। इनके पालन পমমর্য में आनेवाले विकारों को काटना  अरः हैं। विकारों के शमन से पितृ अर्थात् भूत- संस्कार तृप्त होते हैं निवृत्ति प्रदान कर देते हैं। शासन करने वालों में मैं यमराज हूँ अर्थात् उपर्युक्त पाँच यम यमों का नियामक हूँ। अपरिग्रह সমবর্য अहिंसा 3{4 सत्य श्रीकृष्ण कहते हैं  मैं ही हूँ, इन दिव्य शक्तियों का आधार जो समस्त जगत को धारण और संचालन करता है। I - ShareChat