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*साधु का चरित्र अत्यन्त निर्मल रहे* *शंख और लिखित दो साधु भाई-भाई थे। दोनों अलग -अलग जगह रहते थे। एक दिन लिखित अपने भाई शंख के आश्रम में गये। वे भूखे थे इसलिए उस वाटिका के फल तोड़कर खाने लगे। इतने में शंख आये उन्होंने भाई को कहा-हम लोग साधु हैं, हमारा चरित्र साधारण लोगों की अपेक्षा अधिक ऊँचा होना चाहिए। मैं तुम्हारा भाई हूँ सो ठीक है पर बिना पूछे भाई की चीज लेना भी चोरी ही है। इसका प्रायश्चित करना आवश्यक है। शंख को अपनी भूल का पता चला। वे इसका दंड लेने राजा के पास गये। उन दिनों चोरी की सजा हाथ काटना थी। लिखित ने खुशी-खुशी अपने हाथ कटवा लिये।* *सत्पुरुषों अर्थात साधु का अनुकरण दूसरे लोग करते हैं इसलिए उन्हें अपने चरित्र की ओर साधारण लोगों की अपेक्षा अधिक ध्यान रखना और अधिक उज्ज्वल बनना आवश्यक है।* *-रामकृपा-* #किस्से-कहानी