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#मेरे विचार #🙏 प्रेरणादायक विचार #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #❤️जीवन की सीख #🙏गीता ज्ञान🛕
मेरे विचार - अहमेवंविधोर्जुन। भक्त्या त्वनन्यया शक्य च तत्त्वेन प्रवेष्टु সান্তু   সম্ভূ ٦٠٩ ١١ 7 परन्तु हे परंतप अर्जुन ! अनन्यभक्तिके  द्वारा इस प्रकार चतुर्भुजरूपवाला मैँ प्रत्यक्ष देखनेके लिये, तत्त्वसे जाननेके लिये तथा प्रवेश करनेके लिये अर्थांत् एकोभावसे प्राप्त होनेके लिये भौ शक्य हूँ Il ५४ II मत्कर्मकृन्मत्परमो   मद्भक्तः  सङ्गवर्जितः निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव११ ಗಣಗಣ್ಕೆ हे अर्जुन ! जो पुरुष केवल मेरे ही लिये कर्त्तव्यकर्मोंको करनेवाला है, मैरे परायण है, भक्त है॰ आसक्तिरहित है और सम्पूर्ण वैरभावसे रहित है* वह अनन्यभक्तियुक्त पुरुष  ही प्राप्त होता है Il ५५ II मुझको ३४ँ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृण्णार्जुनसंवादे विश्वरूपदर्शनयोगो नामैकादशोउध्यायः Il ११ II ~~0~~ अनन्यभक्तिका भाव अगले श्लोकर्म विस्तारपूर्वक कहा है। सर्वत्र भगवद्युद्धि है जानेसे उस पुरुपका अति अपराध करनैवालेमं भी वैरभाव नहॉं होता हैं॰ फिर ऑरीमें ता कहना हो क्या हैं। श्रीमद्भगवढ्गीता अध्याय ११ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार अहमेवंविधोर्जुन। भक्त्या त्वनन्यया शक्य च तत्त्वेन प्रवेष्टु সান্তু   সম্ভূ ٦٠٩ ١١ 7 परन्तु हे परंतप अर्जुन ! अनन्यभक्तिके  द्वारा इस प्रकार चतुर्भुजरूपवाला मैँ प्रत्यक्ष देखनेके लिये, तत्त्वसे जाननेके लिये तथा प्रवेश करनेके लिये अर्थांत् एकोभावसे प्राप्त होनेके लिये भौ शक्य हूँ Il ५४ II मत्कर्मकृन्मत्परमो   मद्भक्तः  सङ्गवर्जितः निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव११ ಗಣಗಣ್ಕೆ हे अर्जुन ! जो पुरुष केवल मेरे ही लिये कर्त्तव्यकर्मोंको करनेवाला है, मैरे परायण है, भक्त है॰ आसक्तिरहित है और सम्पूर्ण वैरभावसे रहित है* वह अनन्यभक्तियुक्त पुरुष  ही प्राप्त होता है Il ५५ II मुझको ३४ँ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृण्णार्जुनसंवादे विश्वरूपदर्शनयोगो नामैकादशोउध्यायः Il ११ II ~~0~~ अनन्यभक्तिका भाव अगले श्लोकर्म विस्तारपूर्वक कहा है। सर्वत्र भगवद्युद्धि है जानेसे उस पुरुपका अति अपराध करनैवालेमं भी वैरभाव नहॉं होता हैं॰ फिर ऑरीमें ता कहना हो क्या हैं। श्रीमद्भगवढ्गीता अध्याय ११ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार - ShareChat