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स्त्री के होंठों को चूमना तभी आध्यात्मिक हो सकता है, जब उसमें वासना नहीं, प्रेम, सम्मान और पूर्ण सजगता हो। सिर्फ होंठों का स्पर्श आध्यात्मिक नहीं होता। यदि मन वासना, अधिकार, लालच या उपयोग की भावना से भरा है, तो वह केवल शारीरिक क्रिया रह जाती है। लेकिन यदि दो व्यक्ति प्रेम में हों, एक-दूसरे का सम्मान करते हों, और उनके बीच सहमति, संवेदनशीलता तथा मौन की गहराई हो — तब वही स्पर्श ध्यान का द्वार बन सकता है। ओशो के अनुसार, प्रेम जब जागरूकता से जुड़ता है तो साधना बन जाता है। जब तुम किसी को चूमो और उस क्षण पूर्णतः उपस्थित हो — न अतीत, न भविष्य, न कल्पना, न जल्दबाज़ी — तब वह क्षण साधारण नहीं रहता। उसमें ऊर्जा, मौन और एकत्व की झलक मिल सकती है। लेकिन याद रखो — आध्यात्मिकता शरीर के किसी एक अंग में नहीं, चेतना में है। होंठ केवल माध्यम हैं, सत्य नहीं। यदि भीतर प्रेम नहीं, तो चुंबन भी खाली है। यदि भीतर प्रेम है, तो एक स्पर्श भी प्रार्थना बन सकता है। सच्चा चुंबन वह है जिसमें किसी पर अधिकार नहीं, केवल समर्पण हो। जिसमें हिंसा नहीं, कोमलता हो। जिसमें उपयोग नहीं, आदर हो। जिसमें जल्दबाज़ी नहीं, धैर्य हो। ऐसे क्षण में दो लोग केवल शरीर से नहीं, हृदय से मिलते हैं। इसलिए कहना अधिक सही होगा: स्त्री के होंठों को चूमना अपने-आप में आध्यात्मिक नहीं है; प्रेम, सहमति, सम्मान और जागरूकता उसे आध्यात्मिक बना सकते हैं। जहाँ प्रेम है, वहाँ परमात्मा की संभावना है। जहाँ सम्मान है, वहाँ पवित्रता है। जहाँ सजगता है, वहाँ ध्यान है। #✍शायरी #💞जीवनसाथी #🏘 म्हारो राजस्थान🙏 #👌म्हाखो मारवाड़ #💃 राजस्थानी स्टाइल