Sunil Bishnoi
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Sunil Bishnoi
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हुस्न वालों से गुजारिश है. इश्क़ वालों पे रहम खाये
स्त्री के होंठों को चूमना तभी आध्यात्मिक हो सकता है, जब उसमें वासना नहीं, प्रेम, सम्मान और पूर्ण सजगता हो। सिर्फ होंठों का स्पर्श आध्यात्मिक नहीं होता। यदि मन वासना, अधिकार, लालच या उपयोग की भावना से भरा है, तो वह केवल शारीरिक क्रिया रह जाती है। लेकिन यदि दो व्यक्ति प्रेम में हों, एक-दूसरे का सम्मान करते हों, और उनके बीच सहमति, संवेदनशीलता तथा मौन की गहराई हो — तब वही स्पर्श ध्यान का द्वार बन सकता है। ओशो के अनुसार, प्रेम जब जागरूकता से जुड़ता है तो साधना बन जाता है। जब तुम किसी को चूमो और उस क्षण पूर्णतः उपस्थित हो — न अतीत, न भविष्य, न कल्पना, न जल्दबाज़ी — तब वह क्षण साधारण नहीं रहता। उसमें ऊर्जा, मौन और एकत्व की झलक मिल सकती है। लेकिन याद रखो — आध्यात्मिकता शरीर के किसी एक अंग में नहीं, चेतना में है। होंठ केवल माध्यम हैं, सत्य नहीं। यदि भीतर प्रेम नहीं, तो चुंबन भी खाली है। यदि भीतर प्रेम है, तो एक स्पर्श भी प्रार्थना बन सकता है। सच्चा चुंबन वह है जिसमें किसी पर अधिकार नहीं, केवल समर्पण हो। जिसमें हिंसा नहीं, कोमलता हो। जिसमें उपयोग नहीं, आदर हो। जिसमें जल्दबाज़ी नहीं, धैर्य हो। ऐसे क्षण में दो लोग केवल शरीर से नहीं, हृदय से मिलते हैं। इसलिए कहना अधिक सही होगा: स्त्री के होंठों को चूमना अपने-आप में आध्यात्मिक नहीं है; प्रेम, सहमति, सम्मान और जागरूकता उसे आध्यात्मिक बना सकते हैं। जहाँ प्रेम है, वहाँ परमात्मा की संभावना है। जहाँ सम्मान है, वहाँ पवित्रता है। जहाँ सजगता है, वहाँ ध्यान है। #✍शायरी #💞जीवनसाथी #🏘 म्हारो राजस्थान🙏 #👌म्हाखो मारवाड़ #💃 राजस्थानी स्टाइल
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👌म्हाखो मारवाड़ - मीठी मनुहारा करता थकां सुगन सगळा जोय छाय जमानो जोरको , अमृत | वर्षा सुख समृद्वि घर में होवे , घुळ मिळ सगळा रेय हाळी अमावस ऐड़ा सुगन, आप सब ने देय |। अमावस री सगळा नै घणी घणी सुभकामनावां " எனி मीठी मनुहारा करता थकां सुगन सगळा जोय छाय जमानो जोरको , अमृत | वर्षा सुख समृद्वि घर में होवे , घुळ मिळ सगळा रेय हाळी अमावस ऐड़ा सुगन, आप सब ने देय |। अमावस री सगळा नै घणी घणी सुभकामनावां " எனி - ShareChat
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💃 राजस्थानी स्टाइल - तू लाख खूबसूरत ही सही , तो कुछ भी नही। पर वफादार नही तू लाख खूबसूरत ही सही , तो कुछ भी नही। पर वफादार नही - ShareChat
#🏘 म्हारो राजस्थान🙏 #👌म्हाखो मारवाड़ #✍शायरी #💞जीवनसाथी #💃 राजस्थानी स्टाइल
🏘 म्हारो राजस्थान🙏 - दो दोहा.. माँ जायां भीड़ पडी , लड़र्या लेय वकील। लोग तमासा देखर्या , कोर्ट मिले अपील।। बूढिया, हिलमिल रहता सीर। सम्प राखता भीड़ पड्या जा ऊभता , कहता डर मत बीर।। दो दोहा.. माँ जायां भीड़ पडी , लड़र्या लेय वकील। लोग तमासा देखर्या , कोर्ट मिले अपील।। बूढिया, हिलमिल रहता सीर। सम्प राखता भीड़ पड्या जा ऊभता , कहता डर मत बीर।। - ShareChat
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✍शायरी - बाप डुबाई गौरड़ी , आछो देख्यो छैल। ओ है काळो कागलो , तू है II फुटरी है सोवणी , कोजो काळो बीन। तू कतरी फोटो खांचे रातने होजा ओ अनसीन II म्हारी होज्या मेनकी , देऊं दोहा मांड| बांध सेवरो आवयो, सरकारी मैं सांडI। साथै फेरा खावले , बेठ चंवरी तीर। कराद्यूँ बावळी " सा जागीर।। দ্কাহী নাম बाप डुबाई गौरड़ी , आछो देख्यो छैल। ओ है काळो कागलो , तू है II फुटरी है सोवणी , कोजो काळो बीन। तू कतरी फोटो खांचे रातने होजा ओ अनसीन II म्हारी होज्या मेनकी , देऊं दोहा मांड| बांध सेवरो आवयो, सरकारी मैं सांडI। साथै फेरा खावले , बेठ चंवरी तीर। कराद्यूँ बावळी " सा जागीर।। দ্কাহী নাম - ShareChat
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💞जीवनसाथी - फागण मांही फूटरी ,लागै गजबण गोर। छळगारो में छैल हूं॰ ल्यूँ ला जोबन चोर II निकळी गजबण गोर। झूमळी  झूमका रसिया भूलग्या रासतो , कई कुटाया मोर Il रस मळाइ रस भरी , फागण लगे सुवाद| घर आयो है बालमो , तीन बरस के बाद।l फागण मांही फूटरी ,लागै गजबण गोर। छळगारो में छैल हूं॰ ल्यूँ ला जोबन चोर II निकळी गजबण गोर। झूमळी  झूमका रसिया भूलग्या रासतो , कई कुटाया मोर Il रस मळाइ रस भरी , फागण लगे सुवाद| घर आयो है बालमो , तीन बरस के बाद।l - ShareChat
पुरुषों को समझने में महिलाएँ क्यों चूक जाती हैं “स्त्री प्रेम पाने के लिए देह देती है, पुरुष देह पाने के लिए प्रेम देता है” यह वाक्य पूर्ण सत्य नहीं, पर एक संकेत अवश्य है। संकेत इस बात का कि स्त्री और पुरुष प्रेम को एक ही भाषा में नहीं जीते। शब्द एक हो सकते हैं, अनुभूति का ढांचा अलग होता है। और यहीं से शुरू होती है वह चूक, जो बार-बार संबंधों में दिखाई देती है। यह चूक केवल स्त्रियों की नहीं है, पर यहाँ बात उस पक्ष की है जो प्रेम को अपना सम्पूर्ण केंद्र बना लेता है और फिर उसी केंद्र से घायल होता है। 1. प्रेम का अर्थ: मिलन या विस्तार? बहुत सी महिलाएँ प्रेम को मिलन के रूप में देखती हैं दो जीवन एक हो जाएँ, दो यात्राएँ एक दिशा ले लें, दो अस्तित्व एक साझा घर बना लें। प्रेम उनके लिए केवल आकर्षण नहीं, आश्रय भी है; केवल स्पर्श नहीं, स्वीकार भी है; केवल संग नहीं, समर्पण भी है। बहुत से पुरुष प्रेम को विस्तार के रूप में देखते हैं जीवन में एक उजास, एक प्रेरणा, एक भावनात्मक ऊर्जा जो उन्हें आगे बढ़ाए। उनके लिए प्रेम अक्सर यात्रा का सहचर है, स्वयं यात्रा नहीं। जब एक व्यक्ति प्रेम को घर बना ले और दूसरा उसे रास्ते की छाँव समझे तब दुख तय है। स्त्री सोचती है: “हम एक हैं।” पुरुष सोचता है: “हम साथ हैं।” यह ‘एक’ और ‘साथ’ के बीच का अंतर ही कई बार दूरी बन जाता है। 2. समर्पण बनाम स्वत्व एक लड़की जब प्रेम में पड़ती है, तो वह अपना संसार खोल देती है। उसका समय, उसकी प्राथमिकताएँ, उसके सपने सब धीरे-धीरे उस एक व्यक्ति के इर्द-गिर्द घूमने लगते हैं। वह संबंध को पोषित करने में अपनी ऊर्जा लगा देती है। पुरुष प्रायः अपने स्वत्व को बचाए रखते हैं। उनका काम, उनकी महत्वाकांक्षा, उनका सामाजिक दायरा यह सब जस का तस चलता रहता है। वे प्रेम करते हुए भी स्वयं को केंद्र से हटाते नहीं। स्त्री इसे उदासीनता समझ लेती है। पुरुष इसे स्वाभाविक मानता है। स्त्री सोचती है: “मैंने सब तुम्हारे लिए बदल दिया।” पुरुष सोचता है: “मैं तो वही हूँ, तुम क्यों बदल गई?” यहीं चूक है स्त्री यह मान लेती है कि समर्पण का उत्तर भी समर्पण ही होगा। जबकि पुरुष के लिए प्रेम और पहचान दो अलग खाँचे हैं। 3. संकेतों की भाषा और मौन की भाषा बहुत सी महिलाएँ संकेतों में बात करती हैं। वह चाहती हैं कि सामने वाला बिना कहे समझ ले। उनकी अपेक्षा होती है कि ध्यान, स्मृति, संवेदनशीलता यह सब स्वाभाविक हो। पुरुष अक्सर स्पष्ट शब्दों की भाषा समझते हैं। संकेत उनके लिए धुंधले होते हैं। वे शिकायत को ताना समझ लेते हैं, मौन को सहमति। स्त्री कहती है: “तुम बदल गए हो।” असल में वह कहना चाहती है: “मुझे तुम्हारी जरूरत है।” पुरुष सुनता है: “मैं गलत हूँ।” और वह बचाव में चला जाता है। समझ की यह दरार धीरे-धीरे खाई बन जाती है। 4. स्मृति बनाम वर्तमान बहुत सी महिलाएँ संबंध को उसकी पूरी यात्रा के साथ देखती हैं। उन्हें पहली मुलाकात याद रहती है, पहली लड़ाई, पहली बारिश, पहली मुस्कान। उनके लिए प्रेम एक निरंतरता है अतीत से वर्तमान तक। पुरुष अक्सर वर्तमान में जीते हैं। आज सब ठीक है तो सब ठीक है। कल क्या था, किसने क्या कहा वह उनके लिए उतना निर्णायक नहीं होता। स्त्री सोचती है: “इतना सब हुआ, और तुम भूल गए?” पुरुष सोचता है: “अब तो सब ठीक है, फिर बात क्यों?” एक के लिए स्मृति प्रेम की जड़ है। दूसरे के लिए वर्तमान प्रेम की धड़कन। दोनों सही हैं, पर असमान हैं। 5. प्रेम और उद्देश्य का टकराव बहुत बार पुरुष जीवन को उपलब्धियों के संदर्भ में देखते हैं काम, पहचान, लक्ष्य, संघर्ष। प्रेम उनके लिए प्रेरक हो सकता है, पर लक्ष्य का स्थान नहीं लेता। स्त्री कई बार प्रेम को ही लक्ष्य बना लेती है। वह संबंध को सफल बनाने में अपने अस्तित्व की पूर्ति खोजती है। जब पुरुष अपने लक्ष्य में डूब जाता है, स्त्री को लगता है कि वह पीछे छूट गई। जब स्त्री संबंध में गहराई चाहती है, पुरुष को लगता है कि उस पर अनावश्यक दबाव है। यहाँ कोई खलनायक नहीं है केवल दृष्टिकोण का अंतर है। 6. त्याग की कथा और अपेक्षा का बोझ स्त्री अपने त्याग को याद रखती है छोड़ा हुआ घर, बदली हुई आदतें, टूटे हुए सपने। वह इन सबको प्रेम की कीमत मानती है। पुरुष त्याग को उतनी सूक्ष्मता से नहीं गिनते। उन्हें लगता है कि जीवन में परिवर्तन स्वाभाविक हैं। जब स्त्री अपने भीतर यह जोड़-घटाव करती रहती है और सामने से उतना ही भावनात्मक प्रतिदान नहीं मिलता तब उसे लगता है कि उसका मूल्य नहीं समझा गया। असल में पुरुष कई बार प्रेम को स्थिर मान लेते हैं “वह है, तो है।” और स्त्री चाहती है कि प्रेम को बार-बार व्यक्त किया जाए। 7. सबसे गहरी चूक: प्रेम को स्वयं से ऊपर रख देना स्त्री जब प्रेम को स्वयं से ऊपर रख देती है, तभी वह सबसे अधिक आहत होती है। क्योंकि तब उसका सुख, उसका आत्म-सम्मान, उसकी पहचान सब दूसरे के व्यवहार पर निर्भर हो जाते हैं। और कोई भी मनुष्य इतना सक्षम नहीं कि वह दूसरे के सम्पूर्ण अस्तित्व का भार उठा सके। प्रेम दो पूर्ण व्यक्तियों के बीच सुंदर होता है। एक पूर्ण और एक निर्भर के बीच वह असंतुलित हो जाता है। 8. समाधान क्या है? चूक को दोष में बदल देने से कुछ नहीं बदलेगा। समझ का पहला कदम यह है कि प्रेम की अपनी भाषा पहचानी जाए। यदि आप समर्पण करती हैं, तो पूछिए क्या सामने वाला भी उसी भाषा में जीता है? यदि आपको ध्यान चाहिए, तो स्पष्ट कहिए। यदि आपने त्याग किया है, तो उसे मौन पीड़ा मत बनाइए। और सबसे महत्वपूर्ण प्रेम के साथ स्वयं को मत खोइए। प्रेम किसी को केंद्र बनाना नहीं है। प्रेम दो केंद्रों के बीच संतुलन है। जब स्त्री यह समझ लेती है कि पुरुष प्रेम को अलग ढंग से जी सकता है और जब पुरुष यह समझ लेता है कि स्त्री के लिए प्रेम जीवन का गहनतम भाव है तब चूक कम होने लगती है। अन्यथा हर युग में कोई न कोई प्रतीक्षा करती रह जाएगी, और कोई न कोई आगे बढ़ता रहेगा। प्रेम में सबसे बड़ी भूल यह नहीं कि कोई चला गया। सबसे बड़ी भूल यह है कि हमने स्वयं को उसके जाने के साथ ही समाप्त मान लिया। और जो स्वयं को बचा लेता है वही प्रेम को भी बचा सकता है। #💃 राजस्थानी स्टाइल #👌म्हाखो मारवाड़ #✍शायरी #🏘 म्हारो राजस्थान🙏 #💞जीवनसाथी
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🏘 म्हारो राजस्थान🙏 - [ కడీ క్డి 1 "ು ؟ जबकि  [ కడీ క్డి 1 "ು ؟ जबकि - ShareChat
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✍शायरी - कोई म्हानै पसंद करै या नीं करै, पण म्हे थारै नेड़ै ्नेड़ै ही रैस्यां  जे पसंद करो तो दिल मांय रैस्यां 'अर नापसंद करो तो मगज(दिमाग)मांय। । [ कोई म्हानै पसंद करै या नीं करै, पण म्हे थारै नेड़ै ्नेड़ै ही रैस्यां  जे पसंद करो तो दिल मांय रैस्यां 'अर नापसंद करो तो मगज(दिमाग)मांय। । [ - ShareChat
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💃 राजस्थानी स्टाइल - तुम्हें पटाने को प्रियतमा " इनबॉक्स में आने को हूं स्नेह निमंत्रण  ` 3 सुंदरी तुम भूल न जाना - तुम्हें पटाने को प्रियतमा " इनबॉक्स में आने को हूं स्नेह निमंत्रण  ` 3 सुंदरी तुम भूल न जाना - - ShareChat