Bishnoi  Sunil
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Bishnoi Sunil
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हुस्न वालों से गुजारिश है. इश्क़ वालों पे रहम खाये
पुरुषों को समझने में महिलाएँ क्यों चूक जाती हैं “स्त्री प्रेम पाने के लिए देह देती है, पुरुष देह पाने के लिए प्रेम देता है” यह वाक्य पूर्ण सत्य नहीं, पर एक संकेत अवश्य है। संकेत इस बात का कि स्त्री और पुरुष प्रेम को एक ही भाषा में नहीं जीते। शब्द एक हो सकते हैं, अनुभूति का ढांचा अलग होता है। और यहीं से शुरू होती है वह चूक, जो बार-बार संबंधों में दिखाई देती है। यह चूक केवल स्त्रियों की नहीं है, पर यहाँ बात उस पक्ष की है जो प्रेम को अपना सम्पूर्ण केंद्र बना लेता है और फिर उसी केंद्र से घायल होता है। 1. प्रेम का अर्थ: मिलन या विस्तार? बहुत सी महिलाएँ प्रेम को मिलन के रूप में देखती हैं दो जीवन एक हो जाएँ, दो यात्राएँ एक दिशा ले लें, दो अस्तित्व एक साझा घर बना लें। प्रेम उनके लिए केवल आकर्षण नहीं, आश्रय भी है; केवल स्पर्श नहीं, स्वीकार भी है; केवल संग नहीं, समर्पण भी है। बहुत से पुरुष प्रेम को विस्तार के रूप में देखते हैं जीवन में एक उजास, एक प्रेरणा, एक भावनात्मक ऊर्जा जो उन्हें आगे बढ़ाए। उनके लिए प्रेम अक्सर यात्रा का सहचर है, स्वयं यात्रा नहीं। जब एक व्यक्ति प्रेम को घर बना ले और दूसरा उसे रास्ते की छाँव समझे तब दुख तय है। स्त्री सोचती है: “हम एक हैं।” पुरुष सोचता है: “हम साथ हैं।” यह ‘एक’ और ‘साथ’ के बीच का अंतर ही कई बार दूरी बन जाता है। 2. समर्पण बनाम स्वत्व एक लड़की जब प्रेम में पड़ती है, तो वह अपना संसार खोल देती है। उसका समय, उसकी प्राथमिकताएँ, उसके सपने सब धीरे-धीरे उस एक व्यक्ति के इर्द-गिर्द घूमने लगते हैं। वह संबंध को पोषित करने में अपनी ऊर्जा लगा देती है। पुरुष प्रायः अपने स्वत्व को बचाए रखते हैं। उनका काम, उनकी महत्वाकांक्षा, उनका सामाजिक दायरा यह सब जस का तस चलता रहता है। वे प्रेम करते हुए भी स्वयं को केंद्र से हटाते नहीं। स्त्री इसे उदासीनता समझ लेती है। पुरुष इसे स्वाभाविक मानता है। स्त्री सोचती है: “मैंने सब तुम्हारे लिए बदल दिया।” पुरुष सोचता है: “मैं तो वही हूँ, तुम क्यों बदल गई?” यहीं चूक है स्त्री यह मान लेती है कि समर्पण का उत्तर भी समर्पण ही होगा। जबकि पुरुष के लिए प्रेम और पहचान दो अलग खाँचे हैं। 3. संकेतों की भाषा और मौन की भाषा बहुत सी महिलाएँ संकेतों में बात करती हैं। वह चाहती हैं कि सामने वाला बिना कहे समझ ले। उनकी अपेक्षा होती है कि ध्यान, स्मृति, संवेदनशीलता यह सब स्वाभाविक हो। पुरुष अक्सर स्पष्ट शब्दों की भाषा समझते हैं। संकेत उनके लिए धुंधले होते हैं। वे शिकायत को ताना समझ लेते हैं, मौन को सहमति। स्त्री कहती है: “तुम बदल गए हो।” असल में वह कहना चाहती है: “मुझे तुम्हारी जरूरत है।” पुरुष सुनता है: “मैं गलत हूँ।” और वह बचाव में चला जाता है। समझ की यह दरार धीरे-धीरे खाई बन जाती है। 4. स्मृति बनाम वर्तमान बहुत सी महिलाएँ संबंध को उसकी पूरी यात्रा के साथ देखती हैं। उन्हें पहली मुलाकात याद रहती है, पहली लड़ाई, पहली बारिश, पहली मुस्कान। उनके लिए प्रेम एक निरंतरता है अतीत से वर्तमान तक। पुरुष अक्सर वर्तमान में जीते हैं। आज सब ठीक है तो सब ठीक है। कल क्या था, किसने क्या कहा वह उनके लिए उतना निर्णायक नहीं होता। स्त्री सोचती है: “इतना सब हुआ, और तुम भूल गए?” पुरुष सोचता है: “अब तो सब ठीक है, फिर बात क्यों?” एक के लिए स्मृति प्रेम की जड़ है। दूसरे के लिए वर्तमान प्रेम की धड़कन। दोनों सही हैं, पर असमान हैं। 5. प्रेम और उद्देश्य का टकराव बहुत बार पुरुष जीवन को उपलब्धियों के संदर्भ में देखते हैं काम, पहचान, लक्ष्य, संघर्ष। प्रेम उनके लिए प्रेरक हो सकता है, पर लक्ष्य का स्थान नहीं लेता। स्त्री कई बार प्रेम को ही लक्ष्य बना लेती है। वह संबंध को सफल बनाने में अपने अस्तित्व की पूर्ति खोजती है। जब पुरुष अपने लक्ष्य में डूब जाता है, स्त्री को लगता है कि वह पीछे छूट गई। जब स्त्री संबंध में गहराई चाहती है, पुरुष को लगता है कि उस पर अनावश्यक दबाव है। यहाँ कोई खलनायक नहीं है केवल दृष्टिकोण का अंतर है। 6. त्याग की कथा और अपेक्षा का बोझ स्त्री अपने त्याग को याद रखती है छोड़ा हुआ घर, बदली हुई आदतें, टूटे हुए सपने। वह इन सबको प्रेम की कीमत मानती है। पुरुष त्याग को उतनी सूक्ष्मता से नहीं गिनते। उन्हें लगता है कि जीवन में परिवर्तन स्वाभाविक हैं। जब स्त्री अपने भीतर यह जोड़-घटाव करती रहती है और सामने से उतना ही भावनात्मक प्रतिदान नहीं मिलता तब उसे लगता है कि उसका मूल्य नहीं समझा गया। असल में पुरुष कई बार प्रेम को स्थिर मान लेते हैं “वह है, तो है।” और स्त्री चाहती है कि प्रेम को बार-बार व्यक्त किया जाए। 7. सबसे गहरी चूक: प्रेम को स्वयं से ऊपर रख देना स्त्री जब प्रेम को स्वयं से ऊपर रख देती है, तभी वह सबसे अधिक आहत होती है। क्योंकि तब उसका सुख, उसका आत्म-सम्मान, उसकी पहचान सब दूसरे के व्यवहार पर निर्भर हो जाते हैं। और कोई भी मनुष्य इतना सक्षम नहीं कि वह दूसरे के सम्पूर्ण अस्तित्व का भार उठा सके। प्रेम दो पूर्ण व्यक्तियों के बीच सुंदर होता है। एक पूर्ण और एक निर्भर के बीच वह असंतुलित हो जाता है। 8. समाधान क्या है? चूक को दोष में बदल देने से कुछ नहीं बदलेगा। समझ का पहला कदम यह है कि प्रेम की अपनी भाषा पहचानी जाए। यदि आप समर्पण करती हैं, तो पूछिए क्या सामने वाला भी उसी भाषा में जीता है? यदि आपको ध्यान चाहिए, तो स्पष्ट कहिए। यदि आपने त्याग किया है, तो उसे मौन पीड़ा मत बनाइए। और सबसे महत्वपूर्ण प्रेम के साथ स्वयं को मत खोइए। प्रेम किसी को केंद्र बनाना नहीं है। प्रेम दो केंद्रों के बीच संतुलन है। जब स्त्री यह समझ लेती है कि पुरुष प्रेम को अलग ढंग से जी सकता है और जब पुरुष यह समझ लेता है कि स्त्री के लिए प्रेम जीवन का गहनतम भाव है तब चूक कम होने लगती है। अन्यथा हर युग में कोई न कोई प्रतीक्षा करती रह जाएगी, और कोई न कोई आगे बढ़ता रहेगा। प्रेम में सबसे बड़ी भूल यह नहीं कि कोई चला गया। सबसे बड़ी भूल यह है कि हमने स्वयं को उसके जाने के साथ ही समाप्त मान लिया। और जो स्वयं को बचा लेता है वही प्रेम को भी बचा सकता है। #💃 राजस्थानी स्टाइल #👌म्हाखो मारवाड़ #✍शायरी #🏘 म्हारो राजस्थान🙏 #💞जीवनसाथी
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🏘 म्हारो राजस्थान🙏 - [ కడీ క్డి 1 "ು ؟ जबकि  [ కడీ క్డి 1 "ು ؟ जबकि - ShareChat
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✍शायरी - कोई म्हानै पसंद करै या नीं करै, पण म्हे थारै नेड़ै ्नेड़ै ही रैस्यां  जे पसंद करो तो दिल मांय रैस्यां 'अर नापसंद करो तो मगज(दिमाग)मांय। । [ कोई म्हानै पसंद करै या नीं करै, पण म्हे थारै नेड़ै ्नेड़ै ही रैस्यां  जे पसंद करो तो दिल मांय रैस्यां 'अर नापसंद करो तो मगज(दिमाग)मांय। । [ - ShareChat
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💃 राजस्थानी स्टाइल - तुम्हें पटाने को प्रियतमा " इनबॉक्स में आने को हूं स्नेह निमंत्रण  ` 3 सुंदरी तुम भूल न जाना - तुम्हें पटाने को प्रियतमा " इनबॉक्स में आने को हूं स्नेह निमंत्रण  ` 3 सुंदरी तुम भूल न जाना - - ShareChat
स्त्री जब प्रेम में उतरती है तो सबसे पहले अपना डर सामने रखती है। उसके भीतर एक मौन प्रश्न साँस लेता रहता है “अगर मैं बिखर गई, तो क्या कोई मुझे बिना आँच लगाए समेट पाएगा?” इसीलिए वह जल्दी नहीं जुड़ती, वह खुद को परत दर परत खोलती है। हर परत पर भरोसे की परीक्षा होती है। उसके लिए प्रेम सिर्फ़ पास आना नहीं, बल्कि भीतर तक देखे जाना है। वह चाहती है कि कोई उसके शब्दों से पहले उसकी ख़ामोशी समझे, उसकी मुस्कान से पहले उसकी थकान पढ़ ले। स्त्री प्रेम में खुद को नहीं मिटाती, वह खुद को और स्पष्ट करती है। वह खिलती है जैसे फूल धूप माँगता है, हवा चाहता है, पर अपनी जड़ें नहीं छोड़ता। और सबसे गहरा सत्य यह है वह प्रेम में रहकर भी अपनी पहचान बचाए रखना चाहती है। वह चाहती है कि उसे चाहने वाला उसे “अपना” कहने से पहले उसे पूरा इंसान माने। क्योंकि स्त्री का प्रेम हासिल करने की वस्तु नहीं, संभालने की जिम्मेदारी है। #🏘 म्हारो राजस्थान🙏 #💞जीवनसाथी #✍शायरी #👌म्हाखो मारवाड़ #💃 राजस्थानी स्टाइल
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💃 राजस्थानी स्टाइल - मुस्लस्ल हमारी तुम्हारी , बात होती रहे; शनैः~शनैः प्रेम की,बरसात होती रहे! घड़ा भी भर जाता, आखिर बूंद बूंद से मुझ पर तेरी ऐसी , करामात होती रहे! मुस्लस्ल हमारी तुम्हारी , बात होती रहे; शनैः~शनैः प्रेम की,बरसात होती रहे! घड़ा भी भर जाता, आखिर बूंद बूंद से मुझ पर तेरी ऐसी , करामात होती रहे! - ShareChat
अगर कोई आपको बहुत ज्यादा प्राथमिकता दे, तो उस व्यक्ति को बहुत सस्ता मत समझो !! आपका भाग्य अच्छा है …. क्योंकि इस दुनिया में इतने सारे लोग होते हुये भी , वे आपको प्राथमिकता देते हैं...... हमेसा आपको समझने की कोशिश करते हैं .... वह आपके साथ समय बिताने का आनंद लेते है..... हो सकता है आपको यह प्राथमिकता कई बार कष्टप्रद लगे ....... बस एक बार सोचो, उस इंसान के लिए जिसके लिए तुम इतने खास हो...... क्या उसकी उपेक्षा करना सही है......? उसकी प्राथमिकता को महत्व देना सीखें …. उसे थोड़ा समझना सीखो….. फिर चाहे वो दोस्ती हो या प्यार का रिश्ता !! 🖤🩷 ✍❤🥀 #✍शायरी #👌म्हाखो मारवाड़ #🏘 म्हारो राजस्थान🙏 #💞जीवनसाथी #💃 राजस्थानी स्टाइल
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💃 राजस्थानी स्टाइल - सरदी मांही सायबा , कांपण लाग्या हाड। तू ना आयो बावळा , धापी गाळ्यां काड II सिंया मरगी साजना , पड़गी देह दुबळी आग लगावे भोळिया , पोवठ आळो मेह Il सरदी मांही सायबा , कांपण लाग्या हाड। तू ना आयो बावळा , धापी गाळ्यां काड II सिंया मरगी साजना , पड़गी देह दुबळी आग लगावे भोळिया , पोवठ आळो मेह Il - ShareChat
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💞जीवनसाथी - हलदी रांधी रांझणा , मन भावे तो आव। फीकी लागै बालमा , थां बिन म्हाने साव।। सबकै घर में बालमा , सोवै साजन ओड। पाड़ोसण घर सामली नाचे कर कर कोड।l दो दिन आज्या पावणो , कह मन री बात। जाती सरदी सायबा, साथ बितावां रात Il हलदी रांधी रांझणा , मन भावे तो आव। फीकी लागै बालमा , थां बिन म्हाने साव।। सबकै घर में बालमा , सोवै साजन ओड। पाड़ोसण घर सामली नाचे कर कर कोड।l दो दिन आज्या पावणो , कह मन री बात। जाती सरदी सायबा, साथ बितावां रात Il - ShareChat