Parmod Jain
गांधी की मौत गोली से हुई थी, विचारों से नहीं—मकरंद परांजपे की किताब बताती है शहीद गांधी की असली शक्ति
जब एक निहत्था मनुष्य हिंसा के सामने खड़ा हुआ और उसकी मृत्यु उसके जीवन से भी बड़ी कहानी बन गई
30 जनवरी 1948 की शाम गांधीजी के सीने पर तीन गोलियां दागी गईं। लेकिन क्या गांधी उसी क्षण समाप्त हो गए ?
शायद नहीं।
शायद उस शाम गांधी की मृत्यु नहीं हुई थी—बल्कि उनका एक नया जन्म हुआ था। 30 जनवरी को गांधीजी का जीवन पूरे विश्व के लिए एक दूधिया रौशनी से प्रकाशित मंच बन गया।
प्रोफेसर मकरंद आर. परांजपे की महत्वपूर्ण पुस्तक The Death And Afterlife Of Mahatma Gandhi इसी असाधारण प्रश्न के इर्द-गिर्द घूमती है। यह गांधी की हत्या का महज राजनीतिक वृत्तांत नहीं है। यह उस गांधी को समझने का प्रयास है, जो अपनी मृत्यु के ठीक पहले सत्य, अहिंसा, प्रेम और साम्प्रदायिक सद्भाव के सबसे कठिन प्रयोग से गुजर रहे थे।
पुस्तक का एक महत्वपूर्ण हिस्सा गांधी के अंतिम 144 दिनों को सामने रखता है। यह वह समय था जब भारत स्वतंत्र तो हो चुका था, लेकिन स्वतंत्रता की सुबह विभाजन के रक्त से लाल थी। दिल्ली से लेकर बंगाल और बिहार तक साम्प्रदायिक हिंसा की आग भड़क रही थी। लाखों लोग उजड़ चुके थे। मनुष्य ने मनुष्य पर विश्वास करना लगभग छोड़ दिया था।
और ऐसे समय में गांधी क्या कर रहे थे?
उनके हाथ में न सत्ता थी, न सेना, न हथियार।
उनके पास केवल सत्य, उपवास, प्रार्थना, आत्मबल और अहिंसा थी।
परांजपे गांधी के इसी अंतिम संघर्ष को उनकी जीवन-यात्रा का चरम बिंदु मानते हैं। गांधी के लिए अहिंसा केवल हिंसा न करने का सिद्धांत नहीं थी। वह भय पर विजय पाने की साधना थी। उनके लिए अहिंसा का अर्थ था—जिस व्यक्ति से आप घृणा करते हैं, उसके भीतर भी मनुष्य को देख पाना।
लेकिन यहाँ एक असुविधाजनक प्रश्न भी उठता है—क्या गांधी सफल हुए?
वे विभाजन नहीं रोक सके। वे साम्प्रदायिक हिंसा को पूरी तरह समाप्त नहीं कर सके। वे उन लाखों लोगों को नहीं बचा सके जो नफरत की आग में मारे गए। अंततः नफरत की एक गोली ने उन्हें भी छीन लिया।
फिर उनकी शक्ति कहाँ थी?
यही इस पुस्तक का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है।
गांधी की शक्ति तत्काल राजनीतिक विजय में नहीं, बल्कि नैतिक प्रतिरोध की उस क्षमता में थी जो हार के बीच भी मनुष्य को मनुष्य बने रहने का साहस देती है।
और इसी संदर्भ में परमाणु बम से जुड़ा वह प्रसंग गांधी के व्यक्तित्व को असाधारण ऊँचाई देता है।
अमेरिकी पत्रकार मार्गरेट बर्क वाइट उनसे सवाल करती हैं कि गांधीजी आप अपनी अहिंसा से परमाणु बम का मुकाबला कैसे करेंगे? कुछ देर के लिए गांधी सोच की मुद्रा में खामोश हो जाते हैं और फिर कहते हैं, "जाहिर है कि मैं किसी कायर की तरह भाग कर बंकर में छिपकर नहीं बैठूंगा। बल्कि मैं खुले आसमान के नीचे सीना तानकर खड़ा होऊंगा और एटम बम का सामना आत्मबल से करूंगा। भले ही बमवर्षक विमान का पायलट मुझे देख न सके, लेकिन उसे दिखाना चाहूंगा कि देखो मेरे दिल में तुम्हारे लिए कोई नफरत नहीं है।" गांधीजी का यह उत्तर उस विश्वास का प्रतीक है, जिसमें वे दिखाते हैं कि उनका न केवल जीवन अंहिसा के सौंदर्य से परिपूर्ण है बल्कि उनकी मृत्यु का सौंदर्य रही खुई कमी पूरेर कर देगा।
इस प्रसंग में गांधी की अहिंसा अपनी सबसे चरम अवस्था में दिखाई देती है। एक ओर आधुनिक सभ्यता की सबसे विनाशकारी शक्ति—परमाणु बम; दूसरी ओर एक निहत्था मनुष्य।
एक के पास विनाश की शक्ति थी।
दूसरे के पास आत्मबल।
गांधी का विश्वास था कि बम शरीर को नष्ट कर सकता है, लेकिन मनुष्य के भीतर की करुणा, सत्य और निर्भयता को नहीं। उनके लिए मृत्यु से बचना ही जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य नहीं था; बल्कि सत्य के लिए मृत्यु का भय छोड़ देना उससे कहीं बड़ी उपलब्धि थी।
यहीं आकर परांजपे की पुस्तक का Death And Afterlife वाला विचार असाधारण अर्थ ग्रहण करता है।
गांधी की मृत्यु उनके शरीर का अंत थी, लेकिन उनके विचारों के लिए एक नए अध्याय की शुरुआत। जिस व्यक्ति को एक गोली ने चुप करा दिया, उसकी आवाज उसके बाद और सुदूर क्षितिज तक सुनाई देने लगी।
यही शहीद गांधी की शक्ति है।
जीवित गांधी हमारे सामने चलते थे, बोलते थे, उपवास करते थे और सत्याग्रह करते थे। शहीद गांधी अब हमारे सामने एक प्रश्न बनकर खड़े हैं-
जब चारों ओर हिंसा हो तो हम क्या चुनेंगे?
जब सामने घृणा हो तो क्या हम भी घृणा करेंगे?
जब हमारे हाथ में शक्ति हो तो क्या हम प्रतिशोध लेंगे?
और जब सत्य के रास्ते पर अकेले खड़े होना पड़े, तब क्या हम अपने भीतर इतना आत्मबल पैदा कर पाएँगे कि भय हमें झुका न सके?
परांजपे की पुस्तक का महत्व इसी में है कि वह गांधी को न तो केवल महात्मा बनाकर पूजती है, न केवल राजनीतिक नेता बनाकर सीमित करती है। वह उनकी उपलब्धियों के साथ उनकी सीमाओं को भी देखने की कोशिश करती है। गांधी की असफलताएँ भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं जितनी उनकी सफलताएँ, क्योंकि उन्हीं के बीच उनके नैतिक प्रयोगों का वास्तविक अर्थ हमें दिखाई देता है।
गांधी को समझना शायद उनके सभी उत्तरों को स्वीकार करना नहीं है। गांधी को समझना उन प्रश्नों से टकराना है जिन्हें उन्होंने अपने जीवन और मृत्यु से हमारे सामने रख दिया।
30 जनवरी 1948 को गांधी की देह गिर गई थी।
लेकिन शायद उसी क्षण एक ऐसी शक्ति जन्मी, जिसे गोली नहीं मार सकती थी।
जीवित गांधी रास्ता दिखाते थे।
शहीद गांधी आज भी हमारी अंतरात्मा से पूछते हैं—
“तुम हिंसा और घृणा से भरी दुनिया में किस तरह के मनुष्य बनना चाहते हो?”
और शायद यही गांधी का वास्तविक Afterlife है। #महात्मा गांधी