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#satnam waheguru ji #satnam shri waheguru ji #Meetha Lage Tera bhana
satnam waheguru ji - 343 आपि तेवड तेरी दातिII जिनि दिनु करि मीठा कै कीती राति।। लगे खसमु विसारहि तेरा ते कमजाति ।। नानक नावै भणा ISIHHIfII अर्थः परमात्मा! जितना बड़ा तू स्वयं है, गुरु नानक देव जी कहते हैं कि उतनी ही बड़ी और असीमित तेरी दाति परमात्मा के नाम के बिना मनुष्य यानी तेरी कृपा का बख्शिश या दान है। नीच या कंगाल है।उसके सिमरण के कोई अंत नहीं है, क्योंकि तू स्वयं अनंत बिना इंसान का आत्मिक जीवन है। परमात्मा ऐसा समर्थ है जिसने कर्म खोखला है। हे भाई!असली नीचता करने के लिए दिन बनाया और विश्राम ईश्वर को भूल जाने में है॰ न कि किसी के लिए रात बनाई। यह प्रकृति का चक्र विशेष कुल या जाति में जन्म लेने में। उसकी अद्भुत रचना का प्रमाण है।जो हमें परमात्मा की दी हुई नियामतों लोग उस खसम मालिक परमात्मा को दिन, रात, जीवन के लिए हमेशा विसार देते हैं यानी भूल जाते हैं, वे ही चाहिए। ' उसका शुक्रगुज़ार होना ' ऊचा असल में नीच आचरण वाले या जीवन वही है जो ईश्वर की याद से आध्यात्मिक रूप से गिरे हुए हैं। यहाँ जुड़ा है। जो उसे भूल जाते हैं, वे सब जाति का अर्थ जन्म से नहीं, बल्कि कर्म भी आत्मिक तौर पर ক্ীন  हुए कुछ और ईश्वर से दूरी से है। कंगाल हैं। 343 आपि तेवड तेरी दातिII जिनि दिनु करि मीठा कै कीती राति।। लगे खसमु विसारहि तेरा ते कमजाति ।। नानक नावै भणा ISIHHIfII अर्थः परमात्मा! जितना बड़ा तू स्वयं है, गुरु नानक देव जी कहते हैं कि उतनी ही बड़ी और असीमित तेरी दाति परमात्मा के नाम के बिना मनुष्य यानी तेरी कृपा का बख्शिश या दान है। नीच या कंगाल है।उसके सिमरण के कोई अंत नहीं है, क्योंकि तू स्वयं अनंत बिना इंसान का आत्मिक जीवन है। परमात्मा ऐसा समर्थ है जिसने कर्म खोखला है। हे भाई!असली नीचता करने के लिए दिन बनाया और विश्राम ईश्वर को भूल जाने में है॰ न कि किसी के लिए रात बनाई। यह प्रकृति का चक्र विशेष कुल या जाति में जन्म लेने में। उसकी अद्भुत रचना का प्रमाण है।जो हमें परमात्मा की दी हुई नियामतों लोग उस खसम मालिक परमात्मा को दिन, रात, जीवन के लिए हमेशा विसार देते हैं यानी भूल जाते हैं, वे ही चाहिए। ' उसका शुक्रगुज़ार होना ' ऊचा असल में नीच आचरण वाले या जीवन वही है जो ईश्वर की याद से आध्यात्मिक रूप से गिरे हुए हैं। यहाँ जुड़ा है। जो उसे भूल जाते हैं, वे सब जाति का अर्थ जन्म से नहीं, बल्कि कर्म भी आत्मिक तौर पर ক্ীন  हुए कुछ और ईश्वर से दूरी से है। कंगाल हैं। - ShareChat