M P SINGH
जब सृष्टि बचाने के लिए स्वयं श्री हरि बने महादेव :
एक बार भगवान शिव गहन समाधि में लीन थे और सृष्टि की व्यवस्था का दायित्व ब्रह्मा जी निभा रहे थे। युगों तक सृष्टि का संचालन करते-करते उनके मन में धीरे-धीरे सर्वशक्तिमान होने का अहंकार होने लगा। उन्हें लगने लगा कि यदि कभी कुछ बिगड़ भी जाए तो वे अपनी इच्छा से सब कुछ दोबारा रच सकते हैं। यही विचार धीरे-धीरे अहंकार में बदल गया और वही अहंकार आगे चलकर संकट का कारण बना।
उसी समय एक असुर कठोर तपस्या करके ब्रह्मा जी के सामने उपस्थित होकर कहा कि प्रभु मुझे ऐसा वरदान दीजिए कि मैं समस्त राजाओं में सबसे अधिक शक्तिशाली बन जाऊं। पहले तो ऐसे वरदान देने से पहले ब्रह्मा जी तपस्या, पात्रता और उद्देश्य की परीक्षा लेते थे, लेकिन उस दिन अहंकारवश उन्होंने बिना कुछ सोचे केवल तथास्तु कह दिया।
कुछ समय बाद एक दूसरा असुर आकर पहले से भी बड़ा वरदान मांगा। ब्रह्मा जी ने फिर बिना विचार किए तथास्तु कह दिया। धीरे-धीरे अनेक असुर आने लगे। कोई अजेय होने का वर मांगता, कोई अपार शक्ति चाहता, कोई तीनों लोकों पर अधिकार की इच्छा करता। ब्रह्मा जी सबको बिना किसी परीक्षण के वरदान देते चले गए। उनके मन में यही विचार था कि यदि कभी कोई संकट आया भी तो वे फिर से सब कुछ बना देंगे।अंततः एक अत्यंत महत्वाकांक्षी असुर उनके सामने आया। उसने कहा कि प्रभु मुझे पूरी सृष्टि पर अधिकार चाहिए। यदि सब नष्ट भी हो जाए तो आप तो फिर से सृष्टि बना ही लेंगे। यह सुनकर भी ब्रह्मा जी नहीं रुके। उन्होंने उसे भी वरदान दे दिया। यह जानकर देवताओं के हृदय में भय उत्पन्न हो गया। उन्हें स्पष्ट दिखाई देने लगा कि यदि ऐसे ही चलता रहा तो धर्म, न्याय और सृष्टि का संतुलन सब कुछ नष्ट हो जाएगा।
सभी देवता सबसे पहले भगवान शिव के पास पहुंचे। लेकिन महादेव को गहन समाधि में लीन देखकर देवगण भगवान विष्णु के धाम पहुंचे और हाथ जोड़कर पूरी घटना सुनाई। भगवान विष्णु जानते थे कि ब्रह्मा जी भगवान शिव का अत्यंत सम्मान करते हैं। यदि महादेव स्वयं उन्हें समझाएं तो वे अवश्य रुक जाएंगे। लेकिन शिव जी की समाधि भंग करना उचित नहीं था। इसलिए भगवान विष्णु ने भगवान शिव का दिव्य स्वरूप धारण कर लिया। जटाधारी, त्रिनेत्रधारी, गले में नाग और शरीर पर भस्म धारण किए वे ब्रह्मा जी के समक्ष पहुंचे। उन्होंने गंभीर स्वर में कहा कि ब्रह्मा तुम यह क्या कर रहे हो? बिना पात्रता देखे ऐसे वरदान देना सृष्टि को विनाश की ओर ले जाएगा। लेकिन उस समय ब्रह्मा जी का अहंकार इतना बढ़ चुका था कि उन्होंने उस चेतावनी को भी गंभीरता से नहीं लिया। वे मुस्कुराकर बोले, प्रभु चिंता क्यों करते हैं? यदि कुछ बिगड़ भी गया तो मैं फिर से पूरी सृष्टि की रचना कर दूंगा।
जब बार-बार समझाने पर भी ब्रह्मा जी नहीं माने, तब भगवान विष्णु ने अपना वास्तविक स्वरूप प्रकट कर दिया। चारों ओर दिव्य प्रकाश फैल गया। ब्रह्मा जी चौंक उठे। उन्होंने देखा कि उनके सामने स्वयं श्री हरि विष्णु खड़े हैं। भगवान विष्णु का मुख अत्यंत गंभीर था। उन्होंने कहा कि सृष्टि की रचना करना महान है लेकिन उससे भी बड़ा है धर्म और संतुलन की रक्षा करना। रचना का अधिकार अहंकार का कारण नहीं बन सकता।
इसके बाद भगवान विष्णु ने अपना सुदर्शन चक्र धारण किया। उसका दिव्य तेज पूरे ब्रह्मांड में फैल गया। जैसे ही सुदर्शन चक्र ब्रह्मा जी की ओर बढ़ा, उसके प्रचंड प्रकाश को देखकर ही ब्रह्मा जी का अहंकार चूर होने लगा। वे भयभीत होकर मूर्छित हो गए। उसी अवस्था में उन्हें एक अद्भुत दिव्य दर्शन प्राप्त हुआ। उन्होंने देखा कि यह ब्रह्मांड अकेला नहीं है। अनगिनत ब्रह्मांड हैं। हर ब्रह्मांड में एक ब्रह्मा, एक विष्णु और एक महादेव अपनी-अपनी लीला में लगे हुए हैं। जिस पद पर उन्हें गर्व था, वह वास्तव में ईश्वर की अनंत व्यवस्था का केवल एक छोटा सा भाग था।
जब ब्रह्मा जी की चेतना लौटी तो उनका सारा अहंकार समाप्त हो चुका था। उनकी आंखों से अश्रुधारा बहने लगी। वे तुरंत भगवान विष्णु के चरणों में गिर पड़े और बोले, प्रभु मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गई। अहंकार ने मेरी बुद्धि को ढक लिया था। मुझे क्षमा कर दीजिए।
भगवान विष्णु ने उन्हें उठाया और शांत स्वर में कहा, जिस शक्ति का उपयोग विवेक के बिना किया जाए, वही विनाश का कारण बनती है। इसलिए अब जिन-जिन असुरों को तुमने बिना विचार किए वरदान दिए हैं, उन्हें तुरंत वापस लो और सृष्टि का संतुलन पुनः स्थापित करो। ब्रह्मा जी ने हाथ जोड़कर आज्ञा स्वीकार की और अपने सभी अनुचित वरदान वापस ले लिए। देवताओं ने राहत की सांस ली और तीनों लोकों में फिर से शांति स्थापित हो गई।
🙏 जय श्री हरि विष्णु 🙏 #❤️Love You ज़िंदगी ❤️