ShareChat
click to see wallet page
search
#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-3️⃣5️⃣4️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः कुन्ती का पाण्डु को व्युषिताश्व के मृत शरीर से उसकी पतिव्रता पत्नी भद्रा के द्वारा पुत्र-प्राप्ति का कथन...(दिन 354) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ अनन्तरत्नान्यादाय स जहार महाक्रतून् । सुषाव च बहून् सोमान् सोमसंस्थास्ततान च ।। १६ ।। 'अनन्त रत्नोंकी भेंट लेकर उन्होंने बड़े-बड़े यज्ञ किये। अनेक सोमयागोंका आयोजन करके उनमें बहुत-सा सोमरस संग्रह करके अग्निष्टोम-अत्यग्निष्टोम आदि सात प्रकारकी सोमयाग-संस्थाओंका भी अनुष्ठान किया ।। १६ ।। आसीत् काक्षीवती चास्य भार्या परमसम्मता । भद्रा नाम मनुष्येन्द्र रूपेणासदृशी भुवि ।। १७ ।। 'नरेन्द्र ! राजा कक्षीवान्‌की पुत्री भद्रा उनकी अत्यन्त प्यारी पत्नी थी। उन दिनों इस पृथ्वीपर उसके रूपकी समानता करनेवाली दूसरी कोई स्त्री न थी ।। १७ ।। कामयामासतुस्तौ च परस्परमिति श्रुतम् । स तस्यां कामसम्पन्नो यक्ष्मणा समपद्यत ।। १८ ।। 'मैंने सुना है, वे दोनों पति-पत्नी एक-दूसरेको बहुत चाहते थे। पत्नीके प्रति अत्यन्त कामासक्त होनेके कारण राजा व्युषिताश्व राजयक्ष्माके शिकार हो गये ।। १८ ।। तेनाचिरेण कालेन जगामास्तमिवांशुमान् । तस्मिन् प्रेते मनुष्येन्द्रे भार्यास्य भृशदुःखिता ।। १९ ।। 'इस कारण वे थोड़े ही समयमें सूर्यकी भाँति अस्त हो गये। उन महाराजके परलोकवासी हो जानेपर उनकी पत्नीको बड़ा दुःख हुआ ।। १९ ।। अपुत्रा पुरुषव्याघ्र विललापेति नः श्रुतम्। भद्रा परमदुःखार्ता तन्निबोध जनाधिप ।। २० ।। 'नरव्याघ्र जनेश्वर! हमने सुना है कि भद्राके तबतक कोई पुत्र नहीं हुआ था। इस कारण वह अत्यन्त दुःखसे आतुर होकर विलाप करने लगी; वह विलाप सुनिये' ।। २० ।। भद्रोवाच नारी परमधर्मज्ञ सर्वा भर्तृविनाकृता । पतिं विना जीवति या न सा जीवति दुःखिता ।। २१ ।। भद्रा बोली- परमधर्मज्ञ महाराज ! जो कोई भी विधवा स्त्री पतिके बिना जीवन धारण करती है, वह निरन्तर दुःखमें डूबी रहनेके कारण वास्तवमें जीती नहीं, अपितु मृततुल्या है ।। २१ ।। पतिं विना मृतं श्रेयो नार्याः क्षत्रियपुङ्गव । त्वद्गतिं गन्तुमिच्छामि प्रसीदस्व नयस्व माम् ।। २२ ।। त्वया हीना क्षणमपि नाहं जीवितुमुत्सहे । प्रसादं कुरु मे राजन्नितस्तूर्ण नयस्व माम् ।। २३ ।। क्षत्रियशिरोमणे ! पतिके न रहनेपर नारीकी मृत्यु हो जाय, इसीमें उसका कल्याण है। अतः मैं भी आपके ही मार्गपर चलना चाहती हूँ, प्रसन्न होइये और मुझे अपने साथ ले चलिये। आपके बिना एक क्षण भी जीवित रहनेका मुझमें उत्साह नहीं है। राजन् ! कृपा कीजिये और यहाँसे शीघ्र मुझे ले चलिये ।। २२-२३ ।। पृष्ठतोऽनुगमिष्यामि समेषु विषमेषु च । त्वामहं नरशार्दूल गच्छन्तमनिवर्तितुम् ।। २४ ।। नरश्रेष्ठ ! आप जहाँ कभी न लौटनेके लिये गये हैं, वहाँका मार्ग समतल हो या विषम, मैं आपके पीछे-पीछे अवश्य चली चलूँगी ।। २४ ।। छायेवानुगता राजन् सततं वशवर्तिनी । भविष्यामि नरव्याघ्र नित्यं प्रियहिते रता ।। २५ ।। राजन्! मैं छायाकी भाँति आपके पीछे लगी रहूँगी एवं सदा आपकी आज्ञाके अधीन रहूँगी। नरव्याघ्र! मैं सदा आपके प्रिय और हितमें लगी रहूँगी ।। २५ ।। अद्यप्रभृति मां राजन् कष्टा हृदयशोषणाः। आधयोऽभिभविष्यन्ति त्वामृते पुष्करेक्षण ।। २६ ।। कमलके समान नेत्रोंवाले महाराज! आपके बिना आजसे हृदयको सुखा देनेवाले कष्ट और मानसिक चिन्ताएँ मुझे सताती रहेंगी ।। २६ ।। अभाग्यया मया नूनं वियुक्ताः सहचारिणः। तेन मे विप्रयोगोऽयमुपपन्नस्त्वया सह ।। २७ ।। मुझ अभागिनीने निश्चय ही कितने ही जीवनसंगियों (स्त्री-पुरुषों) में विछोह कराया होगा। इसीलिये आज आपके साथ मेरा वियोग घटित हुआ है ।। २७ ।। विप्रयुक्ता तु या पत्या मुहूर्तमपि जीवति । दुःखं जीवति सा पापा नरकस्थेव पार्थिव ।। २८ ।। महाराज ! जो स्त्री पतिसे बिछुड़ जानेपर दो घड़ी भी जीवन धारण करती है, वह पापिनी नरकमें पड़ी हुई-सी दुःखमय जीवन बिताती है ।। २८ ।। संयुक्ता विप्रयुक्ताश्च पूर्वदेहे कृता मया । तदिदं कर्मभिः पापैः पूर्वदेहेषु संचितम् ।। २९ ।। दुःखं मामनुसम्प्राप्तं राजंस्त्वद्विप्रयोगजम् । अद्यप्रभृत्यहं राजन् कुशसंस्तरशायिनी । भविष्याम्यसुखाविष्टा त्वद्दर्शनपरायणा ।। ३० ।। राजन् ! पूर्वजन्मके शरीरमें स्थित रहकर मैंने एक साथ रहनेवाले कुछ स्त्री-पुरुषोंमें अवश्य वियोग कराया है। उन्हीं पापकर्मोंद्वारा मेरे पूर्वशरीरोंमें जो बीजरूपसे संचित हो रहा था, वही यह आपके वियोगका दुःख आज मुझे प्राप्त हुआ है। महाराज! मैं दुःखमें डूबी हुई हूँ, अतः आजसे आपके दर्शनकी इच्छा रखकर मैं कुशके बिछौनेपर सोऊँगी ।। २९-३० ।। दर्शयस्व नरव्याघ्र शाधि मामसुखान्विताम् । कृपणां चाथ करुणं विलपन्तीं नरेश्वर ।। ३१ ।। नरश्रेष्ठ नरेश्वर ! करुण विलाप करती हुई मुझ दीन-दुःखिया अबलाको आज अपना दर्शन और कर्तव्यका आदेश दीजिये ।। ३१ ।। कुन्त्युवाच एवं बहुविधं तस्यां विलपन्त्यां पुनः पुनः । तं शवं सम्परिष्वज्य वाक् किलान्तर्हिताब्रवीत् ।। ३२ ।। कुन्तीने कहा- महाराज! इस प्रकार जब राजाके शवका आलिंगन करके वह बार-बार अनेक प्रकारसे विलाप करने लगी, तब आकाशवाणी बोली- ।। ३२ ।। उत्तिष्ठ भद्रे गच्छ त्वं ददानीह वरं तव । जनयिष्याम्यपत्यानि त्वय्यहं चारुहासिनि ।। ३३ ।। 'भद्रे! उठो और जाओ, इस समय मैं तुम्हें वर देता हूँ। चारुहासिनि ! में तुम्हारे गर्भसे कई पुत्रोंको जन्म दूँगा ।। ३३ ।। आत्मकीये वरारोहे शयनीये चतुर्दशीम् । अष्टमीं वा ऋतुस्नाता संविशेथा मया सह ।। ३४ ।। 'वरारोहे! तुम ऋतुस्नाता होनेपर चतुर्दशी या अष्टमीकी रातमें अपनी शय्यापर मेरे इस शवके साथ सो जाना' ।। ३४ ।। एवमुक्ता तु सा देवी तथा चक्रे पतिव्रता । यथोक्तमेव तद्वाक्यं भद्रा पुत्रार्थिनी तदा ।। ३५ ।। आकाशवाणीके यों कहनेपर पुत्रकी इच्छा रखनेवाली पतिव्रता भद्रादेवीने पतिकी पूर्वोक्त आज्ञाका अक्षरशः पालन किया ।। ३५ ।। सा तेन सुषुवे देवी शवेन भरतर्षभ । त्रीन् शाल्वांश्चतुरो मद्रान् सुतान् भरतसत्तम ।। ३६ ।। भरतश्रेष्ठ ! रानी भद्राने उस शवके द्वारा सात पुत्र उत्पन्न किये, जिनमें तीन शाल्वदेशके और चार मद्रदेशके शासक हुए ।। ३६ ।। तथा त्वमपि मय्येवं मनसा भरतर्षभ । शक्तो जनयितुं पुत्रांस्तपोयोगबलान्वितः ।। ३७ ।। भरतवंशशिरोमणे ! इसी प्रकार आप भी मेरे गर्भसे मानसिक संकल्पद्वारा अनेक पुत्र उत्पन्न कर सकते हैं; क्योंकि आप तपस्या और योगबलसे सम्पन्न हैं ।। ३७ ।। इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि व्युषिताश्वोपाख्याने विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १२० ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें व्युषिताश्वोपाख्यानविषयक एक सौ बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १२० ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
महाभारत - श्रीमहाभाखतमू श्रीमहाभाखतमू - ShareChat