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#satnam waheguru ji #satnam shri waheguru ji #Meetha Lage Tera bhana
satnam waheguru ji - किसु ` पहि देखि कहउ तू कैसा सभि जाचक तू दातारा ।भगतिहीणु नानकु दरि ಕತತ इकु नामु मिलै उरि धारा।l हे परमेश्वर! मैं इस जगत में किसके पास जाऊँ और किससे पूछूँ कि तेरा स्वरूप मीठा कैसा है? क्योंकि जहाँ तक मेरी दृष्टि जाती है, मुझे तेरे जैसा कोई दूसरा दिखाई ही नहीं देता। इस संसार के समस्त जीव, चाहे वे कितने ही बड़े क्यों न हों, तेरे लगे ही द्वार पर हाथ फैलाए खड़े 'भिखारी हैं। केवल तू ही एक मात्र महा दाता है है।तू  जो बिना मांगे सबको सब कुछ दे रहा ' अतुलनीय है, तेरी उपमा केवल तू ही है। गुरु नानक देव जी अपनी निम्रता की पराकाष्ठा में कहते हैं कि हे प्रभु! dr कोई गुण ' मुझमें न तो है और न ही मैं तेरी भक्ति करना जानता हूँ, मैं तो 'भक्ति ्हीन हूँ। लेकिन फिर भी॰ मैं एक आस लेकर तेरे दर पर आ गिरा हूँ। मुझ पर अपनी मेहर की एक नज़र कर दीजिए। मुझे बस अपना नाम सिमरन का भाणा दान दे दें, ताकि मैं उस अनमोल रत्न को अपने हृदय में बसा सकूँ और वह हर पल मेरी धड़कनों में बसा रहे।ईश्वर की तुलना किसी भौतिक वस्तु या व्यक्ति से नहीं की जा सकती। हम सब लेने वाले हैं, देने वाला केवल वह एक अकाल पुरख है। प्रभु से संसार की नश्वर वस्तुओं के बजाय उसका 'नाम' मांगना ही सबसे बड़ी उपलब्धि है। किसु ` पहि देखि कहउ तू कैसा सभि जाचक तू दातारा ।भगतिहीणु नानकु दरि ಕತತ इकु नामु मिलै उरि धारा।l हे परमेश्वर! मैं इस जगत में किसके पास जाऊँ और किससे पूछूँ कि तेरा स्वरूप मीठा कैसा है? क्योंकि जहाँ तक मेरी दृष्टि जाती है, मुझे तेरे जैसा कोई दूसरा दिखाई ही नहीं देता। इस संसार के समस्त जीव, चाहे वे कितने ही बड़े क्यों न हों, तेरे लगे ही द्वार पर हाथ फैलाए खड़े 'भिखारी हैं। केवल तू ही एक मात्र महा दाता है है।तू  जो बिना मांगे सबको सब कुछ दे रहा ' अतुलनीय है, तेरी उपमा केवल तू ही है। गुरु नानक देव जी अपनी निम्रता की पराकाष्ठा में कहते हैं कि हे प्रभु! dr कोई गुण ' मुझमें न तो है और न ही मैं तेरी भक्ति करना जानता हूँ, मैं तो 'भक्ति ्हीन हूँ। लेकिन फिर भी॰ मैं एक आस लेकर तेरे दर पर आ गिरा हूँ। मुझ पर अपनी मेहर की एक नज़र कर दीजिए। मुझे बस अपना नाम सिमरन का भाणा दान दे दें, ताकि मैं उस अनमोल रत्न को अपने हृदय में बसा सकूँ और वह हर पल मेरी धड़कनों में बसा रहे।ईश्वर की तुलना किसी भौतिक वस्तु या व्यक्ति से नहीं की जा सकती। हम सब लेने वाले हैं, देने वाला केवल वह एक अकाल पुरख है। प्रभु से संसार की नश्वर वस्तुओं के बजाय उसका 'नाम' मांगना ही सबसे बड़ी उपलब्धि है। - ShareChat