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#satnam waheguru ji #satnam shri waheguru ji #Meetha Lage Tera bhana
satnam waheguru ji - जिउ मध्रु माखी सचै अपासामधु लीनो म्ुखि दीनी छारुपागऊ बाछकउरसंचै खीरु Il गला रबांधि द्रुहि लेइ अहीरु[ फैलेंयकहो ता  अर्थः जिस प्रकार एक मधुमक्खी बड़ी मेहनत से का रस ম নযা चुनकर अपार शहद इकट्ठा करती है, लेकिन अंत 82 कोई व्यक्ति आकर उसका सारा शहद निकाल लेता है और मक्खी भिखारी के हिस्से में सिर्फ राख या खाली छत्ता ही आती है। ठीक वैसे g3IT ही इंसान उम्र भर संपत्ति जोड़ता है, जिसे अंत में कोई और ही जिओ लिए ' भोगता है। जैसे गाय अपने बछड़े के ममता वश अपने स्तनों में दूध इकट्ठा करती है, लेकिन ग्वाला गाय का गला बाँधकर या उसे पहाडा रोककर उसका सारा दूध दुह लेता है। यहाँ बछड़ा भूखा रह जाता है और दूध कोई और ले जाता है। माध्यम से मनुष्य को सचेत कर रहे हैं  वाले सोहेब जी इन उदाहरणों के ೯೯ ೯7೯ जिस माया और धन को अपना समझकर और दूसरों का हक मारकर इकट्ठा कर रहे हैं, वह अंत में हमारे काम नहीं आएगा। जैसे बाबा दूसरे ले जाते हैं, वैसे ही मृत्यु के मधुमक्खी का शहद और गाय का दूध ' बाद यह संचित धन यहीं धरा रह जाएगा| इसलिए संग्रह के बजाय परमात्मा के नाम और सत्कर्मों की पूंजी जमा करनी चाहिए, जो वास्तव में साथ जाती है। जिउ मध्रु माखी सचै अपासामधु लीनो म्ुखि दीनी छारुपागऊ बाछकउरसंचै खीरु Il गला रबांधि द्रुहि लेइ अहीरु[ फैलेंयकहो ता  अर्थः जिस प्रकार एक मधुमक्खी बड़ी मेहनत से का रस ম নযা चुनकर अपार शहद इकट्ठा करती है, लेकिन अंत 82 कोई व्यक्ति आकर उसका सारा शहद निकाल लेता है और मक्खी भिखारी के हिस्से में सिर्फ राख या खाली छत्ता ही आती है। ठीक वैसे g3IT ही इंसान उम्र भर संपत्ति जोड़ता है, जिसे अंत में कोई और ही जिओ लिए ' भोगता है। जैसे गाय अपने बछड़े के ममता वश अपने स्तनों में दूध इकट्ठा करती है, लेकिन ग्वाला गाय का गला बाँधकर या उसे पहाडा रोककर उसका सारा दूध दुह लेता है। यहाँ बछड़ा भूखा रह जाता है और दूध कोई और ले जाता है। माध्यम से मनुष्य को सचेत कर रहे हैं  वाले सोहेब जी इन उदाहरणों के ೯೯ ೯7೯ जिस माया और धन को अपना समझकर और दूसरों का हक मारकर इकट्ठा कर रहे हैं, वह अंत में हमारे काम नहीं आएगा। जैसे बाबा दूसरे ले जाते हैं, वैसे ही मृत्यु के मधुमक्खी का शहद और गाय का दूध ' बाद यह संचित धन यहीं धरा रह जाएगा| इसलिए संग्रह के बजाय परमात्मा के नाम और सत्कर्मों की पूंजी जमा करनी चाहिए, जो वास्तव में साथ जाती है। - ShareChat
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satnam waheguru ji - गावै को ताणु होवै किसै ताणु गावै को दाति जाणै नीसाणुप 6 Mta' अर्थः परमात्मा की महिमा अनंत है और उसे शब्दों में पूरी तरह समेटना मीठा असंभव है। गुरु नानक देव जी समझाते हैं कि हर मनुष्य अपनी बुद्धि, सामर्थ्य और अनुभव के अनुसार उस अकाल पुरख का गुणगान करता है। परमात्मा की महिमा को वही गा सकता है जिसे वह स्वयं बल प्रदान करे। जिसकी लगे जितनी आध्यात्मिक क्षमता या सामर्थ्य होती है, वह उस प्रभु के प्रताप और उसकी असीम शक्ति का उतना ही बखान करता है। बहुत से लोग ईश्वर द्वारा दिए गए सुखों , संसाधनों और आशीर्वादों के माध्यम से उसे याद करते हैं। वे तेरा प्रभु की दी हुई दातों उउपहारों ) को ही उसकी दया का साक्षात प्रमाण (निशान) मानते हैं और उन्हीं के लिए उसका शुक्राना करते हैंl वास्तव में, ईश्वर इतना विशाल है कि उसे पूरी तरह बयान करना किसी के वश में नहीं। कोई उसे भाणा उसकी शक्ति के लिए भजता है, तो कोई जीवन में मिली खुशियों और भोजन के लिए। जिसे जैसा अनुभव प्राप्त होता है, वह अपनी समझ के अनुसार उस परमात्मा की महिमा में लीन हो जाता है। गावै को ताणु होवै किसै ताणु गावै को दाति जाणै नीसाणुप 6 Mta' अर्थः परमात्मा की महिमा अनंत है और उसे शब्दों में पूरी तरह समेटना मीठा असंभव है। गुरु नानक देव जी समझाते हैं कि हर मनुष्य अपनी बुद्धि, सामर्थ्य और अनुभव के अनुसार उस अकाल पुरख का गुणगान करता है। परमात्मा की महिमा को वही गा सकता है जिसे वह स्वयं बल प्रदान करे। जिसकी लगे जितनी आध्यात्मिक क्षमता या सामर्थ्य होती है, वह उस प्रभु के प्रताप और उसकी असीम शक्ति का उतना ही बखान करता है। बहुत से लोग ईश्वर द्वारा दिए गए सुखों , संसाधनों और आशीर्वादों के माध्यम से उसे याद करते हैं। वे तेरा प्रभु की दी हुई दातों उउपहारों ) को ही उसकी दया का साक्षात प्रमाण (निशान) मानते हैं और उन्हीं के लिए उसका शुक्राना करते हैंl वास्तव में, ईश्वर इतना विशाल है कि उसे पूरी तरह बयान करना किसी के वश में नहीं। कोई उसे भाणा उसकी शक्ति के लिए भजता है, तो कोई जीवन में मिली खुशियों और भोजन के लिए। जिसे जैसा अनुभव प्राप्त होता है, वह अपनी समझ के अनुसार उस परमात्मा की महिमा में लीन हो जाता है। - ShareChat
#satnam waheguru ji #satnam shri waheguru ji #Meetha Lage Tera bhana #Eek Tu Hi Guru Ji
satnam waheguru ji - मेरी खामोशी लेगी बदला मेरा मेरे बुजुर्गों की दुआओं का असर है मुझ पर, कि मैं इंसान को उसकी औकात से नहीं , उसकी इंसानियत से पहचानता हूँ॰ आज मैं जो कुछ भी हूँ॰ अपने बुजुर्गों की दी हुई गै़रत की वेजह से हूँ ] उन्होंने मुझे उड़ना तो सिखाया, लेकिन जमीन पर पैर के हुनर  टिकाए रखने ' के साथ। इसीलिए, मेरा सिर अगर किसी के सामने झुकता है, तो वो केवल उसकी शराफत और उम्र के लिए है, और अगर मैं किसी बात पर अड़ता हूँ, तो वो सिर्फ अपने जमीर और स्वाभिमान के लिए है..!! मेरे बजुर्गों ने मेरा हाथ पकड़कर मुझे सिखाया कि दौलत सिर्फ जरूरतों को पूरा करती है, व्यक्तित्व को नहीं , इज्जत कमाने के लिए दिल बड़ा होना चाहिए, बैंक बैलेंस नहीं , झुकना वहां चाहिए जहाँ प्रेम और संस्कार हों, वहां नहीं जहाँ सिर्फ स्वार्थ हो..!! मुझे विरासत में महलों की चाबियाँ तो नहीं मिलीं, पर मेरे अपनों ने मुझे वो किरदार दिया है जिसे कोई खरीद नहीं सकता। मेरी आँखों में न अमीरी की चकाचौंध का डर है॰ न गरीबी के प्रति कोई छोटा भावः क्योंकि मुझे सिखाया गया है कि इंसान की असली पहचान उसकी नीयत से होती है, हैसियत से नहीं.. !! मेरी खामोशी लेगी बदला मेरा मेरे बुजुर्गों की दुआओं का असर है मुझ पर, कि मैं इंसान को उसकी औकात से नहीं , उसकी इंसानियत से पहचानता हूँ॰ आज मैं जो कुछ भी हूँ॰ अपने बुजुर्गों की दी हुई गै़रत की वेजह से हूँ ] उन्होंने मुझे उड़ना तो सिखाया, लेकिन जमीन पर पैर के हुनर  टिकाए रखने ' के साथ। इसीलिए, मेरा सिर अगर किसी के सामने झुकता है, तो वो केवल उसकी शराफत और उम्र के लिए है, और अगर मैं किसी बात पर अड़ता हूँ, तो वो सिर्फ अपने जमीर और स्वाभिमान के लिए है..!! मेरे बजुर्गों ने मेरा हाथ पकड़कर मुझे सिखाया कि दौलत सिर्फ जरूरतों को पूरा करती है, व्यक्तित्व को नहीं , इज्जत कमाने के लिए दिल बड़ा होना चाहिए, बैंक बैलेंस नहीं , झुकना वहां चाहिए जहाँ प्रेम और संस्कार हों, वहां नहीं जहाँ सिर्फ स्वार्थ हो..!! मुझे विरासत में महलों की चाबियाँ तो नहीं मिलीं, पर मेरे अपनों ने मुझे वो किरदार दिया है जिसे कोई खरीद नहीं सकता। मेरी आँखों में न अमीरी की चकाचौंध का डर है॰ न गरीबी के प्रति कोई छोटा भावः क्योंकि मुझे सिखाया गया है कि इंसान की असली पहचान उसकी नीयत से होती है, हैसियत से नहीं.. !! - ShareChat
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satnam waheguru ji - मेरी खामोशी लेगी বরমলা মীয় वो जो मेरी मय्यतः पर रोने आए हैं काश! वो मेरी जिंदगी नें दुत्वह शीक ः कर मिले होते।कफन पर फूल तो से,काश! दो कांटे उन्होने मेरी Hq 46[ जिंदगी की राहों से चुने होते.. | अपनों का यह दोहरा चेहरा सबसे ज्यादा दुख देता है। जो हाथ रोटी देने के लिए नहीं उठे, वही हाथ कंधा देने के लिए होड़ लगा रहे हैं..!! जैसे समंदर का पानी सामने होकर भी प्यास नैहीं बुझाता , वैसे ही अपनों के दिखावे का अपनापन मुसीबत में कभी भी काम नहीं आता करीब तो सभीहोते हैं, पर सहारा देने के लिए नहीं किसी का हाथ उठता , सिर्फ तमाशा देखने के लिए हर कोई भाग खड़ा होता है...!! रिश्ते एक माला की तरह है और रिश्तेदारी वह सूत्र , जिसने इन मोतियों को प्रेम नाम की डोरी से पिरो कर रखा है, जिस दिन रिश्तों में प्रेम नाम का अंत होगा उस दिन रिश्तों का अस्तित्व ही खत्म हो जाएगा..!! भीड़ तो बहुत है मेरे जनाजे के पीछे, पर कमी बस उसी एक इंसान की है जो सच में मेरा था..!! जरूरत पड़ने पर जो पराया साथ दे दे, वही अपना है; वरना खून के रिश्ते तो अक्सर वसीयतों और श्मशानों में ही नजर आते हैं..!! मेरी खामोशी लेगी বরমলা মীয় वो जो मेरी मय्यतः पर रोने आए हैं काश! वो मेरी जिंदगी नें दुत्वह शीक ः कर मिले होते।कफन पर फूल तो से,काश! दो कांटे उन्होने मेरी Hq 46[ जिंदगी की राहों से चुने होते.. | अपनों का यह दोहरा चेहरा सबसे ज्यादा दुख देता है। जो हाथ रोटी देने के लिए नहीं उठे, वही हाथ कंधा देने के लिए होड़ लगा रहे हैं..!! जैसे समंदर का पानी सामने होकर भी प्यास नैहीं बुझाता , वैसे ही अपनों के दिखावे का अपनापन मुसीबत में कभी भी काम नहीं आता करीब तो सभीहोते हैं, पर सहारा देने के लिए नहीं किसी का हाथ उठता , सिर्फ तमाशा देखने के लिए हर कोई भाग खड़ा होता है...!! रिश्ते एक माला की तरह है और रिश्तेदारी वह सूत्र , जिसने इन मोतियों को प्रेम नाम की डोरी से पिरो कर रखा है, जिस दिन रिश्तों में प्रेम नाम का अंत होगा उस दिन रिश्तों का अस्तित्व ही खत्म हो जाएगा..!! भीड़ तो बहुत है मेरे जनाजे के पीछे, पर कमी बस उसी एक इंसान की है जो सच में मेरा था..!! जरूरत पड़ने पर जो पराया साथ दे दे, वही अपना है; वरना खून के रिश्ते तो अक्सर वसीयतों और श्मशानों में ही नजर आते हैं..!! - ShareChat
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satnam waheguru ji - नारी तेजो पुरखु करावै पुरखन ते जो নিষতু नारीII कहु कबीर साधू को प्रीतमु ` बलिहारी Il मूरति कबीर दास जी के इस शब्द का गहरा अर्थ यह है किआत्मा न तो स्त्री मै तेरा और न ही पुरुष। वह परमात्मा ही है जो प्रकृति के स्त्री और पुरुष तत्वों के बीच संतुलन बनाता है और उन्हें अपनी इच्छानुसार रूप देता है। यह समस्त भिखारी संसार उसी करतार सृजनहार का एक अद्भुत खेल है। वह परमात्मा ही साधु यानी सत्य के खोजी का सच्चा प्रियतम है। मैं उस परमात्मा की ' मूरति जिओ उसकी सत्ता और स्वरूप पर बलिहारी जाता हूँ॰जो इस पूरे संसार को अपने विधान और नियमों से चला रहा है। ईश्वर की शक्ति किसी एक रूप या लिंग पहाडा और तक सीमित नहीं है; वह समस्त द्वंद्वों  जैसे स्त्री पुरुष, लाभ ्हानि ' से सर्वथा परे है। वह सर्वशक्तिमान है और असंभव को भी संभव Sq वाले करने की सामर्थ्य रखता है। कबीर जी आगे बताते हैं कि संसार की व्यर्थ उलझनों के बाबा बजाय, उस मूल सत्ता के प्रति प्रेम और समर्पण ही जीवन का असली सार है। मनुष्य अपनी बाहरी पहचान और शारीरिक জী भेदों में चाहे जितना भी उलझा रहे, अंततः वह उसी एक परम तत्व का अंश है। नारी तेजो पुरखु करावै पुरखन ते जो নিষতু नारीII कहु कबीर साधू को प्रीतमु ` बलिहारी Il मूरति कबीर दास जी के इस शब्द का गहरा अर्थ यह है किआत्मा न तो स्त्री मै तेरा और न ही पुरुष। वह परमात्मा ही है जो प्रकृति के स्त्री और पुरुष तत्वों के बीच संतुलन बनाता है और उन्हें अपनी इच्छानुसार रूप देता है। यह समस्त भिखारी संसार उसी करतार सृजनहार का एक अद्भुत खेल है। वह परमात्मा ही साधु यानी सत्य के खोजी का सच्चा प्रियतम है। मैं उस परमात्मा की ' मूरति जिओ उसकी सत्ता और स्वरूप पर बलिहारी जाता हूँ॰जो इस पूरे संसार को अपने विधान और नियमों से चला रहा है। ईश्वर की शक्ति किसी एक रूप या लिंग पहाडा और तक सीमित नहीं है; वह समस्त द्वंद्वों  जैसे स्त्री पुरुष, लाभ ्हानि ' से सर्वथा परे है। वह सर्वशक्तिमान है और असंभव को भी संभव Sq वाले करने की सामर्थ्य रखता है। कबीर जी आगे बताते हैं कि संसार की व्यर्थ उलझनों के बाबा बजाय, उस मूल सत्ता के प्रति प्रेम और समर्पण ही जीवन का असली सार है। मनुष्य अपनी बाहरी पहचान और शारीरिक জী भेदों में चाहे जितना भी उलझा रहे, अंततः वह उसी एक परम तत्व का अंश है। - ShareChat
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satnam waheguru ji - अंदरि सभु को बाहरि हुकम न कोइ।। हुकमै जे बुझै त हउमै कहै न कोइ।। हुकमै नानक के हुक्म अर्थः सृष्टि की हर वस्तु, जीव और घटना उस अकाल पुरख मीठा के दायरे में है। इस ब्रह्मांड ; में कुछ ' भी ऐसा नहीं है जो उँसके विधान या उसकी रज़ा से बाहर हो सके। गुरु जी समझाते हैं कि जीवन में जो भी सुख दुख, ऊँच नीच या जन्म मरण होता है, वह एक अटूट लगे प्राकृतिक और आध्यात्मिक नियम के तहत है। जब हम इस नियम को स्वीकार कर लेते हैं, तो शिकायतें खत्म हो जाती हैं। अहंकार तब पैदा होता है जब हमें लगता है कि हम " कर्ता  हैंl लेकिन जब यह समझ d आ जाता है कि सब कुछ एक बड़ी शक्ति के विधान से हो रहा है, तो मनुष्य विनम्र हो जाता है। अहंकार का मिटना ही आध्यात्मिक मार्ग की सबसे बड़ी जीत है।जो व्यक्ति हुक्म को पहचान लेता है, वह भाणा স নঙ্ভূন चढ़दी कला में रहता है। वह न तो सफलता ' उत्साहित होता है और न ही विफलता में टूटता है, क्योंकि वह जानता है कि"जो होना वह अपने समय पर होगा।" है हे नानक! यदि कोई मनुष्य उस ईश्वरीय हुक्म को समझ ले तो उसके भीतर से मैं यानी अहंकार समाप्त हो जाता है। वह फिर यह नहीं कहता कि मैं कर रहा हूँ या यह मेरी उपलब्धि है। अंदरि सभु को बाहरि हुकम न कोइ।। हुकमै जे बुझै त हउमै कहै न कोइ।। हुकमै नानक के हुक्म अर्थः सृष्टि की हर वस्तु, जीव और घटना उस अकाल पुरख मीठा के दायरे में है। इस ब्रह्मांड ; में कुछ ' भी ऐसा नहीं है जो उँसके विधान या उसकी रज़ा से बाहर हो सके। गुरु जी समझाते हैं कि जीवन में जो भी सुख दुख, ऊँच नीच या जन्म मरण होता है, वह एक अटूट लगे प्राकृतिक और आध्यात्मिक नियम के तहत है। जब हम इस नियम को स्वीकार कर लेते हैं, तो शिकायतें खत्म हो जाती हैं। अहंकार तब पैदा होता है जब हमें लगता है कि हम " कर्ता  हैंl लेकिन जब यह समझ d आ जाता है कि सब कुछ एक बड़ी शक्ति के विधान से हो रहा है, तो मनुष्य विनम्र हो जाता है। अहंकार का मिटना ही आध्यात्मिक मार्ग की सबसे बड़ी जीत है।जो व्यक्ति हुक्म को पहचान लेता है, वह भाणा স নঙ্ভূন चढ़दी कला में रहता है। वह न तो सफलता ' उत्साहित होता है और न ही विफलता में टूटता है, क्योंकि वह जानता है कि"जो होना वह अपने समय पर होगा।" है हे नानक! यदि कोई मनुष्य उस ईश्वरीय हुक्म को समझ ले तो उसके भीतर से मैं यानी अहंकार समाप्त हो जाता है। वह फिर यह नहीं कहता कि मैं कर रहा हूँ या यह मेरी उपलब्धि है। - ShareChat
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satnam waheguru ji - काएं रे भन बिखिआ बन जाइ।। रे ठगमूरी खाइ। भूलौ अर्थः हे भाई! जैसे किसीघने जंगल में रास्ता भटकने पर हिंसक जानवर मीठा इंसान को नुकसान पहुँचा सकते हैं॰ वैसे ही काम, क्रोध, लोभ और अहंकार का यह विष रूपी वन' आत्मा की शांति को नष्ट कर देता है। अपनी वाणी में कबीर जी संसार के आकर्षण को ठगमूरी कहते हैं। जिस प्रकार ठग किसी लगे को नशीली वस्तु खिलाकर उसका कीमती सामान लूट लेते हैं, वैसे ही यह दुनियावी चकाचौंध इंसान के नाम रूपी अनमोल धन को लूट लेती है।मनुष्य तेरा का मन स्वभाव से चंचल है और उसको अक्सर वही चीजें लुभाती हैं जो असल में हानिकारक हैं। कबीर जी प्रश्न करते हैं कि जब तू जानता है कि यह $q' ही देगा , तो फिर तू बार ्बार वहीं क्यों जा रहा है?| रास्ता अंत भाणा अपनी बुद्धि और समय को केवल उन नाशवान चीज़ों में न लगाएँ मेरे भाई। जो अंत में पछतावा देंगी , बल्कि उस 'सत्य' की खोज करें जो आपको इस मानसिक भटकाव और मोह की नींद से बाहर निकाल सके। काएं रे भन बिखिआ बन जाइ।। रे ठगमूरी खाइ। भूलौ अर्थः हे भाई! जैसे किसीघने जंगल में रास्ता भटकने पर हिंसक जानवर मीठा इंसान को नुकसान पहुँचा सकते हैं॰ वैसे ही काम, क्रोध, लोभ और अहंकार का यह विष रूपी वन' आत्मा की शांति को नष्ट कर देता है। अपनी वाणी में कबीर जी संसार के आकर्षण को ठगमूरी कहते हैं। जिस प्रकार ठग किसी लगे को नशीली वस्तु खिलाकर उसका कीमती सामान लूट लेते हैं, वैसे ही यह दुनियावी चकाचौंध इंसान के नाम रूपी अनमोल धन को लूट लेती है।मनुष्य तेरा का मन स्वभाव से चंचल है और उसको अक्सर वही चीजें लुभाती हैं जो असल में हानिकारक हैं। कबीर जी प्रश्न करते हैं कि जब तू जानता है कि यह $q' ही देगा , तो फिर तू बार ्बार वहीं क्यों जा रहा है?| रास्ता अंत भाणा अपनी बुद्धि और समय को केवल उन नाशवान चीज़ों में न लगाएँ मेरे भाई। जो अंत में पछतावा देंगी , बल्कि उस 'सत्य' की खोज करें जो आपको इस मानसिक भटकाव और मोह की नींद से बाहर निकाल सके। - ShareChat