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#satnam waheguru ji #satnam shri waheguru ji #Meetha Lage Tera bhana
satnam waheguru ji - तोरी अरीन मरीरि मवासन माते मर्तगन मान बिनु मलेंगे।स्री पति स्री भगवान कृपा तिआगि जहान निदान चलेंगे 0   अर्थः एक राजा जिसके पास इतनी शक्ति है किचवह अपने शत्रुओं  HloT को आसानी से परास्त कर देता है, जो अभेद्य किलों को पल भर में जीत लेता है और जिसके सामने सबसे शक्तिशाली मदमस्त भी अपना सिर झुका देते हैंl यानी वह शारीरिक और सैन्य ೯೫ लगे रूप से अजेय हैl वह कितना भी शक्तिशाली राजा क्यों न हो, जिसके सामने दुनिया झुकती हो, यदि उस पर प्रभु (श्री भगवान ) గా की कृपा नहीं है, तो अंत में उसे सब कुछ यहीं छोड़कर खाली हाथ जाना ही होगा। मृत्यु के क्षण में उसकी सेना , उसके ' और उसके जीते हुए ೯೫ किले उसे नहीं बचा पाएंगे। हे भाई! किसी भी मनुष्य को अपनी भाणा शक्ति, संपत्ति या उपलब्धियों पर कभी भी अहंकार नहीं करना चाहिए। मौत के सामने एक शक्तिशाली सम्राट और एक साधारण व्यक्ति दोनों बराबर हैं। केवल ईश्वर का नाम और उसकी कृपा ही जीव के साथ जाती है।इस संसार में सभी मुसाफिर हैं और किसी को अपनी शक्ति का उपयोग अहंकार के लिए नहीं, बल्कि उस अकाल पुरख की रज़ा में रहकर करना चाहिए। तोरी अरीन मरीरि मवासन माते मर्तगन मान बिनु मलेंगे।स्री पति स्री भगवान कृपा तिआगि जहान निदान चलेंगे 0   अर्थः एक राजा जिसके पास इतनी शक्ति है किचवह अपने शत्रुओं  HloT को आसानी से परास्त कर देता है, जो अभेद्य किलों को पल भर में जीत लेता है और जिसके सामने सबसे शक्तिशाली मदमस्त भी अपना सिर झुका देते हैंl यानी वह शारीरिक और सैन्य ೯೫ लगे रूप से अजेय हैl वह कितना भी शक्तिशाली राजा क्यों न हो, जिसके सामने दुनिया झुकती हो, यदि उस पर प्रभु (श्री भगवान ) గా की कृपा नहीं है, तो अंत में उसे सब कुछ यहीं छोड़कर खाली हाथ जाना ही होगा। मृत्यु के क्षण में उसकी सेना , उसके ' और उसके जीते हुए ೯೫ किले उसे नहीं बचा पाएंगे। हे भाई! किसी भी मनुष्य को अपनी भाणा शक्ति, संपत्ति या उपलब्धियों पर कभी भी अहंकार नहीं करना चाहिए। मौत के सामने एक शक्तिशाली सम्राट और एक साधारण व्यक्ति दोनों बराबर हैं। केवल ईश्वर का नाम और उसकी कृपा ही जीव के साथ जाती है।इस संसार में सभी मुसाफिर हैं और किसी को अपनी शक्ति का उपयोग अहंकार के लिए नहीं, बल्कि उस अकाल पुरख की रज़ा में रहकर करना चाहिए। - ShareChat
#satnam waheguru ji #satnam shri waheguru ji #Meetha Lage Tera bhana
satnam waheguru ji - गुरिद्ुखु काटिआ दीनो दानु।।सफल जनमु जीवन परवानु ।। अकथ कथा अमृत प्रभ बानी।।कहु नानक जपि जीवे गिआनीIl अर्थःहे भाई! समर्थ गुरु ने मेरे जीवन के सारे दुरखों को काट दिया है और मै तेरा मुझे नाम' का दान बख्शा है। गुरु की कृपा से मने के क्लेश समाप्त हो भिखारी गए हैंl जिस किसी को नाम की यह दात मिल जाती है उसका जन्म सफल हो जाता है और उसका जीवन ईश्वर की दरगाह में स्वीकार जिओ (परवान ) हो जाता है।प्रभु की वाणी अमृत के समान है और उसकी महिमा ' अकथ है यानी जिसका शब्दों में पूरी तरह वर्णन नहीं किया जा पहाडा सकता।  गुरु नानक देवजी कहते हैं किजो 'गिआनी' आत्मिक ज्ञान रख़ने वाले होते हैं वे उस प्रभु के नाम को जप कर ही आत्मिक जीवन वाले प्राप्त करते हैं। उनके जीवन का आधार ही प्रभु का सिमरन है। वास्तविक सफलता धन या पद पाने में नहीं, बल्कि जीवन को प्रभु की बाबा नजर में परवान ( स्वीकार्य) कर्ने में है। संसार के मानसिक और जी शारीरिक दुखों को केवल गुरु ही काट सकते हैं, और इसका साधन ' नाम दान' है। जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है, वैसे ही एक ज्ञानी और के लिए प्रभु का नाम और उसकी अमृतमयी वाणी जीवन खोजी मनुष्य' का आधार है। नाम जप कर ही मनुष्य आत्मिक रूप से जीवित रहता है। गुरिद्ुखु काटिआ दीनो दानु।।सफल जनमु जीवन परवानु ।। अकथ कथा अमृत प्रभ बानी।।कहु नानक जपि जीवे गिआनीIl अर्थःहे भाई! समर्थ गुरु ने मेरे जीवन के सारे दुरखों को काट दिया है और मै तेरा मुझे नाम' का दान बख्शा है। गुरु की कृपा से मने के क्लेश समाप्त हो भिखारी गए हैंl जिस किसी को नाम की यह दात मिल जाती है उसका जन्म सफल हो जाता है और उसका जीवन ईश्वर की दरगाह में स्वीकार जिओ (परवान ) हो जाता है।प्रभु की वाणी अमृत के समान है और उसकी महिमा ' अकथ है यानी जिसका शब्दों में पूरी तरह वर्णन नहीं किया जा पहाडा सकता।  गुरु नानक देवजी कहते हैं किजो 'गिआनी' आत्मिक ज्ञान रख़ने वाले होते हैं वे उस प्रभु के नाम को जप कर ही आत्मिक जीवन वाले प्राप्त करते हैं। उनके जीवन का आधार ही प्रभु का सिमरन है। वास्तविक सफलता धन या पद पाने में नहीं, बल्कि जीवन को प्रभु की बाबा नजर में परवान ( स्वीकार्य) कर्ने में है। संसार के मानसिक और जी शारीरिक दुखों को केवल गुरु ही काट सकते हैं, और इसका साधन ' नाम दान' है। जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है, वैसे ही एक ज्ञानी और के लिए प्रभु का नाम और उसकी अमृतमयी वाणी जीवन खोजी मनुष्य' का आधार है। नाम जप कर ही मनुष्य आत्मिक रूप से जीवित रहता है। - ShareChat
#satnam waheguru ji #satnam shri waheguru ji #Meetha Lage Tera bhana #Eek Tu Hi Guru Ji
satnam waheguru ji - मेरी veations | खामोशी लगी बदला मेरा रिश्तों में खटास अक्सर तब किसी आती है जंब 84 व्यक्ति के ख़ारे स्वभाव को ersmck जानते हुए भी उससे मीठेपन की उम्मीद करते हैं.. ! !समुद्र का पानी उबालने परःभी॰मीठा नहीं होता क्योंकि खारापन उसके अस्तित्व की हिस्सा है...! ! कभी भी खारे पानी को शुद्ध करने की कोशिश मे अपनी ऊर्जा की बर्बादी नही करनी चाहिए.. !!वैसे ही स्वभाव से मतलबी लोगों को बदलने की कोशिश करना व्यर्थ है...!!ऐसे मतलबी रिश्तेदारों से सावधान रहना चाहिए और उनके साथ संबंधों को भी सीमित रखना चाहिए..! ! मेरी veations | खामोशी लगी बदला मेरा रिश्तों में खटास अक्सर तब किसी आती है जंब 84 व्यक्ति के ख़ारे स्वभाव को ersmck जानते हुए भी उससे मीठेपन की उम्मीद करते हैं.. ! !समुद्र का पानी उबालने परःभी॰मीठा नहीं होता क्योंकि खारापन उसके अस्तित्व की हिस्सा है...! ! कभी भी खारे पानी को शुद्ध करने की कोशिश मे अपनी ऊर्जा की बर्बादी नही करनी चाहिए.. !!वैसे ही स्वभाव से मतलबी लोगों को बदलने की कोशिश करना व्यर्थ है...!!ऐसे मतलबी रिश्तेदारों से सावधान रहना चाहिए और उनके साथ संबंधों को भी सीमित रखना चाहिए..! ! - ShareChat
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satnam waheguru ji - सगलू तत महिूि ततु गिआनुII सरूब धिआन महि एकु धिऑनु। हरि कीरतन महि ऊतॅम धुना।l नानक गुर मिलि गाइ गुनाIl अर्थः हे भाई! संसार के सभी तत्वों या पदार्थों में सबसे श्रेष्ठ तत्व आत्म ्ज्ञान है। मीठा तमाम तरह के विचारों और ध्यानों में सबसे उत्तम ध्यान उस एक परमात्मा का ध्यान है। 77 तमाम आवाजों और प्रशंसाओं के बीच परमात्मा का गुणगान (कीर्तन) ही सबसे श्रेष्ठ तेरा और मीठी ध्वनि है।गुरु नानक देव जी कहते शिक्षाओं को हैं कि गुरु से मिलकर उनकी ' भाणा अपनाकर ही परमात्मा के' को गाया जा गुणों ' सकता है। जब भी मनुष्य सांसारिक रिश्तों अपेक्षाओं को छोड़कर इस एक परमात्मा की से जुड़ जाते हैं, तो उसका जीवन सुखद हो जाता है। सगलू तत महिूि ततु गिआनुII सरूब धिआन महि एकु धिऑनु। हरि कीरतन महि ऊतॅम धुना।l नानक गुर मिलि गाइ गुनाIl अर्थः हे भाई! संसार के सभी तत्वों या पदार्थों में सबसे श्रेष्ठ तत्व आत्म ्ज्ञान है। मीठा तमाम तरह के विचारों और ध्यानों में सबसे उत्तम ध्यान उस एक परमात्मा का ध्यान है। 77 तमाम आवाजों और प्रशंसाओं के बीच परमात्मा का गुणगान (कीर्तन) ही सबसे श्रेष्ठ तेरा और मीठी ध्वनि है।गुरु नानक देव जी कहते शिक्षाओं को हैं कि गुरु से मिलकर उनकी ' भाणा अपनाकर ही परमात्मा के' को गाया जा गुणों ' सकता है। जब भी मनुष्य सांसारिक रिश्तों अपेक्षाओं को छोड़कर इस एक परमात्मा की से जुड़ जाते हैं, तो उसका जीवन सुखद हो जाता है। - ShareChat
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satnam waheguru ji - हम मूरख मुगध सरणागती मिलु  गोविंद रंगा राम राजे।l गुरि पूरै हरि पाइआ हरि भगति इक मंगा Il प्रभु! मैं स्वभाव से अज्ञानी और मूर्ख हूँ। मैं आपकी शरण मै तेरा में आया हूँ। कृपा करके मुझे अपने प्रेम के रंग में रंग भिखारी अर्थ बुद्धि लीजिए। यहां " मूरख" शब्दका की कमी नहीं, बल्कि अहंकार का त्याग है।्जब मनुष्य दुनिया की जिओ चालाकियों और स्वार्थ भरे रिश्तों से थक जाता है॰ तब वह यह स्वीकार करता है कि उसकी अपनी चतुराई काम नहीं   पहाडा आई। पूर्ण गुरु की शिक्षाओं पर चलकर ही परमात्मा की বাল प्राप्ति होती है। उस प्रभु से केवल एक ही दान मांगो उनकी बाबा सच्ची भक्ति। जिसे दुनिया मूरख समझकर दूरी बना लेती है। वह ईश्वर की नजर में सबसे प्रिय है यदि उसके हृदय में তী सत्य और शरणागति का भाव है। मनुष्य जब भी परमात्मा से केवल उनकी भक्ति मांगते हैं तो संसार का खालीपन अपने आप ईश्वरीय प्रेम से भर जाता है। हम मूरख मुगध सरणागती मिलु  गोविंद रंगा राम राजे।l गुरि पूरै हरि पाइआ हरि भगति इक मंगा Il प्रभु! मैं स्वभाव से अज्ञानी और मूर्ख हूँ। मैं आपकी शरण मै तेरा में आया हूँ। कृपा करके मुझे अपने प्रेम के रंग में रंग भिखारी अर्थ बुद्धि लीजिए। यहां " मूरख" शब्दका की कमी नहीं, बल्कि अहंकार का त्याग है।्जब मनुष्य दुनिया की जिओ चालाकियों और स्वार्थ भरे रिश्तों से थक जाता है॰ तब वह यह स्वीकार करता है कि उसकी अपनी चतुराई काम नहीं   पहाडा आई। पूर्ण गुरु की शिक्षाओं पर चलकर ही परमात्मा की प्राप्ति होती है। उस प्रभु से केवल एक ही दान मांगो उनकी बाबा सच्ची भक्ति। जिसे दुनिया मूरख समझकर दूरी बना लेती है। वह ईश्वर की नजर में सबसे प्रिय है यदि उसके हृदय में তী सत्य और शरणागति का भाव है। मनुष्य जब भी परमात्मा से केवल उनकी भक्ति मांगते हैं तो संसार का खालीपन अपने आप ईश्वरीय प्रेम से भर जाता है। - ShareChat
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satnam waheguru ji - मेरी खामोशी लेगी बदला मेरा झूठे रिश्तों का सच बर्दाश्त नहीं होता। मुझसे ' जब मुँह पर सभी के सच बोलते हूं तो दिखावे बुनियाद पर बने झूठे रिश्ते अपने आप ही 6 टूटने लग जाते है..!! आज मुझको सभी ने अनाथ होना या अकेला होना सिखाया है जब की मेरी दृष्टि में वहू मेरे लिए आत्म निर्भर होने की शुरुआत है..!! जब सांसारिक रिश्तों का झूठ सामने आता है तब वह बात मुझको मजबूती देती है बिना रिश्तो के जिंदगी जीने ही बेहतर है..!! जब परिवार के सदस्य केवल भौतिक रूप से साथ हों, लेकिन मेरे सच और भले की सोच को न समझें, तो उन सभी संग भीड़ मे खड़े होने करके भी मे अपने आप को वीराने मे खड़े होने  जैसा महसूस करता हूं..!! मेरी खामोशी लेगी बदला मेरा झूठे रिश्तों का सच बर्दाश्त नहीं होता। मुझसे ' जब मुँह पर सभी के सच बोलते हूं तो दिखावे बुनियाद पर बने झूठे रिश्ते अपने आप ही 6 टूटने लग जाते है..!! आज मुझको सभी ने अनाथ होना या अकेला होना सिखाया है जब की मेरी दृष्टि में वहू मेरे लिए आत्म निर्भर होने की शुरुआत है..!! जब सांसारिक रिश्तों का झूठ सामने आता है तब वह बात मुझको मजबूती देती है बिना रिश्तो के जिंदगी जीने ही बेहतर है..!! जब परिवार के सदस्य केवल भौतिक रूप से साथ हों, लेकिन मेरे सच और भले की सोच को न समझें, तो उन सभी संग भीड़ मे खड़े होने करके भी मे अपने आप को वीराने मे खड़े होने  जैसा महसूस करता हूं..!! - ShareChat
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satnam waheguru ji - सेवा जीवनु बिरथाााकछून होई है ٠٥ पूरन अरथा।माणस सेवाखरी दुहेली।।साध की सेवा सदा सुहेलीIl मै तेरा हे भाई! ईश्वर या सत्य को छोड़ कर किसी स्वार्थ या अहंकार से भरे मनुष्यों की सेवा करना जीवन को व्यर्थ गँवाने जैसा पूरा भिखारी है। ऐसी सेवा से कभी भी कोई बड़ा या आत्मिक उद्देश्य में हाथ ' में केवल खालीपन ही आता है। नहीं होता। अंत ' जिओ मनुष्य की सेवा जो स्वार्थ पर टिकी है क्योंकि मनुष्य स्वभाव से चंचल है वह आज खुश है तो कल आप पर गुस्सा करेगा| पहाडा इसके विपरीत साध की सेवा सदा सुखद और आनंदमयी I होती है क्योंकि उनसे कभी धोखा की उपेक्षा नहीं मिलती। में खुद ' बाहरी दुनिया के व्यर्थ के शोर और सेवा को नष्ट बाबा और ; उस  साध (सत्य) से जुड़ें करने के बजाय , अपनी आत्मा जहाँ सुकून है। सांसारिक रिश्ते " दुहेली ददुखदायी) हो सकते हैं, लेकिन आपका आंतरिक विश्वास ही उसे " सुहेली (सुखद) बना सकता है। सेवा जीवनु बिरथाााकछून होई है ٠٥ पूरन अरथा।माणस सेवाखरी दुहेली।।साध की सेवा सदा सुहेलीIl मै तेरा हे भाई! ईश्वर या सत्य को छोड़ कर किसी स्वार्थ या अहंकार से भरे मनुष्यों की सेवा करना जीवन को व्यर्थ गँवाने जैसा पूरा भिखारी है। ऐसी सेवा से कभी भी कोई बड़ा या आत्मिक उद्देश्य में हाथ ' में केवल खालीपन ही आता है। नहीं होता। अंत ' जिओ मनुष्य की सेवा जो स्वार्थ पर टिकी है क्योंकि मनुष्य स्वभाव से चंचल है वह आज खुश है तो कल आप पर गुस्सा करेगा| पहाडा इसके विपरीत साध की सेवा सदा सुखद और आनंदमयी I होती है क्योंकि उनसे कभी धोखा की उपेक्षा नहीं मिलती। में खुद ' बाहरी दुनिया के व्यर्थ के शोर और सेवा को नष्ट बाबा और ; उस  साध (सत्य) से जुड़ें करने के बजाय , अपनी आत्मा जहाँ सुकून है। सांसारिक रिश्ते " दुहेली ददुखदायी) हो सकते हैं, लेकिन आपका आंतरिक विश्वास ही उसे " सुहेली (सुखद) बना सकता है। - ShareChat
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satnam waheguru ji - भारी भुंजान के भूप भली बिधिः निआवत सीस, न जात बिचारे।।एते भए॰ तो कहा भए भूपति? अंत को, नागे हीपाइ पधारे।। हे भाई! जिन राजाओं के बड़े ्बडे बलवान हाथ थे, उन्होंने HoT भी अच्छी तरह से सिर झुकाया और अपने सिर को नीचे किया। इतने बड़े राजा होने से क्या हुआ? बड़े बड़े लगे राजाओं और शक्तिशाली लोगों को भी अपने जीवन में सिर झुकाना पड़ता है इतने बड़े राजा होने से क्या हुआ, भी मृत्यु " अगर अंत में उन्हें ' का सामना करना पडता है?] तेरा मृत्यु के बाद सभी नंगे ही पैर पधारते हैं, चाहे वे कितने भी बड़े और शक्तिशाली क्यों न हों। लोग धन और भौतिक भाणा #gq सिद्ध  सुखों ' खोजते हैं। ये पंक्तियाँ ' करती हैं कि चाहे करोड़ों घोड़ेन्हाथी और साम्राज्य ही क्यों न हो, अंत में वे सब यहीं छूट जाते हैं।अर्थात मृत्यु के समय न धन साथ जाता है॰ न रिश्ते, केवल मनुष्य के कर्म और ईश्वर की भक्ति ही साथ होती है। भारी भुंजान के भूप भली बिधिः निआवत सीस, न जात बिचारे।।एते भए॰ तो कहा भए भूपति? अंत को, नागे हीपाइ पधारे।। हे भाई! जिन राजाओं के बड़े ्बडे बलवान हाथ थे, उन्होंने HoT भी अच्छी तरह से सिर झुकाया और अपने सिर को नीचे किया। इतने बड़े राजा होने से क्या हुआ? बड़े बड़े लगे राजाओं और शक्तिशाली लोगों को भी अपने जीवन में सिर झुकाना पड़ता है इतने बड़े राजा होने से क्या हुआ, भी मृत्यु " अगर अंत में उन्हें ' का सामना करना पडता है?] तेरा मृत्यु के बाद सभी नंगे ही पैर पधारते हैं, चाहे वे कितने भी बड़े और शक्तिशाली क्यों न हों। लोग धन और भौतिक भाणा #gq सिद्ध  सुखों ' खोजते हैं। ये पंक्तियाँ ' करती हैं कि चाहे करोड़ों घोड़ेन्हाथी और साम्राज्य ही क्यों न हो, अंत में वे सब यहीं छूट जाते हैं।अर्थात मृत्यु के समय न धन साथ जाता है॰ न रिश्ते, केवल मनुष्य के कर्म और ईश्वर की भक्ति ही साथ होती है। - ShareChat