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#satnam shri waheguru ji #satnam waheguru ji #Meetha Lage Tera bhana #Eek Tu Hi Guru Ji
satnam shri waheguru ji - मेरी खामोशी लेेगी बदला मेरा ख्वाहिशों. ने चलना सिखाया मुझुको और हकीकत ने चुप रहना, इँसेलिए अब अपनों से हर तरह की उम्मीद रखनी बंद कर दी है। क्योंकि जब यह समझ आ जाती है किउम्मीदें ही दिर्द का कारण हैं तब ईंसान संभूल जाता है। अब मैं नृतो किसी से मदद माँगूँगा और न ही किसी से सहानुभूति की चाह मैं अपनों की हर पहले रखगा | कड़वी बात को रिश्ता बचाने के लिए पी जाता था, लेकिन अब दोगुना किए ' 3$ हरवारका' जवाब देने के लिए तैयार रहता हूँ। मेरी खामोशी लेेगी बदला मेरा ख्वाहिशों. ने चलना सिखाया मुझुको और हकीकत ने चुप रहना, इँसेलिए अब अपनों से हर तरह की उम्मीद रखनी बंद कर दी है। क्योंकि जब यह समझ आ जाती है किउम्मीदें ही दिर्द का कारण हैं तब ईंसान संभूल जाता है। अब मैं नृतो किसी से मदद माँगूँगा और न ही किसी से सहानुभूति की चाह मैं अपनों की हर पहले रखगा | कड़वी बात को रिश्ता बचाने के लिए पी जाता था, लेकिन अब दोगुना किए ' 3$ हरवारका' जवाब देने के लिए तैयार रहता हूँ। - ShareChat
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satnam waheguru ji - गुरु देवा गुरु अलख अभेवा त्रिभवण सोझी गुरकी सेवा।l आपे दाति करी गुरि दातै पाइआ अलख अभेवा ম নয अर्थः गुरु ही देव स्वरूप हैं और गुरु ही उस अलख (अदृश्य) और . अभेव (रहस्यमयी ) परमात्मा का रूप हैं। गुरु की निश्छल सेवा करने . भिखारी से मनुष्य को तीनों लोकों पूरे ब्रह्मांड और आत्मिक सत्य की समझ और ज्ञान प्राप्त हो जाता है। अर्थात, गुरु की शिक्षाओं पर चलने से जिओ आ जाता है।जब दाता गुरु स्वयं जीवन का सर्वोच्च सत्य ' समझ में 46TST कृपा करके नाम सिमरन या ज्ञान की दात देते हैं, तब उस अदृश्य और अभेद्य परमात्मा की प्राप्ति हो जाती है। यह सब गुरु की अपनी वाले दया और बख्शिश के कारण ही संभव हो पाता है। गुरु और परमात्मा में कोई भेद नहीं है। ईश्वर को पाने का मार्ग गुरु की सेवा @IqT उनकी शिक्षाओं को जीवन में ढालना ) से होकर गुजरता है। जब गुरु তী प्रसन्न होकर ज्ञान की बख्शिश करते हैं, तो मन के सारे भ्रम दूर हो जाते हैं और उस निराकार प्रभु का अनुभव होने लगता है। गुरु देवा गुरु अलख अभेवा त्रिभवण सोझी गुरकी सेवा।l आपे दाति करी गुरि दातै पाइआ अलख अभेवा ম নয अर्थः गुरु ही देव स्वरूप हैं और गुरु ही उस अलख (अदृश्य) और . अभेव (रहस्यमयी ) परमात्मा का रूप हैं। गुरु की निश्छल सेवा करने . भिखारी से मनुष्य को तीनों लोकों पूरे ब्रह्मांड और आत्मिक सत्य की समझ और ज्ञान प्राप्त हो जाता है। अर्थात, गुरु की शिक्षाओं पर चलने से जिओ आ जाता है।जब दाता गुरु स्वयं जीवन का सर्वोच्च सत्य ' समझ में 46TST कृपा करके नाम सिमरन या ज्ञान की दात देते हैं, तब उस अदृश्य और अभेद्य परमात्मा की प्राप्ति हो जाती है। यह सब गुरु की अपनी वाले दया और बख्शिश के कारण ही संभव हो पाता है। गुरु और परमात्मा में कोई भेद नहीं है। ईश्वर को पाने का मार्ग गुरु की सेवा @IqT उनकी शिक्षाओं को जीवन में ढालना ) से होकर गुजरता है। जब गुरु তী प्रसन्न होकर ज्ञान की बख्शिश करते हैं, तो मन के सारे भ्रम दूर हो जाते हैं और उस निराकार प्रभु का अनुभव होने लगता है। - ShareChat
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satnam waheguru ji - & खामोशी लेगी बदला मेरा धोखे खाने के बाद मैंने अपने चारों तरफ एक ऐसी दीवार बना ली है, जिसे अब कोई भेद नहीं सकता। मैं अपनों के बीच रहूँगा जरूर, हसूँगा बोलूँगा , लेकिन अपने असली जज्बात , अपनी कमजोरी और अपने आँसू किसी को नहीं दिखाऊँगा | मेरी ज़रूरतों और ख्वाहिशों ने सिखाया कि मुझे अब अपनों के बीच चलना कैसे है, और उनकी हकीकत ने मुझे चुप रहकर जीना सिखा दिया। संस्कार गए भाड़ में, अब अगर कोई मेरे साथ गलत करेगा तो उसका भूत और भविष्य बिगाड़ना ही मेरा परम कर्तव्य है। & खामोशी लेगी बदला मेरा धोखे खाने के बाद मैंने अपने चारों तरफ एक ऐसी दीवार बना ली है, जिसे अब कोई भेद नहीं सकता। मैं अपनों के बीच रहूँगा जरूर, हसूँगा बोलूँगा , लेकिन अपने असली जज्बात , अपनी कमजोरी और अपने आँसू किसी को नहीं दिखाऊँगा | मेरी ज़रूरतों और ख्वाहिशों ने सिखाया कि मुझे अब अपनों के बीच चलना कैसे है, और उनकी हकीकत ने मुझे चुप रहकर जीना सिखा दिया। संस्कार गए भाड़ में, अब अगर कोई मेरे साथ गलत करेगा तो उसका भूत और भविष्य बिगाड़ना ही मेरा परम कर्तव्य है। - ShareChat
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satnam waheguru ji - जिना सतिगुरु पुरख़ु न भेटिओ से भागहीण वसि कालााओइ फिरि फिरि जोनि भवाईअहि विचि विसटा करि विकराल ा। अर्थः जिन लोगों को अकाल पुरख का रूप सतिगुरू कभी नहीं मिला, वे वास्तव # dT में बड़े भाग्यहीन और दुर्भाग्यशाली हैं; वे सदैव आत्मिक मौत के वश में रहते हैं। सतिगुरु की शरण और नाम सिमरन के बिना मनुष्य का जीवन विकारों की गंदगी भिखारी में उलझकर रह जाता है। ऐसे लोग विकारों, लोभ और अहंकार रूपी भयानक তিঙজী गंदगी के भीतर रहकर अत्यंत कष्टदायक जीवन जीते हैं, जिससे उनका आत्मिक पतन हो जाता है। इसी कारण वे भयानक आत्मिक जीवन वाले बनकर बारबार योनियों और जन्म मरण के चक्र में डाले जाते हैं। (हे भाई!) गुरु ही वह एकमात्र পঙ্াভা माध्यम हैं जो जीव को इस भयानक संसार सागर (भवसागर) और चौरासी के वाले चक्र से मुक्त करवाकर परमात्मा से मिला सकते हैं। हे भाई!परमात्मा को पाने या विकारों से छूटने का कोई शॉर्टकट नहीं है। सच्चा बाबा गुरु ही वह रोशनी है जो अज्ञानता के अंधेरे को काटती है। शारीरिक मृत्यु तो से टूटा हुआ इंसान हर पल आत्मिक केवल एक बार होती है, लेकिन नाम सिमरन' U रूप से मर रहा होता है (लोभ, मोह और क्रोध के अधीन होकरो] यह संसार एक और गुरु i (ुरबाणी/नाम) उस दलदल या भयानक समुद्र की तरह है, काशब्द की तरह है जो हमें : 7443[ डूबने ; जहाज जिना सतिगुरु पुरख़ु न भेटिओ से भागहीण वसि कालााओइ फिरि फिरि जोनि भवाईअहि विचि विसटा करि विकराल ा। अर्थः जिन लोगों को अकाल पुरख का रूप सतिगुरू कभी नहीं मिला, वे वास्तव # dT में बड़े भाग्यहीन और दुर्भाग्यशाली हैं; वे सदैव आत्मिक मौत के वश में रहते हैं। सतिगुरु की शरण और नाम सिमरन के बिना मनुष्य का जीवन विकारों की गंदगी भिखारी में उलझकर रह जाता है। ऐसे लोग विकारों, लोभ और अहंकार रूपी भयानक তিঙজী गंदगी के भीतर रहकर अत्यंत कष्टदायक जीवन जीते हैं, जिससे उनका आत्मिक पतन हो जाता है। इसी कारण वे भयानक आत्मिक जीवन वाले बनकर बारबार योनियों और जन्म मरण के चक्र में डाले जाते हैं। (हे भाई!) गुरु ही वह एकमात्र পঙ্াভা माध्यम हैं जो जीव को इस भयानक संसार सागर (भवसागर) और चौरासी के वाले चक्र से मुक्त करवाकर परमात्मा से मिला सकते हैं। हे भाई!परमात्मा को पाने या विकारों से छूटने का कोई शॉर्टकट नहीं है। सच्चा बाबा गुरु ही वह रोशनी है जो अज्ञानता के अंधेरे को काटती है। शारीरिक मृत्यु तो से टूटा हुआ इंसान हर पल आत्मिक केवल एक बार होती है, लेकिन नाम सिमरन' U रूप से मर रहा होता है (लोभ, मोह और क्रोध के अधीन होकरो] यह संसार एक और गुरु i (ुरबाणी/नाम) उस दलदल या भयानक समुद्र की तरह है, काशब्द की तरह है जो हमें : 7443[ डूबने ; जहाज - ShareChat
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satnam waheguru ji - किआकहीऐ किछु कही नजाइा अहै सभतेरी रजाइग [3 U परमात्मा ! इस जगत में (जीवों के लिए चाहे सुख हो या' मीठा जो कुछ भी घटित हो रहा है, वह सब केवल और केवल तेरी ही तेरे हुक्म  और हुक्म से हो रहा के बाहर कुछ भी रज़ा इच्छा नहीं है। इस संसार चक्र के सामने मैं अपनी अल्प बुद्धि से क्या लगे कहूँ? मेरे पास कहने के' शब्द ही नहीं हैं और न ही जीव लिए कुछ के वश में कुछ कहना या करना है। यदि जीवों को कोई कष्ट या तेरा दुख मिल रहा है, तो भी उसके विरुद्ध रोस या शिकायत के रूप में हॅम जीव क्या कह सकते हैं? हमें तेरी गूढ़ रज़ा की पूरी समझ नहीं है, इसलिए हमसे कोई गिला या शिकवा किया नहीं जा सकता और न ही कोई गिला फबता है, क्योंकि आप घट घट की जानने भाणा वाले हैं और मेरे बिना कहे भी सब कुछ जानते हैं। साहिब समझाते हैं कि जब इंसान का अहंकार मिट जाता है, तो वह प्रभु के आगे मौन हो जाता है। वह हर परिस्थिति में शिकायतें करना बंद कर देता है, क्योंकि उसे समझ आ जाता है कि परमात्मा जो कर रहा है, वही सही है। हुक्म और रज़ा को इस रूप में मानना ही गुरबाणी का मूल सिद्धांत है। जब इंसान सुख और दुख दोनों को परमात्मा की मर्जी मानकर समान भाव से स्वीकार कर लेता है॰ तो उसके जीवन से सारे क्लेश, शिकायतें और मानसिक तनाव हमेशा के लिए समाप्त हो जाते हैं।" किआकहीऐ किछु कही नजाइा अहै सभतेरी रजाइग [3 U परमात्मा ! इस जगत में (जीवों के लिए चाहे सुख हो या' मीठा जो कुछ भी घटित हो रहा है, वह सब केवल और केवल तेरी ही तेरे हुक्म  और हुक्म से हो रहा के बाहर कुछ भी रज़ा इच्छा नहीं है। इस संसार चक्र के सामने मैं अपनी अल्प बुद्धि से क्या लगे कहूँ? मेरे पास कहने के' शब्द ही नहीं हैं और न ही जीव लिए कुछ के वश में कुछ कहना या करना है। यदि जीवों को कोई कष्ट या तेरा दुख मिल रहा है, तो भी उसके विरुद्ध रोस या शिकायत के रूप में हॅम जीव क्या कह सकते हैं? हमें तेरी गूढ़ रज़ा की पूरी समझ नहीं है, इसलिए हमसे कोई गिला या शिकवा किया नहीं जा सकता और न ही कोई गिला फबता है, क्योंकि आप घट घट की जानने भाणा वाले हैं और मेरे बिना कहे भी सब कुछ जानते हैं। साहिब समझाते हैं कि जब इंसान का अहंकार मिट जाता है, तो वह प्रभु के आगे मौन हो जाता है। वह हर परिस्थिति में शिकायतें करना बंद कर देता है, क्योंकि उसे समझ आ जाता है कि परमात्मा जो कर रहा है, वही सही है। हुक्म और रज़ा को इस रूप में मानना ही गुरबाणी का मूल सिद्धांत है। जब इंसान सुख और दुख दोनों को परमात्मा की मर्जी मानकर समान भाव से स्वीकार कर लेता है॰ तो उसके जीवन से सारे क्लेश, शिकायतें और मानसिक तनाव हमेशा के लिए समाप्त हो जाते हैं।" - ShareChat
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satnam waheguru ji - मेरी ख़ामोशी लेगी बृदला मेरा. सच तो यह है कि वक्त और लोग इतने बदल चुके हैं कि उन्हें दूसरों के राज और जज्बात का तमाशा बनाने में पल भरकी भी देर नहीं मेरी की हुई अच्छाइयां उस पानी की लगताः॰ तरह थीं, जिसे जमीन सोख लेती है और कोई उसकी तरफ देखता भी नहीं। लेकिन मेरी एक छोटी सी गलती उस स्याही की बूंद की तरह बन गईः जो सफेद कपड़े पर गिरते ही पूरे वजूद को दागदार और बदनाम कर देती है॰॰. अपनों के प्रति की गई मेरी हजारों अच्छाइयों को लोगों ने पानी की तरह सोख लिया और भुला दिया; लेकिन मेरी एक भूल स्याही बन गई और मेरा पूरा अस्तित्व उस दागदार कपड़े की तरह नजर आज के इस दौर में लोगों के लिए आन लगा॰॰ की अच्छाइयां सादे खाने जैसी बेरंग हैं॰ दूसरों ' और बुराइयां मसाले की तरह हैं। लोग बिना मसाले के बात ही नहीं करते। मेरी ' बुराई ' आज उनकी गॉसिप (चर्चा) की वो चटनी बॅन चुकी है, जिसका हर कोई चटखारे ले ्लेकर मजा उठा रहा जब इंसान अंदर से बहुत ज्यादा टूट 8_ जाता है॰ तो वह चीखने चिल्लाने के बजाय खामोश होना चुन लेता ' क्योंकि उसे समझ आ है कि हर किसी को अपनी भावनाएं जाता समझाना बिल्कुल फिजूल है..!! मेरी ख़ामोशी लेगी बृदला मेरा. सच तो यह है कि वक्त और लोग इतने बदल चुके हैं कि उन्हें दूसरों के राज और जज्बात का तमाशा बनाने में पल भरकी भी देर नहीं मेरी की हुई अच्छाइयां उस पानी की लगताः॰ तरह थीं, जिसे जमीन सोख लेती है और कोई उसकी तरफ देखता भी नहीं। लेकिन मेरी एक छोटी सी गलती उस स्याही की बूंद की तरह बन गईः जो सफेद कपड़े पर गिरते ही पूरे वजूद को दागदार और बदनाम कर देती है॰॰. अपनों के प्रति की गई मेरी हजारों अच्छाइयों को लोगों ने पानी की तरह सोख लिया और भुला दिया; लेकिन मेरी एक भूल स्याही बन गई और मेरा पूरा अस्तित्व उस दागदार कपड़े की तरह नजर आज के इस दौर में लोगों के लिए आन लगा॰॰ की अच्छाइयां सादे खाने जैसी बेरंग हैं॰ दूसरों ' और बुराइयां मसाले की तरह हैं। लोग बिना मसाले के बात ही नहीं करते। मेरी ' बुराई ' आज उनकी गॉसिप (चर्चा) की वो चटनी बॅन चुकी है, जिसका हर कोई चटखारे ले ्लेकर मजा उठा रहा जब इंसान अंदर से बहुत ज्यादा टूट 8_ जाता है॰ तो वह चीखने चिल्लाने के बजाय खामोश होना चुन लेता ' क्योंकि उसे समझ आ है कि हर किसी को अपनी भावनाएं जाता समझाना बिल्कुल फिजूल है..!! - ShareChat