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#satnam waheguru ji #Meetha Lage Tera bhana #satnam shri waheguru ji
satnam waheguru ji - मानुतासुणिओ को पावै तिलका तीरथु दानुताजे तपु दइआ दतु मनिआ भनि कीता भाउ।अंतरगति तीरथि मलि नाउगा মীতা अर्थः हे भाई!तीर्थों की यात्रा, कठोर तप, दया कर्म पुण्य  तो दे सकते और दान ये सभी लेकिन आध्यात्मिक मार्ग पर इनका मूल्य केवल एक 'तिल' के समान सूक्ष्म है। मात्र दिखावे या कर्मकांडों से उस अनंत बाहरी लगे परमात्मा की प्राप्ति संभव नहीं है। वास्तविक उपलब्धि तो तब है, सुने उस पर जब आत्मा परमात्मा के शब्द को 18 करे और अपने हृदय में निष्काम प्रेम भाउ का दीप ঘুত | I जलाए। जिसने ईश्वर के प्रति इस अटूट श्रद्धा और प्रेम को अपने भीतर बसा लिया, उसने अपनी अंतरात्मा के भीतर स्थित अमृत तीर्थ में स्नान कर लिया। बाहर का पानी केवल शरीर की धूल सा़फ कर लेकिन अहंकार, क्रोध और लोभ जैसी जन्म ्जन्मानंतर सकता भाणा की मैल केवल 'नाम' के सिमरन और ईश्वरीय प्रेम से ही धुलती है। परमात्मा को बाहर खोजने के बजाय अपने भीतर झांकना ही वास्तविक तीर्थयात्रा है। जिसने इस अंतरात्मा के तीर्थ में डुबकी लगा से मुक्त ' ली॰ उसने अपनी आत्मा को विकारों कर लिया और वही सच्चा सुख पाने का अधिकारी बन गया। मानुतासुणिओ को पावै तिलका तीरथु दानुताजे तपु दइआ दतु मनिआ भनि कीता भाउ।अंतरगति तीरथि मलि नाउगा মীতা अर्थः हे भाई!तीर्थों की यात्रा, कठोर तप, दया कर्म पुण्य  तो दे सकते और दान ये सभी लेकिन आध्यात्मिक मार्ग पर इनका मूल्य केवल एक 'तिल' के समान सूक्ष्म है। मात्र दिखावे या कर्मकांडों से उस अनंत बाहरी लगे परमात्मा की प्राप्ति संभव नहीं है। वास्तविक उपलब्धि तो तब है, सुने उस पर जब आत्मा परमात्मा के शब्द को 18 करे और अपने हृदय में निष्काम प्रेम भाउ का दीप ঘুত | I जलाए। जिसने ईश्वर के प्रति इस अटूट श्रद्धा और प्रेम को अपने भीतर बसा लिया, उसने अपनी अंतरात्मा के भीतर स्थित अमृत तीर्थ में स्नान कर लिया। बाहर का पानी केवल शरीर की धूल सा़फ कर लेकिन अहंकार, क्रोध और लोभ जैसी जन्म ्जन्मानंतर सकता भाणा की मैल केवल 'नाम' के सिमरन और ईश्वरीय प्रेम से ही धुलती है। परमात्मा को बाहर खोजने के बजाय अपने भीतर झांकना ही वास्तविक तीर्थयात्रा है। जिसने इस अंतरात्मा के तीर्थ में डुबकी लगा से मुक्त ' ली॰ उसने अपनी आत्मा को विकारों कर लिया और वही सच्चा सुख पाने का अधिकारी बन गया। - ShareChat
#satnam waheguru ji #satnam shri waheguru ji #Meetha Lage Tera bhana
satnam waheguru ji - :EId 3RTII नमसतं अर्भंगे।[ अर्थः परमात्मा किसी विशेष रंग, रूप या दिखावे की सीमाओं में नहीं बँधा हैl मै तेरा वह वर्ण रहित और सर्वव्यापी है। उसका कोई शारीरिक स्वरूप नहीं है जिसे आँखों से देखा जा सके, वह केवल अनुभव का विषय है। नमस्कार है उस भिखारी परमात्मा को जो अभंग हैं अर्थात जिनका कभी नाश नहीं हो सकता, जिन्हें और टूट कोई तोड़ नहीं सकता। संसार की हर चीज़ नश्वर है जाती है, लेकिन जिओ अकाल पुरख ' अभंग' है। वह काल समय से परे है; न उसे पैदा किया जा सकता है और न ही उसका अंत संभव है। गुरु साहिब ने इन दो शब्दों ईश्वर की अमरता और निराकारता को स्पष्ट कियाँ है। जब हम उसे 'अरंगे' कहते है पहाडा वाले तो हम स्वीकार करते हैं किवह किसी एक धर्म, जाति या देश के 'रंग' तक सीमित नहीं है। वह सबके लिए॰एक समान है। यह शब्द भक्त को निर्भयता देता है। जिब हमारा रक्षक बाबा अविनाशी ( अभंगे ) . अभंग' है, तो उसे मानने वाली आत्मा भी निर्भय हो जाती है। हे अकाल जी पुरख! तू वह निराकार सत्ता है जिसका न कोई रंग है, न कोई विशेष रूपः तू हर रंग में समाया होकर भी सबसे निराला है। तुझे नमस्कार है, क्योंकि तू अभंग' है समय की कोई भी मार तुझे छू नहीं सकती और न ही कोई शक्ति तुझे खंडित कर सकती है। तू सदा स्थिर और अविनाशी है। :EId 3RTII नमसतं अर्भंगे।[ अर्थः परमात्मा किसी विशेष रंग, रूप या दिखावे की सीमाओं में नहीं बँधा हैl मै तेरा वह वर्ण रहित और सर्वव्यापी है। उसका कोई शारीरिक स्वरूप नहीं है जिसे आँखों से देखा जा सके, वह केवल अनुभव का विषय है। नमस्कार है उस भिखारी परमात्मा को जो अभंग हैं अर्थात जिनका कभी नाश नहीं हो सकता, जिन्हें और टूट कोई तोड़ नहीं सकता। संसार की हर चीज़ नश्वर है जाती है, लेकिन जिओ अकाल पुरख ' अभंग' है। वह काल समय से परे है; न उसे पैदा किया जा सकता है और न ही उसका अंत संभव है। गुरु साहिब ने इन दो शब्दों ईश्वर की अमरता और निराकारता को स्पष्ट कियाँ है। जब हम उसे 'अरंगे' कहते है पहाडा वाले तो हम स्वीकार करते हैं किवह किसी एक धर्म, जाति या देश के 'रंग' तक सीमित नहीं है। वह सबके लिए॰एक समान है। यह शब्द भक्त को निर्भयता देता है। जिब हमारा रक्षक बाबा अविनाशी ( अभंगे ) . अभंग' है, तो उसे मानने वाली आत्मा भी निर्भय हो जाती है। हे अकाल जी पुरख! तू वह निराकार सत्ता है जिसका न कोई रंग है, न कोई विशेष रूपः तू हर रंग में समाया होकर भी सबसे निराला है। तुझे नमस्कार है, क्योंकि तू अभंग' है समय की कोई भी मार तुझे छू नहीं सकती और न ही कोई शक्ति तुझे खंडित कर सकती है। तू सदा स्थिर और अविनाशी है। - ShareChat
#satnam waheguru ji #satnam shri waheguru ji #Meetha Lage Tera bhana #Eek Tu Hi Guru Ji
satnam waheguru ji - मेरी खामोशी लेगी बदला मेरा रिश्तों का संपूर्ण अस्तित्व विश्वास की धुरी पर टिका होता है विशेषकर परिवारों मे रहते हुएः भरोसा वह अदृश्य ऊर्जा है जो को असुरक्षा के अंधेरों से बचाती है; दूसरों बिना विश्वास के सहयोग का रिश्तों मे कोई आधार नहीं रह जाता; यह वह नींव है जिस पर प्रेम और आदर का महल खड़ा होता है..!!इसलिए तुम अपनी जिन्दगी को एक फूल की तरह जियो, पर उसकी खुशबू बनकर बिखरों भले ही वक्त तोड़ दे॰ पर तुम्हारे d afef तुमको व्यक्तित्व की महक पीछे रह जाने वालों के जीवन को सुगंधित करती रहे..!! छोड़ सभी के साथ चालाकी करनी तू अपना एक ऐसा व्यक्तित्व विकसित कर जो पानी की तरह हर सांचे में ढल जाए॰ जो हर महफिल में घुल मिल जाए॰ लेकिन जिसका रिश्तों मे होना कभी किसी के लिए बोझ न बने..!! मेरी खामोशी लेगी बदला मेरा रिश्तों का संपूर्ण अस्तित्व विश्वास की धुरी पर टिका होता है विशेषकर परिवारों मे रहते हुएः भरोसा वह अदृश्य ऊर्जा है जो को असुरक्षा के अंधेरों से बचाती है; दूसरों बिना विश्वास के सहयोग का रिश्तों मे कोई आधार नहीं रह जाता; यह वह नींव है जिस पर प्रेम और आदर का महल खड़ा होता है..!!इसलिए तुम अपनी जिन्दगी को एक फूल की तरह जियो, पर उसकी खुशबू बनकर बिखरों भले ही वक्त तोड़ दे॰ पर तुम्हारे d afef तुमको व्यक्तित्व की महक पीछे रह जाने वालों के जीवन को सुगंधित करती रहे..!! छोड़ सभी के साथ चालाकी करनी तू अपना एक ऐसा व्यक्तित्व विकसित कर जो पानी की तरह हर सांचे में ढल जाए॰ जो हर महफिल में घुल मिल जाए॰ लेकिन जिसका रिश्तों मे होना कभी किसी के लिए बोझ न बने..!! - ShareChat
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satnam waheguru ji - ೫ खामोशी लेगी बदला मेरा बुनियाद पर खडी ஔதி याद रखना, ख़ुशियाँ कभी स्थायी नहीं होतीं..!! वे ताश के उस महल की तरह हैं जो बाहर से तो चमकता है॰ लेकिन वक्त की एक মামুলী भी उसे ढहाने के' लिए ' ீசு' பி काफी धोखे की यह आदत तुझे कभी 8.0 देगी, होने आंतरिक शांति का अनुभव नहीं ' क्योंकि तुझे हर पलं अपने पकड़े जाने या अपनों को खो देने का डर सताता रहेगा...!! कुदरत का नियम अटल है, तुम को देती हो, चाहे वह जो कुछ भी दूसरों  प्रेम हो या छल, वह लौटकर पास নুদ্কাই ' ही आयेगा.. ! !आज के साथ गलत ಕR ' fag ' মী ঐষী अनजाने में अपने करक নুসন ही काँटों भरी जमीन तैयार कर ली है जिस खुद चल कर अपना बाकी का तुझको पर सफर चलना होगा..!! ೫ खामोशी लेगी बदला मेरा बुनियाद पर खडी ஔதி याद रखना, ख़ुशियाँ कभी स्थायी नहीं होतीं..!! वे ताश के उस महल की तरह हैं जो बाहर से तो चमकता है॰ लेकिन वक्त की एक মামুলী भी उसे ढहाने के' लिए ' ீசு' பி काफी धोखे की यह आदत तुझे कभी 8.0 देगी, होने आंतरिक शांति का अनुभव नहीं ' क्योंकि तुझे हर पलं अपने पकड़े जाने या अपनों को खो देने का डर सताता रहेगा...!! कुदरत का नियम अटल है, तुम को देती हो, चाहे वह जो कुछ भी दूसरों  प्रेम हो या छल, वह लौटकर पास নুদ্কাই ' ही आयेगा.. ! !आज के साथ गलत ಕR ' fag ' মী ঐষী अनजाने में अपने करक নুসন ही काँटों भरी जमीन तैयार कर ली है जिस खुद चल कर अपना बाकी का तुझको पर सफर चलना होगा..!! - ShareChat
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satnam waheguru ji - बिभूते गजाइब गनीमैए अजाइब हरीअ करीअ करीमलु रहीमे 0 RI गोबिंद सिंह जी की यह वाणी वीर रस और भक्ति रस का श्री गुरु ' अद्भुत संगम है। अजाइब , गजाइब, गनीम, करीम, रहीमः ये अरबी और फ़ारसी मूल के शब्द हैं। बिभूते  हरीअ, करीअंः ये संस्कृत और भिखारी में गुरु " साहिब ने संस्कृत, अरबी अपभ्रंश मूल के शब्द हैं। इन पंक्तियों ' और फारसी के शब्दों का सुंदर मेल किया है, जो यह दर्शाता है कि जिओ ईश्वर किसी एक भाषा या धर्म की सीमाओं में नहीं बँधा है, ईश्वर की स्तुति किसी एक भाषा की मोहताज नहीं थी। वे परमात्मा को सभी भाषाओं का ज्ञाता मानते थे। इन पंक्तियों में ईश्वर को एक साथ 46TST विनाशक (हरीअं) और रचनाकार (करीअं) कहा गया है। यह दर्शाता है कि जन्म और मृत्यु दोनों उसी के हुक्म का हिस्सा हैं। श्री गुरु वाले गोबिंद सिंह जी ने यहाँ करीम और रहीम जैसे शब्दों का प्रयोग कर यह स्पष्ट किया है कि जिस ईश्वर को हम अकाल पुरख कहते हैं वही बाबा अल्लाह और रहीम भी है। यह भक्तों को ढांढस बंधाता है कि परमात्मा केवल एक डराने वाली शक्ति नहीं है, बल्कि वह एक प्रेम जी करने वाला पिता भी है जो गलतियों को माफ करता है। एक तरफ का दमन करने वाला गनीमे शक्तिशाली योद्धा है, तो शत्रुओं ' वह तरफ वह अत्यंत दयालु रहीम पिता भी है। दूसरी ' बिभूते गजाइब गनीमैए अजाइब हरीअ करीअ करीमलु रहीमे 0 RI गोबिंद सिंह जी की यह वाणी वीर रस और भक्ति रस का श्री गुरु ' अद्भुत संगम है। अजाइब , गजाइब, गनीम, करीम, रहीमः ये अरबी और फ़ारसी मूल के शब्द हैं। बिभूते  हरीअ, करीअंः ये संस्कृत और भिखारी में गुरु " साहिब ने संस्कृत, अरबी अपभ्रंश मूल के शब्द हैं। इन पंक्तियों ' और फारसी के शब्दों का सुंदर मेल किया है, जो यह दर्शाता है कि जिओ ईश्वर किसी एक भाषा या धर्म की सीमाओं में नहीं बँधा है, ईश्वर की स्तुति किसी एक भाषा की मोहताज नहीं थी। वे परमात्मा को सभी भाषाओं का ज्ञाता मानते थे। इन पंक्तियों में ईश्वर को एक साथ 46TST विनाशक (हरीअं) और रचनाकार (करीअं) कहा गया है। यह दर्शाता है कि जन्म और मृत्यु दोनों उसी के हुक्म का हिस्सा हैं। श्री गुरु वाले गोबिंद सिंह जी ने यहाँ करीम और रहीम जैसे शब्दों का प्रयोग कर यह स्पष्ट किया है कि जिस ईश्वर को हम अकाल पुरख कहते हैं वही बाबा अल्लाह और रहीम भी है। यह भक्तों को ढांढस बंधाता है कि परमात्मा केवल एक डराने वाली शक्ति नहीं है, बल्कि वह एक प्रेम जी करने वाला पिता भी है जो गलतियों को माफ करता है। एक तरफ का दमन करने वाला गनीमे शक्तिशाली योद्धा है, तो शत्रुओं ' वह तरफ वह अत्यंत दयालु रहीम पिता भी है। दूसरी ' - ShareChat
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satnam waheguru ji - सुअसति आथि बाणी बरमाउासति सुहाणु सदा मनि चाउ।।कवणु सु वेला वखतु कवणु कवण थिति कवणु নিন্তু वारु।।कवणि सि रुती माहु कवणु होआ लेखु  आकारुाावेल न पाईआ पंडती जि होवै UIUII लेखु  वखतु न पाइओ कादीआ जि लिखनि gేRTUII मीठा अर्थःहे भाई! वह कौन सा समय था? वह कौन सा वक्त था? वह कौन सी तिथि और कौन सा दिन था? वह कौन सी ऋतु और कौन सा महीना था, जब इसकी గా रचना हुई जब उस समय का पता पंडितों को भी नहीं चला, अन्यथा में ज़रूर लिखते अर्थात हिंदू धर्मग्रंथों में भी वे इसका ' वर्णन 'पुराणों तेरा सृष्टि के सटीक आरंभ का समय दर्ज नहीं है। उस वक्त का ज्ञान काज़ियों को भी नहीं मिल सका, वरना वे उसे ' क़ुरान' की आयतों में श्री गुरु ; नानक देव जी आगे समझा रहे हैं कि सृष्टि कब दर्ज करते। भाणा बुद्धि से परे है। चाहे वह विद्वान यह बताना मनुष्य की 5$ g$ पंडित हों या काज़ी, किसी के पास भी उस "शून्य" काल की सटीक जानकारी नहीं है। हम चाहे कितने भी ज्ञानी बन जाएं॰ प्रकृति और के रहस्यों को पूरी तरह नहीं जान सकते। पसात्मा सुअसति आथि बाणी बरमाउासति सुहाणु सदा मनि चाउ।।कवणु सु वेला वखतु कवणु कवण थिति कवणु নিন্তু वारु।।कवणि सि रुती माहु कवणु होआ लेखु  आकारुाावेल न पाईआ पंडती जि होवै UIUII लेखु  वखतु न पाइओ कादीआ जि लिखनि gేRTUII मीठा अर्थःहे भाई! वह कौन सा समय था? वह कौन सा वक्त था? वह कौन सी तिथि और कौन सा दिन था? वह कौन सी ऋतु और कौन सा महीना था, जब इसकी గా रचना हुई जब उस समय का पता पंडितों को भी नहीं चला, अन्यथा में ज़रूर लिखते अर्थात हिंदू धर्मग्रंथों में भी वे इसका ' वर्णन 'पुराणों तेरा सृष्टि के सटीक आरंभ का समय दर्ज नहीं है। उस वक्त का ज्ञान काज़ियों को भी नहीं मिल सका, वरना वे उसे ' क़ुरान' की आयतों में श्री गुरु ; नानक देव जी आगे समझा रहे हैं कि सृष्टि कब दर्ज करते। भाणा बुद्धि से परे है। चाहे वह विद्वान यह बताना मनुष्य की 5$ g$ पंडित हों या काज़ी, किसी के पास भी उस "शून्य" काल की सटीक जानकारी नहीं है। हम चाहे कितने भी ज्ञानी बन जाएं॰ प्रकृति और के रहस्यों को पूरी तरह नहीं जान सकते। पसात्मा - ShareChat
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satnam waheguru ji - सबदो त गावहु हरी केरा मनि जिनी अनंदु  होआ सतिगुरू वसाइआ ।।कहै नानकु मै पाइआ।। गुरु साहिब स्पष्ट करते हैं कि यह अर्थः गुरु साहिब उस परम सुख और मै तेरा अवस्था तभी प्राप्त हुई जब सच्चे अनंद' की व्याख्या कर रहे हैं, जो मार्गदर्शक की प्राप्ति हुई। गुरु के बिना किसी बाहरी वस्तु से नहीं, बल्कि गुरु भिखारी मन भटकता रहता है॰ लेकिन गुरु का और 'शब्द' से प्राप्त होता বী कृपा शब्द मिलते ही भीतर का अंधकार मिट अर्थ केवल अक्षरों से forat यहा शब्द का जाता है और आनंद का झरना फूट नहीं, बल्कि उस ईश्वरीय कंपन से है जो पड़ता है। १t८एकओंकार वह शब्द पहाडा सृष्टि के मूल में है। है जब यह शब्द मन में टिक जाता परमात्मा को केवल जुबान से गाना वाले तो इंसान का स्वभाव ही बदल जाता काफी नहीं है। जब परमात्मा को हृदय है। वह हर हाल में शांत और प्रसन्न से ईश्वरीय धुन से उसको जुड़ जाता रहने लगता है। गुरु वह माध्यम है जो बाबा तभी असली गावन' होता है। यह वह हमें उस शब्द से जोड़ता है। गुरु की जी आनंद' है जो दुनिया के सुख दुख शिक्षाएं हमें सिखाती हैं कि कैसे दुनिया परे है। यह मानसिक शांति और के शोर के बीच भी अपने भीतर के जहाँ आत्मिक तृप्ति की वह अवस्था अनंद' को खोजा जाए। कोई विचलित नहीं होता। सबदो त गावहु हरी केरा मनि जिनी अनंदु  होआ सतिगुरू वसाइआ ।।कहै नानकु मै पाइआ।। गुरु साहिब स्पष्ट करते हैं कि यह अर्थः गुरु साहिब उस परम सुख और मै तेरा अवस्था तभी प्राप्त हुई जब सच्चे अनंद' की व्याख्या कर रहे हैं, जो मार्गदर्शक की प्राप्ति हुई। गुरु के बिना किसी बाहरी वस्तु से नहीं, बल्कि गुरु भिखारी मन भटकता रहता है॰ लेकिन गुरु का और 'शब्द' से प्राप्त होता বী कृपा शब्द मिलते ही भीतर का अंधकार मिट अर्थ केवल अक्षरों से forat यहा शब्द का जाता है और आनंद का झरना फूट नहीं, बल्कि उस ईश्वरीय कंपन से है जो पड़ता है। १t८एकओंकार वह शब्द पहाडा सृष्टि के मूल में है। है जब यह शब्द मन में टिक जाता परमात्मा को केवल जुबान से गाना वाले तो इंसान का स्वभाव ही बदल जाता काफी नहीं है। जब परमात्मा को हृदय है। वह हर हाल में शांत और प्रसन्न से ईश्वरीय धुन से उसको जुड़ जाता रहने लगता है। गुरु वह माध्यम है जो बाबा तभी असली गावन' होता है। यह वह हमें उस शब्द से जोड़ता है। गुरु की जी आनंद' है जो दुनिया के सुख दुख शिक्षाएं हमें सिखाती हैं कि कैसे दुनिया परे है। यह मानसिक शांति और के शोर के बीच भी अपने भीतर के जहाँ आत्मिक तृप्ति की वह अवस्था अनंद' को खोजा जाए। कोई विचलित नहीं होता। - ShareChat