The Vaibhav Upreti Show
क्या अपने हक़ की बात करने वाली औरत ‘बाज़ारू’ हो जाती है?
हर समाज के अपने-अपने संस्कार और सोच होती है। लेकिन एक सवाल ज़रूर पूछा जाना चाहिए—क्या एक औरत का अपने अधिकारों, अपनी इज़्ज़त और अपनी सुरक्षा के लिए आवाज़ उठाना गलत है?
इस बातचीत में इसी सोच को चुनौती दी गई है। अगर कोई औरत अपनी बात खुलकर रखती है, तो क्या उसे तुरंत “बदतमीज़”, “मुँह लगने वाली” या “बाज़ारू” कह देना सही है? या फिर हमें अपनी सोच पर दोबारा विचार करने की ज़रूरत है?
आप इस बात से कितने सहमत या असहमत हैं? अपनी राय कमेंट्स में ज़रूर बताइए। सभ्य और सम्मानजनक चर्चा का स्वागत है।
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