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#मां दुर्गा ब्रह्मांड की आदि-शक्ति, दुष्टों का संहार करने वाली और भक्तों को अभय प्रदान करने वाली मां दुर्गा की उत्पत्ति का वह परम जाग्रत और अलौकिक प्रसंग।**
### पौराणिक व चमत्कारी कथा (मां दुर्गा का प्राकट्य)
मार्कंडेय पुराण के 'श्री दुर्गा सप्तशती' के अनुसार, पुरातन काल में महिषासुर नाम का एक अत्यंत शक्तिशाली राक्षस था, जिसने अपनी घोर तपस्या से ब्रह्मा जी को प्रसन्न कर यह वरदान प्राप्त कर लिया था कि संसार का कोई भी देवता, दानव या पुरुष उसका वध नहीं कर सकेगा। इस वरदान के अहंकार में आकर उसने तीनों लोकों पर आतंक मचा दिया और देवताओं को युद्ध में हराकर स्वर्ग पर अपना अधिकार कर लिया।
सभी देवता भयभीत और असहाय होकर भगवान विष्णु और भगवान शिव की शरण में पहुंचे। देवताओं की दुर्दशा सुनकर श्री हरि विष्णु, महादेव और ब्रह्मा जी के मुख से एक परम दिव्य तेज (प्रकाश) प्रकट हुआ। देखते ही देखते, अन्य सभी देवताओं के शरीरों से भी एक-एक तेज निकलकर उस महाप्रकाश में विलीन हो गया।
वह समस्त देवताओं का संयुक्त तेज एकत्र होकर एक अत्यंत अलौकिक, रूपवान और दिव्य अष्टादशभुजाधारी (अठारह भुजाओं वाली) देवी के रूप में परिवर्तित हो गया, जिन्हें 'मां दुर्गा' कहा गया। देवी को प्रकट देख सभी देवताओं ने उन्हें अपने दिव्य अस्त्र-शस्त्र सौंपे। भगवान शिव ने अपना त्रिशूल, विष्णु जी ने सुदर्शन चक्र, इंद्र ने वज्र, वरुण देव ने शंख और यमराज ने कालदंड मां को भेंट किया। पर्वतराज हिमालय ने उन्हें अपनी सवारी के लिए एक शक्तिशाली सिंह (शेर) प्रदान किया।
सभी देवताओं की शक्तियों से सुसज्जित होकर मां दुर्गा ने महिषासुर की विशाल सेना पर आक्रमण कर दिया। नौ दिनों तक चले इस भयंकर युद्ध के अंत में, मां दुर्गा ने अपने त्रिशूल से महिषासुर की छाती पर प्रहार किया और उसका मस्तक काटकर तीनों लोकों को उसके घोर अत्याचारों से मुक्त कराया। इसी चमत्कारी घटना के कारण मां दुर्गा का नाम 'महिषासुर मर्दिनी' पड़ा, जो यह सिद्ध करता है कि जब संसार में पाप की अति होती है, तब मां महामाया का यह रूप साक्षात जागृत होकर धर्म की स्थापना करता है।