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#मेरी कविता #📚कविता-कहानी संग्रह
मेरी कविता - तपती रेत पर पांव पडे़े थे क्या मुझे अपने ही कर्मों के दंड मिले थे मैं तो गुजर रहा था रिश्तों के रेगिस्तान से जहां सभी प्रेम के प्यासे मिले थे बुझी आग जले थे क्या मेरे ही किस्से सुने थे में तो लिख रहा था अपने ही दर्द ए बयां जहां सभी गम में रो रहे थे छुपकर दफन हुए थे क्या ख्वाबों के अश्क बहे थे मैं तो बुन रहा ' था अपने ही अफ़साने जहां हकीकत में सब जी रहे थे उभरकर खत्म हुए थे क्या परख कर दूर हुए थे मैं तो लगा रहा था मलहम अपने ही घाव पर जहां सभी नमक छिड़क रहे थे स्वाती छीपा तपती रेत पर पांव पडे़े थे क्या मुझे अपने ही कर्मों के दंड मिले थे मैं तो गुजर रहा था रिश्तों के रेगिस्तान से जहां सभी प्रेम के प्यासे मिले थे बुझी आग जले थे क्या मेरे ही किस्से सुने थे में तो लिख रहा था अपने ही दर्द ए बयां जहां सभी गम में रो रहे थे छुपकर दफन हुए थे क्या ख्वाबों के अश्क बहे थे मैं तो बुन रहा ' था अपने ही अफ़साने जहां हकीकत में सब जी रहे थे उभरकर खत्म हुए थे क्या परख कर दूर हुए थे मैं तो लगा रहा था मलहम अपने ही घाव पर जहां सभी नमक छिड़क रहे थे स्वाती छीपा - ShareChat