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#मेरे विचार #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #🙏गीता ज्ञान🛕 #❤️जीवन की सीख #🙏 प्रेरणादायक विचार
मेरे विचार - यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः | हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः Il जिससे कोई भी जौव उद्वेगको प्राप्त नहों होता और जो स्वयं भी किसीं जीवसे उद्वेगको प्राप्त नहों होता; तथा जो हर्प, अमर्प१, भय और उद्वेगादिसे रहित है वह भक्त प्रिय है Il १५ Il मुझको अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासींनो   गतव्यथः | सर्वारम्भपरित्यागी या मद्धक्तः स मे प्रियः I। जो   पुरुप आकांक्षासे रहित,   बाहर- भीतरसे शुद्ध२ चतुर, पक्षपातसे रहित और दुःखोंसे छूटा सब आरम्भोंका त्यागी मेरा भक्त हुआ है-वह fq గైII ?6 Il मुझको या न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति | शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः II जो न कभी हर्पिंत होता है॰ न द्वेप करता है॰ न शोक करता है, न कामना करता है तथा जो शुभ और अशुभ सम्पूर्ण कर्मोंका त्यागी है =वह भक्तियुक्त ಞ೯Il % Il पुरुप मुझको उत्नतिको देखकर संताप होनेका नाम ' अमर्प ' है। दूसरेको ?. २. गौता अध्याय १३ श्लोक ७ को टिप्पणोमें इसका विस्तार देखना   चाहिये। श्रीमढ्भगवढ्गीता अध्याय १२ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः | हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः Il जिससे कोई भी जौव उद्वेगको प्राप्त नहों होता और जो स्वयं भी किसीं जीवसे उद्वेगको प्राप्त नहों होता; तथा जो हर्प, अमर्प१, भय और उद्वेगादिसे रहित है वह भक्त प्रिय है Il १५ Il मुझको अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासींनो   गतव्यथः | सर्वारम्भपरित्यागी या मद्धक्तः स मे प्रियः I। जो   पुरुप आकांक्षासे रहित,   बाहर- भीतरसे शुद्ध२ चतुर, पक्षपातसे रहित और दुःखोंसे छूटा सब आरम्भोंका त्यागी मेरा भक्त हुआ है-वह fq గైII ?6 Il मुझको या न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति | शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः II जो न कभी हर्पिंत होता है॰ न द्वेप करता है॰ न शोक करता है, न कामना करता है तथा जो शुभ और अशुभ सम्पूर्ण कर्मोंका त्यागी है =वह भक्तियुक्त ಞ೯Il % Il पुरुप मुझको उत्नतिको देखकर संताप होनेका नाम ' अमर्प ' है। दूसरेको ?. २. गौता अध्याय १३ श्लोक ७ को टिप्पणोमें इसका विस्तार देखना   चाहिये। श्रीमढ्भगवढ्गीता अध्याय १२ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार - ShareChat