सुशील मेहता
विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस
विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस: 1947 में भारत के विभाजन के दौरान अपना घर-बार खोने वाले और जान गंवाने वाले लाखों लोगों के बलिदान और पीड़ा की याद में भारत में हर साल यह दिवस मनाया जाता है. यह दिन लोगों को विभाजन की भयावहता की याद दिलाता है।
देश में आजादी का अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है तो विभाजन के कारण आपके प्राण आजादी का अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है, आपके प्राण स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव निश्चित रूप से स्वागत योग्य है। देश में 'विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस' के माध्यम से सेडिजाइन की मानवीय त्रासदी को पुनः आरंभ किया जा रहा है, इस पुनः आरंभ रेखा को देश के बाहर और बहुत ही सीमित संख्या में देशों के भीतर गैर-जरूरी माना जा रहा है। यह वह वर्ग है जो विभाजन के उत्तरदायित्वों के उदाहरण को दर्शाता है, लाखों लोगों की हत्याओं का सच को समझा कर छुपाया गया है। जाहिर तौर पर किसी भी भारत विभाजन के दौरान जिस तरह की अवैयक्तिक अवशिष्ट बनी उसकी कल्पना भी उस समय नहीं की गई थी। 4 जून 1947 को भारत में अंतिम ब्रिटिश वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन द्वारा भाषण पत्रकार सम्मेलन में दिए गए प्रश्न पर उत्तर से शैक्षणिक और भी स्पष्ट हो गया है। माउंटबेटन ने कहा, "व्यक्तिगत रूप से कोई समस्या नहीं है, मैसाचुसेट्स के कुछ उपाय स्वाभाविक रूप से सामने आएंगे...लोग अपने आप को स्थानांतरित कर सकते हैं।” लाखों लोगों के विभाजन के बाद ऐसी स्थिति में चित्र दिए गए हैं जिनके बारे में जान आज भी रोंगटे हो जाते हैं। मीलों तक पैदल चलते हुए बाढ़, धूप की धूप और रेस्टहोल को झेलते लोग अपनी मंजिल तक पहुंचे। कुछ लोग रास्ते में ही नाइटस्टैंड, भारी थकावत और भोजन की आदि से काल कैवलित हो गए। विभाजन के बारे में पंजाबी, उर्दू, हिंदी सहित विभिन्न भारतीय सागरों और अंग्रेजी भाषा में लिखित साहित्य में अंत्यंत मार्मिक धीरे-धीरे उस दौर की मार्मिक अवस्था का चित्रण किया गया है। 1946 और 1947 के बीच भारत के विभिन्न विचारधाराओं में जो हिंसा हुई, उसका उत्तर आज तक नहीं मिला। विभाजन के दौरान हिंसा की सनक न केवल किसी का जीवन ले लेने की थी बल्कि दूसरे धर्म की सांस्कृतिक और भौतिक उपस्थिति को भी उजागर किया गया था। विभिन्न धर्मों के लोग देशों के अलग-अलग इलाकों में सह-अस्तित्व में जीवन यापन करते थे, लेकिन धीरे-धीरे-धीरे-धीरे-धीरे-धीरे-धीरे-धीरे-धीरे-धीरे-धीरे-धीरे-धीरे-धीरे-धीरे-धीरे-धीरे-धीरे-अस्तित्व में होने की भावना पैदा होने लगी, जिससे सह-अस्तित्व की भावना खत्म हो गई। रेडक्लिफ के सीमांत डिविजन के खतरनाक सिद्धांत ने भारत डिविजन के जो लक्षण और विषमताएं पैदा कीं, वह कभी भी खत्म नहीं हो सकीं। विभाजन के बाद जो हिंदू, सिख भारत आए उन्हें अनेक विधर्मियों का सामना करना पड़ा, लेकिन लोकतंत्र के आर्थिक, ई, सामाजिक विधर्मियों की सीमा को लंघ अपनी भाषा के बलबूते ये नागरिक एक आधुनिक लोकतंत्र के व्यवहारिक रूप में लागू होने की दिशा में अन्य भारतीयों के कंधे से कंधा मिलाकर चल पड़े और इस वर्ष देश जब 76 वें स्वतंत्रता दिवस मनाया जा रहा है तब विभाजन के परिवार की विचारधारा आ गई की पीढ़ियां बहुविविध भारतीय समाज में रचबस कर बेहतर कर रही हैं। पाकिस्तान और बांग्लादेश में जो अल्पसंख्यक रह गए थे, उनके साथ बाद के वर्षों में हुई ज्यादतियां किसी से नहीं रहीं। आज भी पाकिस्तान और बांग्लादेश में बहुत कम संख्या में धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ ज्यादतियों की जातीयता जारी है-डिजिट का दंश जिसमें सबसे ज्यादा झेलना पड़ा वह महिलाएं हैं। लाखों महिलाओं के साथ बलात्कार, हत्याएं और उन्हें दास बनाने के, न डराने वाले जघन्य अपराध हुए हैं। मनुष्यता के विरुद्ध हुई इस जघन्यतम विभीषिका में नृशंसता की स्थापना की गई लोगों को स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव में सरकार और आम जनमानस द्वारा याद किया जाना निश्चित ही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि है। 14 अगस्त को 'विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस' के माध्यम से 'विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस' के माध्यम से एक विशेष स्थान पर लाखों लोगों को श्रद्धासुमन अर्पित किया गया, जो भारतीय उपमहाद्वीप के सबसे नृशंसतम अपराध के शिखर पर चढ़ गया।
#स्मृति दिवस