मनोरथैकसाराणाम् एवमेव गतं वयः ।
अद्यापि न कृतं किञ्चित् सत्तां संस्मरणोचितम् ॥
[ वल्लभदेव - ३३९३ ]
अर्थात् 👉🏻 विभिन्न प्रकार की अभिलाषाएं करते-करते ही समस्त आयु व्यतीत हो गई तथा अहो ( हाय ) - अबतक वह कुछ नहीं कर सका जो सत्पुरुषों के द्वारा स्मरण करने योग्य शेष रहता ।
{ केवल कामनाओं/इच्छाओं को ही सार ( मूल ) मानने वालों का । आयु/समय ऐसे ही ( व्यर्थ ) व्यतीत हो गया । आज तक ( भी ) कुछ भी नहीं किया । ' ऐसा कुछ , जो याद रखने योग्य ' ( अर्थपूर्ण कार्य ) हो । }
🌄🌄 प्रभात वंदन 🌄🌄
#श्री गणेशाय नमः


