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#मेरे विचार #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #🙏गीता ज्ञान🛕 #❤️जीवन की सीख #🙏 प्रेरणादायक विचार
मेरे विचार - सङ्मय उवाच वासुदेवस्तथोक्त्वा  इत्यर्जुनं स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः भीतमेनं- 7 3াথ্ামমামাম पुनः   सौम्यवपुर्मंहात्मा II भूत्वा संजय बौले  वासुदेवभगवानूने अर्जुनके प्रति इस ग्रकार कहकर फिर वैसे ही अपने चतुर्भुंज रूपको दिखलाया और फिर महात्मा श्रीकृष्णने सौम्यमू्तिं होकर इस भयभीत अर्जुनको धीरज दियाIl ५० Il अजुन उवाच सौम्यं   जनार्दन। दृष्ेदं मानुपं   रूपं নন इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः अर्जुन बोले - हे जनार्दन ! आपके इस अति शान्त मनुष्यरूपको देखकर अब मैॅ स्थिरचित्त हो गया हूँ और अपनी स्वाभाविक स्थितिको प्राप्त हौे गया हूँ II ५१ Il श्रीभगवानुवाच ತತ್ತಗಕೆ दृष्टवानसि எ் যন্সম | देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाइक्षिणः II श्रौभगवान् बौले- मेरा जौ चतुरभुंज रूप तुमने देखा हैं, यह सुदुर्दर्श हैं अर्थात् इसके दर्शन बड़े ही दुर्लंभ हें। देवता भी सदा इस रूपके दर्शनकी  आकांक्षा करते रहते हैॅं Il ५२ ।I  नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया| एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा I।  হানম मुझको देखा है॰ इस् प्रकार f ஈ तुमने चतुर्भुजरूपवाला मैँ न वेदौंसे, न तपसे, न दानसे और न यज्ञसे हीं देखा जा सकता हूँ II ५३ Il  श्रीमढ्भगवढ्गीता अध्याय ११ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार सङ्मय उवाच वासुदेवस्तथोक्त्वा  इत्यर्जुनं स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः भीतमेनं- 7 3াথ্ামমামাম पुनः   सौम्यवपुर्मंहात्मा II भूत्वा संजय बौले  वासुदेवभगवानूने अर्जुनके प्रति इस ग्रकार कहकर फिर वैसे ही अपने चतुर्भुंज रूपको दिखलाया और फिर महात्मा श्रीकृष्णने सौम्यमू्तिं होकर इस भयभीत अर्जुनको धीरज दियाIl ५० Il अजुन उवाच सौम्यं   जनार्दन। दृष्ेदं मानुपं   रूपं নন इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः अर्जुन बोले - हे जनार्दन ! आपके इस अति शान्त मनुष्यरूपको देखकर अब मैॅ स्थिरचित्त हो गया हूँ और अपनी स्वाभाविक स्थितिको प्राप्त हौे गया हूँ II ५१ Il श्रीभगवानुवाच ತತ್ತಗಕೆ दृष्टवानसि எ் যন্সম | देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाइक्षिणः II श्रौभगवान् बौले- मेरा जौ चतुरभुंज रूप तुमने देखा हैं, यह सुदुर्दर्श हैं अर्थात् इसके दर्शन बड़े ही दुर्लंभ हें। देवता भी सदा इस रूपके दर्शनकी  आकांक्षा करते रहते हैॅं Il ५२ ।I  नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया| एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा I।  হানম मुझको देखा है॰ इस् प्रकार f ஈ तुमने चतुर्भुजरूपवाला मैँ न वेदौंसे, न तपसे, न दानसे और न यज्ञसे हीं देखा जा सकता हूँ II ५३ Il  श्रीमढ्भगवढ्गीता अध्याय ११ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार - ShareChat