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📓 हिंदी साहित्य - নক্কাৎ ব্ধা যামা" अपने साए से चौंक जाते हैं, है इस क़दर तन्हा. गुज़री 34 कोई आहट भी डर सी लगती है, जैसे खो जाए फिर वही लम्हा. भीड़ में भी अजीब सन्नाटा , दिल को मिलता नहीं है हमन्सा. हर हँसी में छुपा है एक खालीपन, लगती है कुछ अधूरा सा. हर खुशी आईने से भी नज़रें चुराते हैं, खुद से मिलना हुआ है अब मुश्किल सा. जो कभी दिल के पास रहते थे, अब वो लगते हैं एक किस्सा सा. Gupta Ji Your uotein নক্কাৎ ব্ধা যামা" अपने साए से चौंक जाते हैं, है इस क़दर तन्हा. गुज़री 34 कोई आहट भी डर सी लगती है, जैसे खो जाए फिर वही लम्हा. भीड़ में भी अजीब सन्नाटा , दिल को मिलता नहीं है हमन्सा. हर हँसी में छुपा है एक खालीपन, लगती है कुछ अधूरा सा. हर खुशी आईने से भी नज़रें चुराते हैं, खुद से मिलना हुआ है अब मुश्किल सा. जो कभी दिल के पास रहते थे, अब वो लगते हैं एक किस्सा सा. Gupta Ji Your uotein - ShareChat