#महाभारत
#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣8️⃣5️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
एकोनत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः
कृपाचार्य, द्रोण और अश्वत्थामा की उत्पत्ति तथा द्रोण को परशुरामजी से अस्त्र-शस्त्र की प्राप्ति की कथा...(दिन 383)
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ततः संवर्धयामास संस्कारैश्चाप्ययोजयत् । प्रातीपेयो नरश्रेष्ठो मिथुनं गौतमस्य तत् ।। १८ ।।
तदनन्तर नरश्रेष्ठ प्रतीपनन्दन शन्तनुने शरद्वान्के उन दोनों बालकोंका पालन-पोषण किया और यथासमय उन्हें सब संस्कारोंसे सम्पन्न किया ।। १८ ।।
गौतमोऽपि ततोऽभ्येत्य धनुर्वेदपरोऽभवत् ।
कृपया यन्मया बालाविमौ संवर्धिताविति ।। १९ ।।
तस्मात् तयोर्नाम चक्रे तदेव स महीपतिः।
गोपितौ गौतमस्तत्र तपसा समविन्दत ।। २० ।।
गौतम (शरद्वान्) भी उस आश्रमसे अन्यत्र जाकर धनुर्वेदके अभ्यासमें तत्पर रहने लगे। राजा शन्तनुने यह सोचकर कि मैंने इन बालकोंको कृपापूर्वक पाला-पोसा है, उन दोनोंके वे ही नाम रख दिये-कृप और कृपी। राजाके द्वारा पालित हुई अपनी दोनों संतानोंका हाल गौतमने तपोबलसे जान लिया ।। १९-२० ।।
आगत्य तस्मै गोत्रादि सर्वमाख्यातवांस्तदा । चतुर्विधं धनुर्वेदं शास्त्राणि विविधानि च ।। २१ ।।
निखिलेनास्य तत् सर्वं गुह्यमाख्यातवांस्तदा ।
सोऽचिरेणैव कालेन परमाचार्यतां गतः ।। २२ ।।
और वहाँ गुप्तरूपसे आकर अपने पुत्रको गोत्र आदि सब बातोंका पूरा परिचय दे दिया। चार प्रकारके धनुर्वेद, नाना प्रकारके शास्त्र तथा उन सबके गूढ़ रहस्यका भी पूर्णरूपसे उसको उपदेश दिया। इससे कृप थोड़े ही समयमें धनुर्वेदके उत्कृष्ट आचार्य हो गये ।। २१-२२ ।।
ततोऽधिजग्मुः सर्वे ते धनुर्वेदं महारथाः ।
धृतराष्ट्रात्मजाश्चैव पाण्डवाः सह यादवैः ।। २३ ।।
धृतराष्ट्रके महारथी पुत्र, पाण्डव तथा यादव-सबने उन्हीं कृपाचार्यसे धनुर्वेदका अध्ययन किया ।। २३ ।।
वृष्णयश्च नृपाश्चान्ये नानादेशसमागताः ।
वृष्णिवंशी तथा भिन्न-भिन्न देशोंसे आये हुए अन्य नरेश भी उनसे धनुर्वेदकी शिक्षा लेते थे ।। २३ ।।
वैशम्पायन उवाच
विशेषार्थी ततो भीष्मः पौत्राणां विनयेप्सया ।। २४ ।।
इष्वस्त्रज्ञान् पर्यपृच्छदाचार्यान् वीर्यसम्मतान् ।
नाल्पधीर्ना महाभागस्तथा नानास्त्रकोविदः ।। २५ ।।
नादेवसत्त्वो विनयेत् कुरूनस्त्रे महाबलान् । इति संचिन्त्य गाङ्गेयस्तदा भरतसत्तमः ।। २६ ।।
द्रोणाय वेदविदुषे भारद्वाजाय धीमते ।
पाण्डवान् कौरवांश्चैव ददौ शिष्यान् नरर्षभ ।। २७ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- राजन् ! कृपाचार्यके द्वारा पूर्णतः शिक्षा मिल जानेपर पितामह भीष्मने अपने पौत्रोंमें विशिष्ट योग्यता लानेके लिये उन्हें और अधिक शिक्षा देनेकी इच्छासे ऐसे आचार्योंकी खोज प्रारम्भ की, जो बाण-संचालनकी कलामें निपुण और अपने पराक्रमके लिये सम्मानित हों। उन्होंने सोचा- 'जिसकी बुद्धि थोड़ी है, जो महान् भाग्यशाली नहीं है, जिसने नाना प्रकारकी अस्त्र-विद्यामें निपुणता नहीं प्राप्त की है तथा जो देवताओंके समान शक्तिशाली नहीं है, वह इन महाबली कौरवोंको अस्त्र-विद्याकी शिक्षा नहीं दे सकता।' नरश्रेष्ठ ! यों विचारकर भरतश्रेष्ठ गंगानन्दन भीष्मने भरद्वाजवंशी, वेदवेत्ता तथा बुद्धिमान् द्रोणको आचार्यके पदपर प्रतिष्ठित करके उनको शिष्यरूपमें पाण्डवों तथा कौरवोंको समर्पित कर दिया ।। २४-२७ ।।
शास्त्रतः पूजितश्चैव सम्यक् तेन महात्मना । स भीष्मेण महाभागस्तुष्टोऽस्त्रविदुषां वरः ।। २८ ।।
अस्त्र-विद्याके विद्वानोंमें श्रेष्ठ महाभाग द्रोण महात्मा भीष्मके द्वारा शास्त्रविधिसे भलीभाँति पूजित होनेपर बहुत संतुष्ट हुए ।। २८ ।।
प्रतिजग्राह तान् सर्वान् शिष्यत्वेन महायशाः ।
शिक्षयामास च द्रोणो धनुर्वेदमशेषतः ।। २९ ।।
फिर उन महायशस्वी आचार्य द्रोणने उन सबको शिष्यरूपमें स्वीकार किया और
सम्पूर्ण धनुर्वेदकी शिक्षा दी ।। २९ ।।
तेऽचिरेणैव कालेन सर्वशस्त्रविशारदाः ।
बभूवुः कौरवा राजन् पाण्डवाश्चामितौजसः ।। ३० ।।
राजन् ! अमिततेजस्वी पाण्डव तथा कौरव-सभी थोड़े ही समयमें सम्पूर्ण शस्त्र-विद्यामें परम प्रवीण हो गये ।। ३० ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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