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यह घटना 1953 के मई महीने की है। तमिलनाडु के रामनाथपुरम ज़िले के एक सुनसान तटीय इलाके में एक ऊँची पहाड़ी के कोने पर मद्रास प्राणी विज्ञान परिषद के दो वैज्ञानिक उस सुबह बैठे थे। वरिष्ठ प्राणी वैज्ञानिक डॉ. मुत्तुस्वामी पिल्लई और उनके सहायक कार्तिकेयन — कार्तिकेयन के पास परिषद का एक पुराना फ़िल्म कैमरा था। वे उस दिन तटीय पक्षियों का सर्वेक्षण करने आए थे और पहाड़ी के एक कोने पर छुपकर बैठे थे जहाँ से नीचे का पूरा तट दिखता था। #lostfootage1953 सुबह के करीब 7 बज रहे थे। कार्तिकेयन ने दूरबीन से नीचे तट की तरफ देखा। और दूरबीन नीचे कर ली। डॉ. पिल्लई ने देखा — कार्तिकेयन का चेहरा अजीब था। "क्या हुआ?" कार्तिकेयन ने दूरबीन उनकी तरफ बढ़ाई। बोला कुछ नहीं। डॉ. मुत्तुस्वामी पिल्लई ने दूरबीन लगाई। नीचे समुद्र के किनारे — गीली रेत पर — कुछ खड़ा था जो इस दुनिया में होना नहीं चाहिए था। पहली नज़र में — हाथी। लेकिन डॉ. पिल्लई एक प्राणी वैज्ञानिक थे। उन्होंने पूरी दुनिया के हाथियों का अध्ययन किया था। और यह — यह किसी भी ज्ञात हाथी की प्रजाति नहीं था। वह शरीर हाथी जैसा था — लेकिन बहुत बड़ा। असाधारण रूप से बड़ा। उसका धड़ किसी बड़े पीपे जैसा गोल और भारी था। उसकी खाल सामान्य हाथी की खाल से ज़्यादा गहरी, ज़्यादा झुर्रीदार थी — जैसे उसने सालों समुद्र के पानी में बिताए हों। #lambigardan1953 और उसकी गर्दन। डॉ. पिल्लई ने बाद में अपनी डायरी में लिखा — "मैं उस गर्दन को देखकर पहले समझ ही नहीं पाया कि वह क्या है। वह इतनी लंबी थी कि पहले मुझे लगा मैं किसी अलग जानवर को देख रहा हूँ। फिर मैंने देखा — वह उसी शरीर की गर्दन है। जिराफ़ जितनी लंबी। लेकिन जिराफ़ की तरह पतली नहीं — मोटी। हाथी की गर्दन जितनी मोटी, लेकिन जिराफ़ जितनी लंबी।" उस लंबी गर्दन के ऊपर — एक हाथी का सिर था। सूँड़ थी। दाँत थे। लेकिन कान छोटे थे — सामान्य हाथी के बड़े पंखे जैसे कान नहीं। छोटे, गोल। वह प्राणी समुद्र के किनारे खड़ा था। उसके चारों पैर — जो किसी खंभे जैसे मोटे थे — गीली रेत में धँसे हुए थे। समुद्र की लहरें उसके पैरों को छू रही थीं। उसकी सूँड़ धीरे-धीरे हिल रही थी — बिल्कुल स्वाभाविक तरीके से। कार्तिकेयन ने कैमरा निकाला। #samudrihaathi डॉ. पिल्लई ने उस प्राणी की ऊँचाई का अनुमान लगाने की कोशिश की। उन्होंने पास की चट्टानों से तुलना करके अंदाज़ा लगाया — और फिर डायरी में लिखा — "मेरा अनुमान गलत हो सकता है। लेकिन जो मैंने देखा उसके आधार पर — वह प्राणी किसी चार मंज़िला इमारत जितना ऊँचा था। सिर्फ गर्दन और सिर मिलाकर।" वह प्राणी वहाँ करीब डेढ़ घंटे रहा। उसने समुद्र में सूँड़ डाली। पानी पिया। अपनी लंबी गर्दन को एक तरफ से दूसरी तरफ घुमाया — धीरे-धीरे, बिल्कुल स्वाभाविक तरीके से। एक बार वह समुद्र की तरफ थोड़ा आगे बढ़ा — पानी उसके घुटनों तक आ गया। डॉ. पिल्लई ने लिखा — "वह प्राणी समुद्र से डरा नहीं। वह उसे जानता था। जैसे समुद्र उसका घर हो।" #unexplainedIndia फिर वह वापस गहरे पानी की तरफ बढ़ा। धीरे-धीरे। उसके पैर पानी में उतरे। उसका शरीर पानी में समाया। उसकी लंबी गर्दन और सिर सबसे आखिर में पानी के ऊपर दिखे — फिर वे भी डूब गए। कार्तिकेयन ने कैमरा नीचे किया। दोनों काफी देर तक चुप रहे। डॉ. मुत्तुस्वामी पिल्लई ने वह फ़िल्म रील परिषद को कभी नहीं दी। उन्होंने एक सामान्य रिपोर्ट लिखी — "तटीय पक्षी सर्वेक्षण पूर्ण।" उनकी डायरी के उस दिन की एंट्री के अंत में एक वाक्य था — "यह प्राणी किसी किताब में नहीं है। शायद इसलिए क्योंकि जिसने भी इसे पहले देखा — उसने भी किसी को नहीं बताया।" #news
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