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#मेरी कविता #📚कविता-कहानी संग्रह
मेरी कविता - यूं तो फलक पर बिछड़ते देखे हैं हजारों तारे पर यूं जमी के घरौदों को बिखरते क्यूं देखा नहीं जाता यूं तो जमाने में देखे हैं हजारों गमगीन अश्क्न नयन पर यूं अपना दर्द छलकता क्यूं अब सहा नहीं जाता यूं तो दुनियादारी की बातें है समझ में थोड़ी भारी पर यूं अपने मसले का हल सरल क्यूं निकाला नहीं जाता यूं तो उजड़ा है गुलिस्ता फ़िजाओ का भी बहार में पर यूं अपना मुरझाया फूल वापस क्यूं खिलाया नहीं जाता यूं तो गहरे है मर्ज संसार के रिसते हर घाव के पर यूं अपना ज़ख्म होता हरा क्यूं देखा नहीं जाता यूं तो पहुंचे हैं भक्ति पथ गामी अंत में मोक्ष तक भी पर यूं अपने आत्म को कर संयत क्यूं ऊपर उठाया नहीं जाता यूं तो निशां मिट जाते है इस जगत के हर शख्स के सारे पर यूं अपने मिजाज को उतार जाने क्यूं दफनाया नहीं जाता.. स्वाती छीपा यूं तो फलक पर बिछड़ते देखे हैं हजारों तारे पर यूं जमी के घरौदों को बिखरते क्यूं देखा नहीं जाता यूं तो जमाने में देखे हैं हजारों गमगीन अश्क्न नयन पर यूं अपना दर्द छलकता क्यूं अब सहा नहीं जाता यूं तो दुनियादारी की बातें है समझ में थोड़ी भारी पर यूं अपने मसले का हल सरल क्यूं निकाला नहीं जाता यूं तो उजड़ा है गुलिस्ता फ़िजाओ का भी बहार में पर यूं अपना मुरझाया फूल वापस क्यूं खिलाया नहीं जाता यूं तो गहरे है मर्ज संसार के रिसते हर घाव के पर यूं अपना ज़ख्म होता हरा क्यूं देखा नहीं जाता यूं तो पहुंचे हैं भक्ति पथ गामी अंत में मोक्ष तक भी पर यूं अपने आत्म को कर संयत क्यूं ऊपर उठाया नहीं जाता यूं तो निशां मिट जाते है इस जगत के हर शख्स के सारे पर यूं अपने मिजाज को उतार जाने क्यूं दफनाया नहीं जाता.. स्वाती छीपा - ShareChat