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#पूजन विधि
पूजन विधि - देवी धूमावती जयन्ती की कथा एक समय देवी पार्वती एवं भगवान शिव कैलाश पर्वत पर भ्रमण कर रहे थे। उसी समय उन्हें तीव्र क्षुधा का अनुभव हुआ तथा उन्होंने भगवान शिव से अपनी क्षुधा की हेतु भोजन प्रदान करने का निवेदन किया। भगवान शिव ने उन्हें कुछ क्षण प्रतीक्षा करने को कहा। समय व्यतीत होता जा रहा था तथा देवी क्षुधा के कारण व्याकुल हो रही थीं। बारम्बार आग्रह करने पर भी भोजन का प्रबन्ध न होने पर देवी पार्वती ने अपनी क्षुधाग्नि का शमन करने हेतु भगवान शिव को ही निगल लिया। भगवान शिव को ग्रहण करते ही शिव जी के कण्ठ में उपस्थित विष के प्रभाव से देवी पार्वती की देह धूम्रमयी हो गयी तथा उनका स्वरूप विकृत हो गया। तदोपरान्त भगवान शिव अपनी माया के द्वारा देवी माँ से कहते हैं कि, "तुम्हारी सम्पूर्ण देह धूम्र युक्त होने के कारण तुम धूमावती के रूप में विख्यात होगी। जिस समय मेरा 377 भक्षण कर लिया उसी समय तुम विधवा हो गयी। अतः समस्त संसार में तुम्हारी इसी रूप में पूजा अर्चना की जायेगी।  देवी धूमावती जयन्ती की कथा एक समय देवी पार्वती एवं भगवान शिव कैलाश पर्वत पर भ्रमण कर रहे थे। उसी समय उन्हें तीव्र क्षुधा का अनुभव हुआ तथा उन्होंने भगवान शिव से अपनी क्षुधा की हेतु भोजन प्रदान करने का निवेदन किया। भगवान शिव ने उन्हें कुछ क्षण प्रतीक्षा करने को कहा। समय व्यतीत होता जा रहा था तथा देवी क्षुधा के कारण व्याकुल हो रही थीं। बारम्बार आग्रह करने पर भी भोजन का प्रबन्ध न होने पर देवी पार्वती ने अपनी क्षुधाग्नि का शमन करने हेतु भगवान शिव को ही निगल लिया। भगवान शिव को ग्रहण करते ही शिव जी के कण्ठ में उपस्थित विष के प्रभाव से देवी पार्वती की देह धूम्रमयी हो गयी तथा उनका स्वरूप विकृत हो गया। तदोपरान्त भगवान शिव अपनी माया के द्वारा देवी माँ से कहते हैं कि, "तुम्हारी सम्पूर्ण देह धूम्र युक्त होने के कारण तुम धूमावती के रूप में विख्यात होगी। जिस समय मेरा 377 भक्षण कर लिया उसी समय तुम विधवा हो गयी। अतः समस्त संसार में तुम्हारी इसी रूप में पूजा अर्चना की जायेगी। - ShareChat