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#🪔देवशयनी एकादशी 🙏🌺
भगवान विष्णु के चार महीने तक योग निद्रा में रहने की परंपरा को 'चातुर्मास' के नाम से जाना जाता है।
आषाढ़ महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी (जिसे देवशयनी एकादशी कहा जाता है) से भगवान विष्णु योग निद्रा में चले जाते हैं और कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी (देवउठनी एकादशी) को जागते हैं।
इस चार महीने की योग निद्रा से जुडी पौराणिक कथा के अनुसार, दैत्यराज बलि (जो प्रहलाद के पौत्र थे) अत्यंत पराक्रमी, दानवीर और धर्मनिष्ठ राजा थे। उन्होंने अपने तपोबल और पराक्रम से तीनों लोकों (स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल) पर अपना अधिकार कर लिया था। स्वर्ग पर बलि के अधिकार से चिंतित होकर देवराज इंद्र और अन्य देवता भगवान विष्णु की शरण में पहुंचे।
देवताओं की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने वामन (बौने ब्राह्मण) का अवतार लिया। राजा बलि उस समय एक महान यज्ञ करवा रहे थे। वामन देव बलि की यज्ञशाला में पहुंचे और दान में तीन पग भूमि मांगी। बलि के गुरु शुक्राचार्य समझ गए कि यह स्वयं नारायण हैं और उन्होंने बलि को दान देने से रोका, लेकिन अपनी वचनबद्धता के कारण राजा बलि नहीं माने।
जैसे ही बलि ने दान का संकल्प लिया, भगवान वामन ने अपना आकार अत्यंत विशाल कर लिया
पहला पग: पूरी पृथ्वी और नीचे के लोकों को नाप लिया।
दूसरा पग: पूरे स्वर्ग लोक और आकाश को नाप लिया।
अब तीसरा पग रखने के लिए कोई स्थान नहीं बचा। तब राजा बलि ने अपना सिर वामन देव के आगे झुका दिया और कहा, "हे प्रभु! तीसरा पग आप मेरे सिर पर रख दीजिए।"
भगवान विष्णु राजा बलि की भक्ति, सत्यनिष्ठा और दानवीरता से अत्यधिक प्रसन्न हुए। उन्होंने अपना तीसरा कदम बलि के सिर पर रखा, जिससे बलि पाताल लोक चले गए। भगवान ने बलि को पाताल लोक का राजा बना दिया।
प्रसन्न होकर विष्णु जी ने बलि से वरदान मांगने को कहा। राजा बलि ने वरदान मांगा
"हे प्रभु! आप सदैव मेरे साथ पाताल लोक में निवास करें। मैं जब भी आंखें खोलूं, मुझे आपके ही दर्शन हों।"
अपने भक्त के वश में होकर भगवान विष्णु ने पाताल लोक में रहना स्वीकार कर लिया।
जब भगवान विष्णु वैकुंठ छोड़कर पाताल लोक चले गए, तो माता लक्ष्मी और समस्त देवता चिंतित हो गए। तब माता लक्ष्मी एक गरीब स्त्री का रूप धारण करके पाताल लोक पहुंचीं और राजा बलि को राखी बांधी।
बलि ने उन्हें अपनी बहन स्वीकार किया और बदले में मनचाहा उपहार मांगने को कहा। माता लक्ष्मी ने अपने वास्तविक रूप में आकर बलि से भगवान विष्णु को वापस वैकुंठ लौटने का वचन मांग लिया
राजा बलि ने अपनी बहन लक्ष्मी जी की बात मान ली, लेकिन वह दुखी हो गए। भगवान विष्णु अपने भक्त बलि को निराश नहीं करना चाहते थे। इसलिए उन्होंने एक व्यवस्था बनाई
भगवान विष्णु ने वचन दिया कि वे प्रतिवर्ष आषाढ़ एकादशी से कार्तिक एकादशी तक के चार महीने (चातुर्मास) पाताल लोक में राजा बलि के द्वारपाल/अतिथि के रूप में योग निद्रा में बिताएंगे। शेष आठ महीने वे वैकुंठ में निवास करेंगे।
जब भगवान विष्णु योग निद्रा में जाते हैं, तब इस दौरान सृष्टि के संचालन का दायित्व भगवान शिव संभालते हैं। इसीलिए चातुर्मास के शुरुआती महीने (सावन) में भगवान शिव की विशेष पूजा होती है।
इन चार महीनों में शादी-विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश जैसे मांगलिक कार्य रोक दिए जाते हैं, क्योंकि इन शुभ कार्यों के फलदाता (विष्णु जी) योग निद्रा में होते हैं।
यह समय आध्यात्मिक दृष्टि से जप, तप, ध्यान, व्रत और सात्विक जीवन शैली अपनाने के लिए सर्वोत्तम माना जाता है।