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#जय श्री कृष्ण #जय श्री राधे ' चीरहरण लीला - ' वृंदावन की कुमारिका गोपियों के मन में भगवान श्रीकृष्ण को पति रूप में प्राप्त करने की तीव्र अभिलाषा थी। मार्गशीर्ष (अगहन) के महीने में उन्होंने देवी कात्यायनी की उपासना शुरू की। वे प्रतिदिन ब्रह्ममुहूर्त में यमुना स्नान करतीं और बालू की देवी बनाकर उनकी पूजा करती थीं। उनकी प्रार्थना केवल एक ही थी: "नन्दगोपसुतं देवि पतिं मे कुरु ते नमः" (हे देवी! नंदगोप के पुत्र को मेरा पति बना दें, आपको नमस्कार है।) एक दिन, जब गोपियाँ अपनी सहेलियों के साथ यमुना के जल में क्रीड़ा कर रही थीं, उन्होंने अपने वस्त्र (चीर) तट पर ही छोड़ दिए थे। उनकी भक्ति और उनके मन के अंतिम संकोच को दूर करने के लिए श्रीकृष्ण वहां पहुंचे। उन्होंने चुपके से सभी के वस्त्र उठाए और पास के एक कदम के वृक्ष पर चढ़ गए। जब गोपियाँ जल से बाहर निकलने लगीं, तो उन्हें अपने वस्त्र नहीं मिले। तब कृष्ण ने हंसते हुए कहा कि यदि वे अपने वस्त्र वापस चाहती हैं, तो उन्हें जल से बाहर आकर स्वयं अपने वस्त्र लेने हों गोपियाँ पहले तो लोक-लाज के कारण संकोच करने लगीं और जल में ही छिपी रहीं। उन्होंने कृष्ण से अनुनय-विनय की, लेकिन कृष्ण अडिग रहे। श्रीकृष्ण का उद्देश्य उन्हें नीचा दिखाना नहीं, बल्कि यह समझाना था कि मनुष्य ईश्वर के सामने नग्न ही आता है और नग्न ही जाता है। बिना वस्त्र के वरुण देव (जल के देवता) के जल में प्रवेश करना अपराध माना जाता था। श्रीकृष्ण ने उन्हें इस भूल का आभास कराया। अंततः, गोपियों ने अपनी 'लोक-लाज' और 'देह-अभिमान' का त्याग कर दिया और हाथ जोड़कर जल से बाहर आ गईं। उनके इस निष्कपट और पूर्ण समर्पण को देखकर भगवान अत्यंत प्रसन्न हुए और सबके वस्त्र लौटा दिए। यह लीला केवल वस्त्रों की चोरी नहीं थी, बल्कि वासना और अहंकार की चोरी थी। इसके मुख्य संदेश इस प्रकार हैं: भक्त जब तक संसार और शरीर की लज्जा में फंसा रहता है, तब तक वह परमात्मा को पूर्ण रूप से प्राप्त नहीं कर सकता। वस्त्र यहाँ 'माया' और 'अहंकार' के प्रतीक हैं। श्रीकृष्ण ने उन आवरणों को हटाकर गोपियों की आत्मा का परमात्मा से मिलन कराया। इस लीला के अंत में श्रीकृष्ण ने गोपियों को वचन दिया कि आगामी शरद पूर्णिमा की रात को वे उनके साथ महारास करेंगे, जो कि जीव और ब्रह्म के मिलन की पराकाष्ठा है। इस कथा को कामुक दृष्टि से देखना एक बड़ी भूल है। यह शुद्ध प्रेम और समर्पण की वह स्थिति है जहाँ भक्त और भगवान के बीच कोई पर्दा नहीं रहता। राधे राधे. जय श्रीकृष्ण. .
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