#जय श्री राम
राम की भक्ति
आज हम श्रीराम राम की भक्ति प्राप्त करने के बिंदु पर एक चिंतन करते हैं
हम जानते हैं कि राम चरित मानस में भगवान राम की कथा है जो कि शंकर जी ने पार्वती जी को सूनाई हैं शंकरजी माता पार्वती जी से कहते हैं कि
यह संवाद जासु उर आवा
. . रघुपति चरन भक्ति सोइ पावा
गोस्वामी तुलसीदास जी लिखते हैं कि जिसने भी इस संवाद को ह्दयंगम कर दिया उसने राम की भक्ति सहजही प्राप्त कर लिया। प्रसंग है सीता जी के समाचार हनुमान जी राम जी को दे रहे हैं तभी हनुमान जी के कर्तव्य परायणता और राम के प्रति अटूट भक्ति का नमूना देखकर श्री राम जी इतने प्रसन्न हो जाते हैं कि वे हनुमान जी को हृदय लगाने के साथ-साथ उनके सर पर अपने कर कमलों से अपने प्रेम का एहसास भी करा देते हैं। ऐसा करने की प्रक्रिया को शंकर जी पार्वती जी को बताते बताते स्वयं प्रेम में इतना मस्त हो गए कि उन्हें सुध बुध का ध्यान नहीं रहा । केवल इतना ध्यान रहा कि उनके आराध्य भगवान श्री राम अपना हाथ हनुमान जी के सर पर फिरा रहे हैं और हनुमान जी तो स्वयं शंकर जी हैं इसलिए ऐसा बताते बताते शंकर जी राम जी की कृपा का अनुभव करके इतना मगन हो गए की पार्वती जी को कथा सुनने की प्रक्रिया में अल्पविराम हो गया। दूसरे ही क्षण शंकर जी को अपनी स्थिति का भान हो जाता है इसीलिए स्वयं अपने को सावधान करते हुए पुन इस सुंदर कथा को कहना प्रारंभ कर देते हैं इस रहस्य की सभी बातों को सभी लोग समझ नहीं पाते लेकिन जो समझ लेते हैं उनको श्री राम की भक्ति सहज ही प्राप्त हो जाती है ऐसा ही सुंदर कांड में शंकर जी द्वारा कहा गया है आप इस प्रसंग को एक बार पुन देखिए प्रसंग वही है श्री राम जी हनुमान जी से पूछते हैं लंका में जानकीजी कुशल से तो है ना ऐसी भयंकर आपदा के रहते हुए सीता जी अपने प्राणों की रक्षा किस प्रकार कर रही हैं
कहउ तात केहि भांति जानकी
रहति करत रक्षा स्व प्राण की
वत्स बताओ लंका में मेरी जान की किस भांति हैं ।वे वे अपने प्राणों की रक्षा किस प्रकार कर पा रही हैं ।हनुमान जी ने इसका उत्तर भी दे दिया और कहा कि भगवान आप परेशान ना हो उनकी प्राणों को कोई खतरा नहीं है क्योंकि
नाम पाहरू दिवस निस ध्यान तुम्हार कपाट
लोचन निज पद जन्त्रित जांहि प्रान केहि बाट
जानकी जी निरंतर दिन रात राम नाम का स्मरण करती हैं और आप ही का ध्यान करती रहती हैं इस प्रकार राम के नाम का पहरा देखकर सशक्त पहरेदार देखकर प्राण के निकालने की हिम्मत नहीं हो रही आपका ध्यान जानकी जी कर रही हैं मानो प्राण के निकलने का दरवाजा भी बंद है दरवाजा खुला नहीं है राम नाम का पहरा है तो प्राण कैसे निकाल पाएंगे इस पर राम जी ने इशारों इशारों में हनुमान जी से कहा आंख के रास्ते से तो प्राण निकल सकते हैं ,हनुमान जी ने कहा नहीं भगवान वहां से भी निकलना संभव नहीं है क्योंकि जानकी जी ने अपने नेत्रों की दृष्टि को अपने पैरों में गड़ा रखा है । दृष्टि पटल का जब तक कोई भंजन नहीं होता तब तक प्रभु आप ही बताइए प्राण निकले तो किस रास्ते से निकले ।अर्थात जानकी जी के प्राण निकल नहीं सकते आप परेशान ना हो। इस इस प्रकार जानकी जी के समाचार राम जी को सुना कर हनुमान जी ने उन्हें संतुष्ट कर दिया अब प्रश्न और उत्तर का कार्यक्रम समाप्त हो जाना चाहिए था लेकिन ऐसा लगता है अभी राम जी को संतोष नहीं हुआ और हनुमान जी को भी लगा की राम जी सीता जी के बारे में और विस्तार से सुनना चाहते हैं यह है श्री राम की नर लीला का प्रवाह सामान्य स्थिति यही होती है जब कोई व्यक्ति बहुत समय तक अपनी प्रियतमा से दूर रहता है तब वह उसके समाचार जानने के लिए कितना व्याकुल रहता है ।वही श्री राम जी यहां पर दिखा रहे हैं जैसे ही श्री राम जी ने हनुमान जी से इशारों इशारों में कहा और क्या समाचार हैं जरा विस्तार से बताओ ना तो हनुमान जी ने भी विस्तार से बताना प्रारंभ किया और इस विस्तार से बताने में थोड़ा सा चूक कर बैठे उन्होंने कहा कि माता ने चलते समय मुझे चूड़ामणि दिया है रामने उसको अपने दिल से लगा लिया फिर कहा हनुमान जी ने कि सीता जी ने कहा है कि राम जी से मेरा दुखड़ा सुनाना तो हे भगवान मैं बता रहा हूं
सीता के अति बिपति विशाला सीता जी अत्यंत विपत्ति में हैं ,वह भूल गए की वही पहले बता चुके हैं कि सीता जी दिन रात रामका नाम जपती रहती हैं राम जी ने यही बात पकड़ ली पहले तो उन्होंने सीता की विपत्ति को सुनकर दुखी होने का अभिनय किया और उसी अवस्था में हनुमान जी से पूछ लिया कि
सुनि सीता दुख प्रभु सुख अयना
भर आए जल राजीव नैना
बच्चन काय मन मम गति जाही
सपनेहु में बूूझिअ विपत्ति की ताही
अब हनुमान जी को भी समझ आ गया की कहां चूक हो गई उन्होंने तुरंत अपने कहे का सुधार किया और कहा हां भगवान आपका कहना एकदम सही है
का हनुमंत विपत्ति प्रभु सोई
जब तव सुमिरन भजन न होई
ऐसी प्रेम भरी आलाप मैं हनुमानजी और राम जी बहुत मगन हो गए और हनुमान जी राम जी के मुख की ओर निहारते हुए उनके चरणों पर गिर पड़े प्रभु उनको बार-बार उठाने का प्रयास करते हैं लेकिन हनुमान जी उठना नहीं चाहते यहां पर भक्त और भगवान की विलक्षणता देखने योग्य है हनुमान जी मन ही मन कह रहे कि भगवान मैं अतिरेक में कुछ गलत कह गया मुझे क्षमा करें हनुमान जी अपनी गलती का एहसास करते हुए प्रभु श्री राम के चरणों को छोड़ना नहीं चाहते ।
बार-बार प्रभु चहब न भावा
प्रभु कर पंकज कपि कै सीसा
सुमिर सो दसा मगन गौरीसाहिं उठावा
प्रेम मगन तेहिं उठ
शंकर जी के आगे भी कहते हैं कि
यह संवाद जासु उर आवा
रघुपति चरन भक्ति सोइ पावा
जो राम के स्वभाव को जान जाए उसे भगवान की भक्ति के अलावा कुछ और नहीं सुहाता
और वह भगवान की भक्ति जो है प्राप्त करने का सरलतम उपाय है , इस राम और हनुमान के इससंवाद को भली-भांति ह्रदय में उतारना ओम जय श्री रामेश्वराय नमः


